obc लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
obc लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, अप्रैल 11, 2008

शिक्षा , मलाईदार परतें और गैर आरक्षित क्रीमी लेयर

शिक्षा की अपनी एक दुनिया है । वहीं शिक्षा-जगत व्यापक विश्व का एक हिस्सा भी है - एक उप व्यवस्था । उप व्यवस्था होने के कारण व्यापक विश्व के- मूल्य , विषमतायें , सत्ता सन्तुलन आदि के प्रतिबिम्ब आप यहाँ भी देख सकते/सकती हैं । हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था उस जमाने के मूल्य , विषमताओं , सत्ता सन्तुलन को बरकरार रखने का एक औजार होती है । हमारी तालीम में एक छलनी-करण की प्रक्रिया अन्तर्निहित है । लगातार छाँटते जाना । मलाई बनाते हुए, छाँटते जाना। उनको बचाए रखना जो व्यवस्था को टिकाए रखने के औजार बनने ‘लायक’ हों । इस छँटनी-छलनी वाली तालीम का स्वरूप बदले इसलिए एक नारा युवा आन्दोलन में चला था - ‘खुला दाखिला ,सस्ती शिक्षा । लोकतंत्र की यही परीक्षा’ यानि जो भी पिछली परीक्षा पास कर चुका हो और आगे भी पढ़ना चाहता हो , उसे यह मौका मिले। १९७७ में यही नारा लगा कर हमारे विश्वविद्यालय में ‘खुला दाखिला’ हुआ था । इस नारे को मानने वाले उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोधी थे और नौकरियों में विशेष अवसर के पक्षधर । इस नारे की विफलता के कारण शिक्षा में आरक्षण की आवश्यकता आन पड़ी ।
न्यायपालिका (जहाँ आरक्षण नहीं लागू है) ने सांसद-विधायकों के बच्चों को क्रीमी लेयर मान कर आरक्षण से वंचित रखने की बात कही है । क्रीमी लेयर के कारण वास्तविक जरूरतमंद आरक्षण से वंचित हो जाते हैं यह माना जाता है। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति में क्रेमी लेयर के rider से न्यायपालिका ने इन्कार किया है । तीसरे तबके में क्रीमी लेयर की बाबत जज चुप हैं। क्या अनारक्षित वर्ग में मलाईदार परतें नहीं हैं ? क्या विश्वविद्यालयों में इस तबके मास्टरों के बच्चे उन्हीं विभागों में टॉप करने के बाद वहीं मास्टर नहीं बनते ? क्या अनारक्षित वर्ग के अफ़सरों के बच्चे अफ़सर नहीं बनते ? नेता के बच्चे नेता भी हर वर्ग में बनते हैं । गैर मलाईदार वर्गों के साथ उन्हें स्पर्धा में क्यों रखा जाता है ? गैर आरक्षित वर्ग के क्रीमी लेयर पर भी rider लगाने की बहस भी अब शुरु होनी चाहिए ।
पिछड़े वर्गों के कुछ अभ्यर्थी खुली स्पर्धा से भी चुने जाते हैं और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के भी । हर साल लोक सेवा आयोग द्वारा अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों के सामान्य वर्ग में चुने जाने की तादाद बढ़ने की स्वस्थ सूचना प्रेस कॉन्फ़रेन्स द्वारा दी जाती है। सामान्य सीटों पर उत्तीर्ण होने वाले पिछड़े वर्गों के अभ्यर्थियों की गिनती ‘कोटे’ के तहत क्यों नहीं की जाती इसे मण्डल कमीशन की रपट में बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कल दिए गए फैसले के बाद हमारे समाज की यथास्थिति ताकतें ( जैसे मनुवादी मीडिया और फिक्की , एसोकेम जैसे पूंजीपतियों के संगठन ) फिर खदबदायेंगी , यह लाजमी है ।

गुरुवार, मार्च 29, 2007

'आरक्षण की व्यवस्था एक सफल प्रयोग है'

योगेंद्र यादव
समाजशास्त्री

जो लोग आरक्षण को ख़ारिज करते हैं, वो तो हमेशा से सामाजिक न्याय के सवाल को भी ख़ारिज करते रहे हैं. ये वो लोग हैं जो कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग को अन्य वर्गों के लिए कुछ भी छोड़ना पड़े, इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं.

ये वे लोग हैं जिन्होंने न तो हमारा समाज देखा है और न ही अवसरों की ग़ैर-बराबरी को समझने की कोशिश की है. ध्यान रहे कि किसी भी समाज में भिन्नताओं को स्वीकार करना उस समाज की एकता को बढ़ावा देता है न कि विघटन करता है.

मिसाल के तौर पर अमरीकी समाज ने जबतक अश्वेत और श्वेत के सवाल को स्वीकार नहीं किया, तबतक वहाँ विद्रोह की स्थिति थी और जब इसे सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया गया, तब से स्थितियाँ बहुत सुधर गई हैं.

हाँ, अगर आप भिन्नताओं की ओर से आँख मूँदना समाज को तोड़ने का एक तयशुदा फ़ार्मूला है.

अगर पिछले 50 साल के अनुभव पर एक मोटी बात कहनी हो तो मैं एक बात ज़रूर कहूँगा कि आरक्षण की व्यवस्था एक बहुत ही सफल प्रयोग रहा है, समाज के हाशियाग्रस्त लोगों को समाज में एक स्थिति पर लाने का.

