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गुरुवार, मई 17, 2007

"हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था"

गतांश से आगे : गांधी जी के सचिव प्यारेलाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक पूर्णाहुति में सितम्बर , १९४७ में संघ के अधिनायक गोलवलकर से गांधीजी की मुलाकात , विभाजन के बाद हुए दंगों में तथा गांधी - हत्या में संघ की भूमिका का विस्तार से वर्णन किया है । गोलवलकर से गांधी जी के वार्तालाप के बीच में गांधी मंडली के एक सदस्य बोल उठे - ' संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है । उन्होंने अनुशासन , साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है ।' गांधी जी ने उत्तर दिया - ' परन्तु यह न भूलिये कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था ।' उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ' तानाशाही दृष्टिकोण रखनेवाली सांप्रदायिक संस्था बताया । ( पूर्णाहुति , चतुर्थ खंड, पृष्ठ : १७)

अपने एक सम्मेलन में गांधीजी का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता ने उन्हें ' हिन्दू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष ' बताया । उत्तर में गांधी जी बोले - 'मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है । परन्तु मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी है । हिन्दू धर्म की विशिष्टता जैसा मैंने समझा है , यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है । यदि हिन्दू यह मानते हों कि भारत में अहिन्दुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दरजे से संतोष करना होगा... तो इसका परिणाम यह होगा कि हिन्दू धर्म श्रीहीन हो जायेगा.. मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही हो कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा ।'

इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधी जी से पूछा गया - ' क्या हिन्दू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता ? यदि नहीं देता , तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है , उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है ?'

गांधी जी ने कहा - ' पहले प्रश्न का उत्तर 'हां' और 'नहीं' दोनों है । मारने का प्रश्न खड़ा होने से पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है ?दूसरे शब्दों में , हमें ऐसा अधिकार तभी मिल सकता है जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जायें । एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने अथवा फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है ? रही बात दूसरे प्रश्न की । यह मान भी लिया जाये कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है , तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भलीभांति कर सकती है । अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद दोनों एक साथ बन जायें , तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जायेंगे.... उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए , कानून को अपने हाथों में ले कर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए । ( संपूर्ण गांधी वांग्मय खंड : ८९ )

३० नवंबर '४७ के प्रार्थना प्रवचन में गांधी जी ने कहा , ' हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विचार है कि हिन्दुत्व की रक्षा का एक मात्र तरीका उनका ही है । हिंदू धर्म को बचाने का यह तरीका नहीं है कि बुराई का बदला बुराई से । हिंदू महासभा और संघ दोनों हिंदू संस्थाएं हैं । उनमें पढ़े - लिखे लोग भी हैं । मैं उन्हें अदब से कहूंगा कि किसी को सता कर धर्म नहीं बचाया जा सकता...

'.. कनॉट प्लेस के पास एक मस्जिद में हनुमान जी बिराजते हैं , मेरे लिए वह मात्र एक पत्थर का टुकड़ा है जिसकी आकृति हनुमान जी की तरह है और उस पर सिन्दूर लगा दिया गया है । वे पूजा के लायक नहीं ।पूजा के लिए उनकी प्राण प्रतिष्ठा होनी चाहिए , उन्हें हक से बैठना चाहिए । ऐसे जहां तहां मूर्ति रखना धर्म का अपमान करना है ।उससे मूर्ति भी बिगड़ती है और मस्जिद भी । मस्जिदों की रक्षा के लिए पुलिस का पहरा क्यों होना चाहिये ? सरकार को पुलिस का पहरा क्यों रखना पड़े ? हम उन्हें कह दें कि हम अपनी मूर्तियां खुद उठा लेंगे , मस्जिदों की मरम्मत कर देंगे । हम हिन्दू मूर्तिपूजक हो कर , अपनी मूर्तियों का अपमान करते हैं और अपना धर्म बिगाड़ते हैं ।

...' एक मुसलमान मेरे पास परेशान हो कर आया । वह एक आधा जला कुरान शरीफ अदब से कपड़े में लपेट कर लाया । खोल कर मुझे दिखाया और चला गया । उसकी आंखों में पानी था , पर मुंह से वह कुछ बोला नहीं । जिसने कुरान शरीफ का अपमान करने की कोशिश की , उसने अपने धर्म का अपमान किया । उसके सामने मुसलमान कहीं मारपीट करके कहीं कुरान शरीफ रखना चाहे , तो वे कुरान-शरीफ का अपमान करेंगे । '

