शुक्रवार, जनवरी 26, 2007

क्या वैश्वीकरण का मानवीय चेहरा संभव है ? (४)

 

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    " भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र विदेशी पूंजी के लिए खुले हैं । आप आएं और हमारे देश में निवेश करें । " प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने १० अक्टूबर २००६ को लंदन में कहा । सचमुच ही , देश की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र के सारे दरवाजे विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए गए हैं । एक के बाद एक केन्द्र और प्रान्तों की सरकारें विदेशी पूंजी को बुलाने , आकर्षित करने और खुश करने की होड़ व दौड़ में लगी हैं । दशकों से चले आ रहे कानून , कायदे और नीतियाँ उनकी माँग पर उनके हितों में बदल दिए गए हैं । इसके पीछे विश्वास (या अन्धविश्वास) यह है कि विदेशी पूंजी तथा विदेशी कंपनियों के आने से ही देश का विकास हो सकेगा । इस विश्वास की हम क्या कीमत चुका रहे हैं , इस पर काफी कुछ लिखा गया है । यहाँ कुछ उदाहरणों से हम बात स्पष्ट करना चाहेंगे ।

    लगभग पाँच वर्ष पहले की बात है । भारतीय शेयर बाजार में कारोबार करने वाली कुछ विदेशी कंपनियों की जाँच भारतीय आयकर अधिकारियों ने शुरु की । इन कंपनियों ने अपना पता व पंजीयन मारीशस का बताया था , लेकिन ऐसा समझ में आ रहा था कि ये कंपनियाँ वास्तव में मारीशस की नहीं हैं । सिर्फ भारत - मारीशस के बीच दोहरा करारोपण न लगाने के समझौते का लाभ उठाने के लिए उन्होंने मारीशस में दफ्तर खोला है तथा वे अरबों रुपए के टैक्स की चोरी कर रहीं हैं ।जैसे ही यह जाँच शुरु हुई , इन कंपनियों में हडकम्प मच गया । उन्होंने धमकी दी कि वे भारतीय शेयर बाजार से अपनी पूंजी निकालकर वापस ले जायेंगी । शेयरों के सूचकांक गिरने लगे । तब भारत सरकार के वित्त मंत्री ने इन कंपनियों के दबाव में आकर यह जाँच रुकवा दी । सब कुछ वापस सामान्य हो गया , शेयर बाजार का सूचकांक वापस अपनी जगह पर आ गया और विदेशी कंपनियों की अरबों रुपयों की कर -चोरी पहले की तरह यथावत चलने लगी ।

    इस एक घटना से वैश्वीकरण व्यवस्था के चक्रव्यूह और उसकी मजबूरियों का पता चलता है । कहा जाता है कि वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा की पुत्रवधु भी ऐसी ही एक कंपनी में काम करती थी । लेकिन बात सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं है । विदेशी पूंजी के लिए लालायित , उसके आगमन की आंकड़ों और शेयर बाजार के सूचकांक को ही अपनी सफलता की कसौटी मानने वाली , विदेशी पूंजी की कृपा पर निर्भर , किसी भी गरीब देश की कोई भी सरकार इस प्रकार उनकी बंधक बन सकती है ।यदि विदेशी कंपनियों के गलत-सही कारनामों को बरदाश्त नहीं किया गया , उनके ऊपर किसी प्रकार का बंधन लगाया गया या कार्रवाई की गयी , तो वे हमेशा देश छोड़कर वापस चले जाने की धमकियाँ देती हैं और सरकारें झुक जाती हैं ।

    भारत में जो विदेशी पूंजी आ रही है , उसमें से लगभग आधी तो पोर्टफोलियो निवेश के रूप में शेयर बाजारों में शेयरों का सट्टा करने के लिए आ रही है । यानी वह सही मायने में देश के अन्दर तो आ ही नहीं रही और देश का उत्पादन या रोजगार बढ़ाने में उसका कोई वास्तविक योगदान नहीं होता है । शेयर बाजार में लगने वाली यह पूंजी काफी चंचल और अस्थिर होती है तथा कभी भी उसे देश छोड़कर जाने में कोई वक्त नहीं लगता है । इसे ' उड़न -छू पूंजी' कहा जा सकता है । वह कभी भी पलायन करके देश की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकती है । दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में दस वर्ष पहले जो संकट आया था , उसमें इस तरह की विदेशी पूंजी का बड़ा योगदान था । लेकिन भारत सरकार ने इससे कोई सबक नहीं सीखा  है ।और अब तो वह रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता की बात कर रही है , जिससे यह खतरा और बढ़ जायेगा ।

