शुक्रवार, अप्रैल 11, 2008

शिक्षा , मलाईदार परतें और गैर आरक्षित क्रीमी लेयर

शिक्षा की अपनी एक दुनिया है । वहीं शिक्षा-जगत व्यापक विश्व का एक हिस्सा भी है - एक उप व्यवस्था । उप व्यवस्था होने के कारण व्यापक विश्व के- मूल्य , विषमतायें , सत्ता सन्तुलन आदि के प्रतिबिम्ब आप यहाँ भी देख सकते/सकती हैं । हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था उस जमाने के मूल्य , विषमताओं , सत्ता सन्तुलन को बरकरार रखने का एक औजार होती है । हमारी तालीम में एक छलनी-करण की प्रक्रिया अन्तर्निहित है । लगातार छाँटते जाना । मलाई बनाते हुए, छाँटते जाना। उनको बचाए रखना जो व्यवस्था को टिकाए रखने के औजार बनने ‘लायक’ हों । इस छँटनी-छलनी वाली तालीम का स्वरूप बदले इसलिए एक नारा युवा आन्दोलन में चला था - ‘खुला दाखिला ,सस्ती शिक्षा । लोकतंत्र की यही परीक्षा’ यानि जो भी पिछली परीक्षा पास कर चुका हो और आगे भी पढ़ना चाहता हो , उसे यह मौका मिले। १९७७ में यही नारा लगा कर हमारे विश्वविद्यालय में ‘खुला दाखिला’ हुआ था । इस नारे को मानने वाले उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोधी थे और नौकरियों में विशेष अवसर के पक्षधर । इस नारे की विफलता के कारण शिक्षा में आरक्षण की आवश्यकता आन पड़ी ।
न्यायपालिका (जहाँ आरक्षण नहीं लागू है) ने सांसद-विधायकों के बच्चों को क्रीमी लेयर मान कर आरक्षण से वंचित रखने की बात कही है । क्रीमी लेयर के कारण वास्तविक जरूरतमंद आरक्षण से वंचित हो जाते हैं यह माना जाता है। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति में क्रेमी लेयर के rider से न्यायपालिका ने इन्कार किया है । तीसरे तबके में क्रीमी लेयर की बाबत जज चुप हैं। क्या अनारक्षित वर्ग में मलाईदार परतें नहीं हैं ? क्या विश्वविद्यालयों में इस तबके मास्टरों के बच्चे उन्हीं विभागों में टॉप करने के बाद वहीं मास्टर नहीं बनते ? क्या अनारक्षित वर्ग के अफ़सरों के बच्चे अफ़सर नहीं बनते ? नेता के बच्चे नेता भी हर वर्ग में बनते हैं । गैर मलाईदार वर्गों के साथ उन्हें स्पर्धा में क्यों रखा जाता है ? गैर आरक्षित वर्ग के क्रीमी लेयर पर भी rider लगाने की बहस भी अब शुरु होनी चाहिए ।
पिछड़े वर्गों के कुछ अभ्यर्थी खुली स्पर्धा से भी चुने जाते हैं और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के भी । हर साल लोक सेवा आयोग द्वारा अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों के सामान्य वर्ग में चुने जाने की तादाद बढ़ने की स्वस्थ सूचना प्रेस कॉन्फ़रेन्स द्वारा दी जाती है। सामान्य सीटों पर उत्तीर्ण होने वाले पिछड़े वर्गों के अभ्यर्थियों की गिनती ‘कोटे’ के तहत क्यों नहीं की जाती इसे मण्डल कमीशन की रपट में बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कल दिए गए फैसले के बाद हमारे समाज की यथास्थिति ताकतें ( जैसे मनुवादी मीडिया और फिक्की , एसोकेम जैसे पूंजीपतियों के संगठन ) फिर खदबदायेंगी , यह लाजमी है ।

शनिवार, फ़रवरी 02, 2008

कोला कम्पनियों द्वाराश्रमिकों की हत्या , उत्पीड़न

इन दोनों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा गरीब देशों की इकाइयों में मजदूरों के साथ अत्यन्त अमानवीय कृत्य किए जाते हैं . दक्षिण अमेरिकी देश कोलोम्बिया में कोका - कोला कम्पनी द्वारा अपने मजदूरों पर दमन और अत्याचार सर्वाधिक चर्चित है . कोलोम्बिया की राष्ट्रीय खाद्य - पेय कामगार यूनियन - सिनालट्राइनाल ( SINALTRAINAL ) के अनुसार कोका - कोला की दक्षिणपन्थी सशस्त्र अर्धसैनिक गुंडा वाहिनी से सांठ - गांठ है तथा मजदूर नेताओं की हत्याओं का लम्बा सिलसिला , अपहरण , यूनियन गतिविधियों को कुचलने के लिए षडयंत्र ही कम्पनी की मुख्य रणनीति है . इन गिरोहों में कुछ पेशेवर सैनिक होते हैं और कुछ स्थानीय गुंडे . कोलोम्बिया में अमीर जमींदारों और नशीले पदार्थों के अवैध व्यवसाइयों ने ८० के दशक में वामपंथी विद्रोहियों का मुकाबला करने के लिए इनका गठन किया था . कोलोम्बिया के कई कोका - कोला संयंत्रों में इन्होंने अपने अड्डे या चौकियां बना ली हैं . इन संयंत्रों को वैश्वीकरण का प्रतीक मान कर वामपंथी विद्रोही इन पर हमला कर सकते हैं - यह बहाना देते हुए उनकी  ‘रक्षा ’ हेतु वे अपनी मौजूदगी को उचित बताते हैं . १९८९ से अब तक कोलोम्बिया के कोका - कोला संयंत्रों में कार्यरत आठ मजदूर नेताओं की हत्या इन गिरोहों द्वारा की जा चुकी है .