' इसलिए हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे जो भी मुझे सुनना चाहते हैं और सिखों को बहुत अदब से कहना चाहूंगा कि सिख अगर गुरु नानक के दिन से सचमुच साफ हो गये , तो हिन्दू अपने आप सफ हो जायेंगे । हम बिगड़ते ही न जायें , हिंदू धर्म को धूल में न मिलायें । अपने धर्म को और देश को हम आज मटियामेट कर रहे हैं । ईश्वर हमें इससे बचा ले '। ( प्रार्थना प्रवचन ,खंड २ , पृ. १४४ - १५० तथा संपूर्ण गांधी वांग्मय , खंड : ९० )

अखिल भारतीय कांग्रेस समिति को अपने अंतिम संबोधन ( १८ नवंबर '४७ ) में उन्होंने कहा , ' मुझे पता चला है कि कुछ कांग्रेसी भी यह मानते हैं कि मुसलमान यहां न रहें । वे मानते हैं कि ऐसा होने पर ही हिंदू धर्म की उन्नति होगी । परंतु वे नहीं जानते कि इससे हिंदू धर्म का लगातार नाश हो रहा है । इन लोगों द्वारा यह रवैया न छोड़ना खतरनाक होगा ... काफी देखने के बाद मैं यह महसूस करता हूं कि यद्यपि हम सब तो पागल नहीं हो गये हैं , फिर कांग्रेसजनों की काफी बडी संख्या अपना दिमाग खो बैठी है..मुझे स्पष्ट यह दिखाई दे रहा है कि अगर हम इस पागलपन का इलाज नहीं करेंगे , तो जो आजादी हमने हासिल की है उसे हम खो बैठेंगे... मैं जानता हूं कि कुछ लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अपनी आत्मा को मुसलमानों के चरणों में रख दिया है , गांधी ? वह जैसा चाहे बकता रहे ! यह तो गया बीता हो गया है । जवाहरलाल भी कोई अच्छा नहीं है । रही बात सरदार पटेल की , सो उसमें कुछ है । वह कुछ अंश में सच्चा हिंदू है ।परंतु आखिर तो वह भी कांग्रेसी ही है ! ऐसी बातों से हमारा कोई फायदा नहीं होगा , हिंसक गुंडागिरी से न तो हिंदू धर्म की रक्षा होगी , न सिख धर्म की । गुरु ग्रन्थ-साहब में ऐसी शिक्षा नहीं दी गयी है । ईसाई धर्म भी ये बातें नहीं सिखाता । इस्लाम की रक्षा तलवार से नहीं हुई है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में मैं बहुत-सी बातें सुनता रहता हूं । मैंने यह सुना है कि इस सारी शरारत की जड़ में संघ है । हिंदू धर्म की रक्षा ऐसे हत्याकांडों से नहीं हो सकती । आपको अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी । वह रक्षा आप तभी कर सकते हैं जब आप दयावान और वीर बनें और सदा जागरूक रहेंगे, अन्यथा एक दिन ऐसा आयेगा जब आपको इस मूर्खता का पछतावा होगा , जिसके कारण यह सुंदर और बहुमूल्य फल आपके हाथ से निकल जायेगा । मैं आशा करता हूं कि वैसा दिन कभी नहीं आयेगा । हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लोकमत की शक्ति तलवारों से अधिक होती है । '

संयुक्त राष्ट्रसंघ के समक्ष तत्कालीन हिंदुस्तानी प्रतिनिधिमण्डल की नेता श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित की आवाज में आवाज मिलाकर जब पाकिस्तानी प्रतिनिधिमण्डल के नेता विदेश मन्त्री जफ़रुल्ला खां , अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत एम. ए. एच. इरफ़ानी ने भी दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों पर अत्याचार का विरोध किया , तब गांधीजी अत्यन्र्त प्रसन्न हुए और १६ नवंबर '४७ को प्रार्थना में उन्होंने यह कहा , ' हिंदुस्तान(अविभाजित) के हिंदू और मुसलमान विदेशों में रहने वाले हिंदुस्तानियों के सवालों पर दो राय नहीं हैं , इससे साबित होता है कि दो राष्ट्रों का उसूल गलत है ।इससे आप लोगों को मेरे कहने से जो सबक सीखना चाहिए , वह यह है कि दुनिया में प्रेम सबसे ऊंची चीज है ।अगर हिंदुस्तान के बाहर हिंदू और मुसलमान एक आवाज से बोल सकते हैं , तो यहां भी वे जरूर ऐसा कर सकते हैं , शर्त यह है कि उनके दिलों में प्रेम हो ... अगर आज हम ऐसा कर सके और बाहर की तरह हिंदुस्तान में भी एक आवाज से बोल सके , तो हम आज की मुसीबतों से पार हो जायेंगे ! ( संपूर्ण गांधी वांग्मय , खण्ड : ९० )