सफल कैसे, इसे समझने के लिए इसके उद्देश्य को समझना बहुत ज़रूरी है.

आरक्षण का उद्देश्य

आरक्षण की व्यवस्था पूरे दलित समाज की सामाजिक स्थिति को बदलने का आधार न तो थी और न हो सकती है. आरक्षण की व्यवस्था ग़रीबी की समस्या का समाधान भी न तो कभी थी न बन सकती है.

कुछ सरकारी महकमों और शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था इस उद्देश्य से बनाई गई थी कि समाज में, राजनीति में और आधुनिक अर्थव्यवस्था के जो शीर्ष पद हैं, उनमें जो सत्ता का केंद्र है, वहाँ दलित समाज की एक न्यूनतम उपस्थिति बन सके.

इस उद्देश्य को लेकर चलाई गई यह व्यवस्था इस न्यूनतम उद्देश्य में सफल रही है.

आज अगर हम सिविल सेवाओं से लेकर चिकित्सकों, इंजीनियरों के रूप में दलित समाज के कुछ लोगों को देख पा रहे हैं तो इसका श्रेय आरक्षण को जाता है. बल्कि यूँ कह सकते हैं कि अगर यह व्यवस्था नहीं होती तो शायद दलित समाज की स्थिति वर्तमान स्थिति से भी बदतर होती.

वैश्विक रूप से देखें तो दुनिया के जिन देशों में हाशिए पर पड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए जो प्रयोग हुए हैं, भारत में आरक्षण की व्यवस्था उनमें सबसे सफल प्रयोग के रूप में देखा जाएगा और दुनिया के बाकी देश इससे सीख सकते हैं.

चिंता

दिक्कत की बात यह है कि इतने वर्षों तक प्रयोग चलाने के बाद आरक्षण हमारे समाज में सामाजिक न्याय का पर्याय बन गया है. कई मायनों में उसका विकल्प बन गया है. यह दुखद स्थिति है.

यह तो उस तरह है कि कोई सर्जन एक ही कैंची से हर तरह की सर्जरी करे.

असल में आरक्षण एक विशेष स्थिति से निपटने का औजार है और वह विशेष स्थिति यह है कि समाज का जो वर्ग सिर्फ़ पिछड़ा ही नहीं रहा बल्कि जिसे बहिष्कृत किया गया हो, उसे अगर कुछ चुनिंदा कुर्सियों पर बैठाना है तो उन कुर्सियों पर निशान लगाकर उन्हें आरक्षित कर देना एक बेहतर तरीका है.

अब होता यह जा रहा है कि हर वर्ग की समस्याओं के लिए आरक्षण ही एकमात्र विकल्प से रूप में सुझाया जा रहा है. सामाजिक न्याय के पक्षधर लोग भी इसके बारे में सोचते नहीं हैं और केवल इसके बारे में आरक्षण को ही विकल्प मानते हैं.

आवश्यकता इस बात की है कि हम आरक्षण की व्यवस्था को और उसके इर्द-गिर्द जो ज़रूरतें हैं, उन्हें मज़बूत करें ताकि आरक्षण की व्यवस्था का सही अर्थों में सही लोगों तक लाभ पहुँच सके.

आरक्षण से आगे

आरक्षण सरकारी नौकरियों और राजनीति तक के सीमित क्षेत्र में लाभप्रद रहा है पर और भी मुद्दे हैं जिनका समाधान आरक्षण नहीं है और उनपर काम होना बाकी है.

इनमें भूमि के बँटवारे की समस्या, शिक्षा में ग़ैर-बराबरी की समस्या और आर्थिक क्षेत्र में ग़ैर बराबरी की समस्या जैसे सवाल आते हैं जिनका समाधान आरक्षण नहीं है और हम इन सवालों पर कुछ नहीं कर रहे हैं.

जो वर्ग वर्जना और वंचना का शिकार नहीं रहे हैं, जैसे अन्य पिछड़ी जातियाँ हैं, जैसे महिलाएँ हैं, उनके लिए प्रारंभिक शिक्षा को बेहतर बनाने की ज़रूरत है.

इन वर्गों के लोगों को उससे ऊपर जाने पर जाति आधारित आरक्षण देने की ज़रूरत नहीं है बल्कि हम इसे मापने की कोशिश करें कि उसे किस तरह के पिछड़ेपन से गुज़रा है और उस आधार पर उसे वरीयता दी जाए.

साथ ही आरक्षण की व्यवस्था में कुछ बदलाव भी करने होंगे. जैसे एक पीढ़ी में जो लोग आरक्षण का लाभ उठा चुके हैं, उनकी दूसरी पीढ़ी को उस स्तर तक इस व्यवस्था का लाभ न मिले.

मसलन, अगर आरक्षण के ज़रिए कोई अध्यापक बन जाता है तो उसकी संतान को अध्यापक बनने तक के प्रयास में आरक्षण का लाभ न मिले. हाँ, अगर वो आईएएस बनना चाहता है तो ज़रूर दिया जाना चाहिए क्योंकि वहाँ स्थितियाँ दूसरी हो जाएंगी.

साथ ही जो जातियाँ राष्ट्रीय औसत से बेहतर हो चुकी हैं उनके लिए इस व्यवस्था को समाप्त करना चाहिए.

(भारत में जारी आरक्षण व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर योगेंद्र यादव ने पाणिनी आनंद के साथ कुछ समय पूर्व हई बातचीत में ये विचार व्यक्त किए थे)

साभार :बी बी सी हिन्दी