    शायद इसी तरह की गिरफ्त की मजबूरी है कि कोकाकोला और पेप्सी कंपनियों की बोतलों में नुकसान्देह स्तर तक कीटनाशक पाए जाने के बाद भी सरकार ने न तो उनका कारोबार बंद किया है और न उन पर कोई जुर्माना लगाया है । बोतलबन्द पानी का धन्धा तो विदेशी कंपनियों द्वारा इस देश की लूट का सबसे नायाब उदाहरण है । पानी देश का , पीने वाले देश के और कमाई विदेशी कंपनियों की । यही नहीं , पाँच पैसे का पानी , पचास पैसे की पैकिंग और बिक्री मूल्य दस रुपये ! इससे ज्यादा मुनाफे की दर दुनिया में और कहाँ होगी ? इससे बढ़िया लूट का धन्धा और क्या होगा ?इसके बावजूद भारत सरकार ने न केवल उसे इजाजत दे रखी है , बल्कि उसे बढ़ावा दे रही है और उसे देश की प्रगति तथा विकास की निशानी मान रही है ।

    ऐसे और भी कई उदाहरण हैं । जब भारत का बीमा क्षेत्र विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया , तब साथी किशन पटनायक ने एक सवाल उठाया था । उन्होंने कहा कि ये विदेशी बीमा कंपनियाँ विदेश से प्रारंभ में कुछ पूंजी लायेंगीं, लेकिन आखिरकार प्रीमियम तो इसी देश के लोग जमा करेंगे । यानी बचत इस देश की , पैसा इस देश के नागरिकों का और मुनाफा विदेश का ! बैंक और बीमा में विदेशी कंपनियों का प्रवेश बिल्कुल गैरजरूरी है तथा वे वे सिर्फ देश को लूटने का काम करेंगी । यही नहीं , मुनाफे और सिर्फ मुनाफे के लिए बेचैन ये विदेशी बैंक व बीमा कंपनियाँ भारत के वित्तीय क्षेत्र को एक खास जन-विरोधी , अमीर-प्रेमी , अनैतिक तथा व सट्टात्मक दिशा में ले जा रहे हैं । वैश्वीकरण के दौर के पहले बड़े घोटाले - हर्षद मेहता वाले शेयर घोटाले - में विदेशि बैंकों की प्रमुख तथा अग्रणी भूमिका थी।लेकिन विदेशी हितों की बन्धक बनी भारत सरकार ने उनके खिलाफ कोई खास कार्रवाई नहीं की ।

    एक और विदेशी कंपनी 'पोस्को' के साथ जो समझौता हुआ , वह भी विदेशी पूंजी के देश हित के खिलाफ होने की एक मिसाल है । गर्व से बताया गया कि इस कंपनी के द्वारा दुनिया का सबसे बड़ा इस्पात कारखाना उड़ीसा के तट पर लगेगा ,जो भारत में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी पूंजी निवेश होगा । पोस्को के साथ ही मित्तल , टाटा , एस्सार आदि के साथ झारखण्ड , छत्तीसगढ़ , उड़ीसा में नए -नए करारों की धूम मची है ।लेकिन यह बात छुपा दी जाती है कि पोस्को ने अपने करार में यह शर्त भी रक्खी है कि उसके कारखाने के लिए जितने लौह अय्स्क की जरूरत होगी, उससे ज्यादा कच्चा लोहा उसे खदानों से निकालने और निर्यात करने का अधिकार होगा ।अब जरा इस बात पर गौर करें ।विकास के , अर्थशास्त्र के प्रचलित मानदण्डों के हिसाब से भी कच्चा खनिज निर्यात कर करना बेवकूफी है ।यदि इस्पात बनाकर बेचेंगे तो देश की राष्ट्रीय आय बढ़ेगी तथा देश में रोजगार मिलेगा । कच्चा खनिज निर्यात करके हम विकास व औद्योगीकरण की सारी प्रगति को छोड़ते हुए वापस प्रारंभिक औपनिवेशिक अवस्था में पहुँच रहे हैं ,जब हम कच्चा माल निर्यात करते थे और तैयार माल आयात करते थे ।और हमें अपनी जरूरतों का तथा अपने भविष्य का कोई ख्याल नहीं है ।यदि पोस्को जैसे दो-चार करार और हो गए , तो भारत का लौह खनिज भण्डार यदि १०० साल चलने वाला था , वह ५० साल में ही खतम हो जाएगा ।

    कुल मिलाकर , विदेशी पूंजी और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ , चाहे वे शेयर बाजार में पोर्टफोलियो निवेश करने वाली हों या देश के अंदर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाली हों , असल में इस देश को पूरी तरह लूटने और चूसने के लिए आ रही हैं । वैश्वीकरण की व्यवस्था उनकी इस लूट को प्रशस्त करने तथा इसकी राह की रुकावटें दूर करने का काम करती हैं । इसका मानवीय चेहरा क्या होगा ? ( जारी )

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