इन सबको याद करना उस भयंकर त्रासदायी व शर्मनाक दौर को याद करना नहीं है , बल्कि जिस दौर की धमक सुनाई दे रही है उसे समझना है । गांधीजी तब भले ही एक व्यक्ति हों , आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती हैं और हमारे विवेक को कोंचती हैं । उस आवाज को तब न सुन कर हमने उस आवाज का ही गला घोंट दिया था । अब आज ? आज तो आवाज भी अपनी ही है और गला भी ! इस बार हमें पहले से भी बड़ी कीमत अदा करनी होगी ।

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बुधवार, मई 16, 2007

हम इस आवाज का मतलब समझें






मेरा यह लेख धर्मयुग , १६ फरवरी १९९१ में छपा था ।


आज गुजरात के कई गाँवों में 'हिन्दू राष्ट्र नू माणसा गाम'. हिन्दू राष्ट्र का माणसा ( नाम ) ग्राम जैसी तख्तियाँ लगायी गयी हैं । मध्यप्रदेश के बस अड्डों पर ' हिन्दू राज्य ' में आपका स्वागत है !- पोस्टर एक अभियान के तहत लगाये जा रहे हैं । ऐसा एक दौर १९४२ में गांधी जी के समक्ष भी आया था । दिल्ली प्रदेश कंग्रेस कमिटी के तत्कालीन अध्यक्ष आसफ़ अली ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों की बाबत प्राप्त एक शिकायत गांधी जी को भेजी और लिखा था कि शिकायतकर्ता को नजदीकी तौर से जानते हैं , वे सच्चे और निष्पक्ष राष्ट्रीय कार्यकर्ता हैं । ९ अगस्त , १९४२ को हरिजन ( पृष्ट : २६१ ) में गांधी जी ने लिखा :



" शिकायती पत्र उर्दू में है । उसका सार यह है कि आसफ़ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) उसके ३,००० सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं , कवायद के बाद नारा लगाते हैं हिन्दुस्तान हिन्दुओं का है और किसी का नहीं । इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं जिनमें वक्ता कहते हैं - ' पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे , अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हे मार डालेंगे । ' बात जिस ढंग से कही गयी है , उसे वैसी ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषयवस्तु तो और भी बुरी है ।


" ... नारा गलत और बेमानी है , क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहाँ पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं तक सकते । इसलिए वह जितना हिन्दुओं का है उतना ही पारसियों , यहूदियों , हिंदुस्तानी इसाइयों , मुसलमानों और दूसरे गैर हिंदुओं का भी है । आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं , बल्कि हिन्दुस्तानियों का होगा , और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं , बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा ।


" ... धर्म एक निजी विषय है , जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए , विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गयी है , उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गये हैं । जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जायेगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे । अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होनेवाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता । वह स्वराज्य नहीं होगा । "


विभाजन के बाद हुए व्यापक सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ ' करो या मरो ' की भावना से गांधी जी दिल्ली में डेरा डाले हुए थे । २१ सितम्बर '४७ को प्रार्थना - प्रवचन में 'हिन्दू राष्ट्रवादियों ' के सन्दर्भ में उन्होंने टिप्पणी की ;



' एक अखबार ने बड़ी गंभीरता से यह सुझाव रखा है कि अगर मौजूदा सरकार में शक्ति नहीं है यानी अगर जनता सरकार को उचित काम न करने दे , तो वह सरकार उन लोगों के लिए अपनी जगह खाली कर दे , जो सारे मुसलमानों को मार डालने या उन्हें देश निकाला देने का पागलपन भरा काम कर सके । यह ऐसी सलाह है कि जिस पर चल कर देश खुदकुशी कर सकता है और हिंदू धर्म जड़ से बरबाद हो सकता है । मुझे लगता है ऐसे अखबार तो आजाद हिंदुस्तान में रहने लायक ही नहीं हैं । प्रेस की आजादी का यह मतलब नहीं कि वह जनता के मन में जहरीले विचार पैदा करें । जो लोग ऐसी नीति पर चलना चाहते हैं , वे अपनी सरकार से इस्तीफा देने के लिए भले कहें , मगर जो दुनिया शांति के लिए अभी तक हिंदुस्तान की तरफ ताकती रही है , वह आगे से ऐसा करना बंद कर देगी । हर हालत में जब तक मेरी सांस चलती है , मैं ऐसे निरे पागलपन के खिलाफ अपनी सलाह देना जारी रखूंगा । " ( दिल्ली-डायरी , पृष्ठ ३० )


८ अक्टूबर , '४७ को गांधी जी ने साफगोई से अपनी राय रखी :



' अखबारों का जनता पर जबरदस्त असर होता है । संपादकों का फर्ज है कि वे अपने अखबारों में गलत खबरें न दें या ऐसी खबरें न छापें , जिससे जनता में उत्तेजना फैले । एक अखबार में मैंने पढ़ा कि रेवाड़ी में मेवों ने हिंदुओं पर हमला कर दिया । इस खबर ने मुझे बेचैन कर दिया ।मगर दूसरे दिन अखबारों में यह पढ़ कर मुझे खुशी हुई कि वह खबर गलत थी । ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं ।संपादकों और उप संपादकों को को खबरें छापने और उन्हें खास रूप देने में बहुत ज्यादा सावधानी लेने की जरूरत है । आजादी की हालत में सरकारों के लिए यह करीब - करीब असंभव है कि वे अखबारों पर काबू रखें । जनता का फर्ज है कि वह अखबारों पर कड़ी नजर रखें और उन्हें ठीक रास्ते पर चलायें ।पढ़ी - लिखी जनता को चाहिए कि वह भड़काने वाले या गंदे अखबारों को मदद करने से इनकार कर दें । ( दिल्ली-डायरी , पृश्ठ : ७७)


गत एक वर्ष में काशी विश्वविद्यालय में प्रशासन की अनुमति से परिसर में विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के भाषण , विडियो प्रदर्शन , राम शिला पूजन , अस्ति पूजन कराने तथा शाखायें लगाने के अलावा मुस्लिम छात्रों की पीटने , अरबी विभाग में तोड़फोड़ , मुस्लिम शिक्षक , कर्मचारियों को धमकाने की घटनाएं हुई हैं । इस विश्वविद्यालय से जुड़े सर सुन्दरलाल चिकित्सालय में मुस्लिम मरीजों के परिचारकों को पीटा गया । यह अलीगढ़ विश्वविद्यालय की बाबत छपी गलत खबर के बहाने हुआ । महाराज सयाजी राव विश्वविद्यालय वडोदरा के प्रसिद्ध चित्रकार तथा दृश्यकला संकाय के प्रोफेसर गुलाम शेख को विश्वविद्यालय से निकाले जाने की छात्रसंघ द्वारा मांग की गयी क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए चलाये जा रहे ' वडोदरा शान्ति अभियान ' में हिस्सेदारी की थी । इस सन्दर्भ में गांधी जी २१ जनवरी , १९४२ को काशी विश्वविद्यालय के रजत जन्ती समारोह में दिये गये प्रवचन के उद्धरण मौजू होंगे :



" एक बात और । पश्चिम के हर एक विश्वविद्यालय की अपनी एक-न-एक विशेषता होती है । कैंब्रिज और ऑक्स्फोर्ड को ही लीजिए , इन विश्वविद्यालयों को इस बात का नाज है कि उनके हर एक विद्यार्थी पर उनकी विशेषता की छाप इस तरह लगी रहती है कि वे फौरन पहचाने जा सकते हैं ।हमारे देश के विश्वविद्यालयों की अपनी ऐसी कोई विशेषता होती ही नहीं । वे तो पश्चिमी विश्वविद्यालयों की एक निस्तेज और निष्प्राण नकल भर हैं , अगर हम उनको पश्चिमी सभ्यता का सिर्फ सोख्ता या स्याही-सोख कहें , तो शायद वाजिब होगा । आपके इस विश्वविद्यालय के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि यहां शिल्प - शिक्षा और यंत्र - शिक्षा का यानी इंजिनिरिंग और टेक्नोलॉजी का देशभर में सबसे ज्यादा विकास हुआ है ।और इनका शिक्षा से अच्छा सम्बन्ध है । लेकिन इसे मैं यहां की विशेषता मानने को तैयार नही। तो फिर इसकी विशेषता क्या हो ? मैं इसकी एक मिसाल आपके सामने रखना चाहता हूं । यहां जो इतने हिंदू विद्यार्थी हैं , उनमें से कितनों ने मुसलमान विद्यार्थियों को अपनाया है ? अलीगढ़ के कितने छात्रों को आप अपनी ओर खींच सके हैं ? दरअसल आपके दिल में तो यह भावना पैदा होनी चाहिये कि आप तमाम मुसलमान विद्यार्थियों को यहां बुलायेंगे और उन्हें अपनायेंगे ।


'...जिस तरह गंगा जी में अनेक नदियां आ कर मिलती हैं , उसी तरह इस देसी संस्कृति गंगा में भी अनेक संस्कृति-रूपी सहायक नदियां मिली हैं , यदि इन सबका कोई सन्देश या पैगाम हमारे लिए हो सकता है तो यही कि हम सारी दुनिया को अपनायें और किसी को अपना दुश्मन न समझें । मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह हिंदू विश्वविद्यालय को यह सब करने की शक्ति दे । यही इसकी विशेषता हो सकती है - सिर्फ अंग्रेजी सीखने से यह काम नहीं होगा ।'(बनारस हिंदू विश्वविद्यालय रजत जयंती समारोह , पृष्ठ :४१-४७)


जारी...