   वैसे,कोलोम्बिया में यूनियन नेताओं पर हिंसा एक व्यापक और आम घटना है . यह कहा जा सकता है कि कोलोम्बिया में श्रमिक संगठन बनाना दुनिया के अधिकतर मुल्कों से कहीं ज्यादा दुरूह काम है . एक अनुमान के अनुसार , १९८६ से अब तक वहां ३,८०० ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या हो चुकी है . श्रमिकों के अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुमान के अनुसार , दुनिया भर में होने वाली हर पांच ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की हत्याओं में से तीन कोलोम्बिया में होती हैं .

  कोलोम्बिया के कोरेपो स्थित कोका - कोला संयंत्र के यूनियन की कार्यकारिणी के सदस्य इसिडरो गिल की हत्या का मामला अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ है . घटनाक्रम इस प्रकार है . ५ दिसम्बर १९९६ , की सुबह एक अर्धसैनिक गिरोह से जुडे दो लोग मोटरसाइकिल से कोरेपो संयंत्र के भीतर पहुंचे . इन लोगों ने यूनियन नेता इसिडरो गिल पर दस गोलियां चलाईं जिससे उनकी मौत हो गयी . इसिडरो के सहकर्मी लुई कार्डोना ने बताया कि मैं काम पर था जब मैंने गोलियों की आवाज सुनी और इसिडरो के गिरते हुए देखा . मैं उसके पास दौड कर पहुंचा लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी . उसी रात यूनियन के दफ़्तर पर हमला हुआ . सभी दस्तावेज लूट लिए गये तथा दफ़्तर को जला दिया गया . कुछ घण्टों तक इस अर्धसैनिक गिरोह के अधिकारियों ने कार्डोना को रोक कर रखा . यहां से भाग निकलने में वह सफल रहा और स्थानीय पुलिस थाने में उसे शरण मिली . एक सप्ताह बाद इस अर्धसैनिक गिरोह के लोग फिर इस संयंत्र पर पहुंचे . इसिदरो गिल से जुडे सभी ६० मजदूरों को एक लाइन में खडा कर दिया गया और पहले से तैयार इस्तीफ़ों पर दस्तख़त करने का आदेश दिया गया . सभी ने दस्तख़त कर दिए . दो महीने बाद सभी कर्मचारियों ( जो सभी यूनियन से नहीं जुडे रहे ) को बर्खास्त कर दिया गया . २७ वर्षीय इसिडरो गिल इस संयंत्र में आठ वर्षों से कार्यरत था . उसकी विधवा एलसिरा गिल ने अपने पति की हत्या का विरोध किया तथा कोका - कोला से मुआवजे की मांग की . सन २०० में एलसिरा की भी इसी गिरोह ने हत्या कर दी . मृत दम्पति की दो अनाथ बेटियां रिश्तेदारों के पास छुप कर रहती हैं . कुछ समय बाद कोलोम्बिया की एक अदालत ने इसिडरो की हत्या के आरोपी लोगों को बरी कर दिया  इसिडरो

   जुलाई २००१ में अमेरिका की एक संघीय जिला अदालत में ‘विदेशी व्यक्ति क्षतिपूर्ति कानून ‘ के तहत मुकदमा कायम कर दिया गया . इसिडरो के परिजन व सिनालट्राइनाल के प्रताडित पांच यूनियन नेताओं की तरफ़ से वाशिंग्टन स्थित  ‘अन्तर्राष्ट्रीय श्रम - अधिकार संगठन ‘ तथा अमेरिकी इस्पात कर्मचारी संयुक्त यूनियन ने यह मुकदमा किया है . मुद्दई पक्षों ने आरोप लगाया कि कोका - कोला बोतलबन्द करने वाली कम्पनी ने अर्धसैनिक सुरक्षा बलों से सांठ- गांठ की है. इसके तहत चरम हिन्सा , हत्या , यातना तथा गैर कानूनी तरीके से निरुद्ध रखकर यूनियन नेताओं को ख़ामोश कर दिया जाता है . इसके अलावा यह मांग की गयी है कि कोका - कोला अपनी आनुषंगिक बोतलबन्द करने वाली कम्पनी की इन कारगुजारियों की जिम्मेदारी ले तथा इन अपराधों का हर्जाना भरे . इस मुकदमे में कोका -कोला के अलावा उसकी दो बोतलबन्द करने वाली आनुषंगिक कम्पनियों बेबीदास तथा पैनामको को प्रतिवादी बनाया गया है .

  इस मामले में ३१ मार्च , २००३ को अदालत ने फैसला दिया कि बोतलबन्द करने वाली दोनों कम्पनियों के खिलाफ़ अमेरिकी अदालत में मामला चलने योग्य है तथा ‘ यातना पीडित संरक्षण कानून ‘ के तहत भी मुद्दईगण दावा कर सकते हैं . इस निर्णय में कोका - कोला कम्पनी तथा कोका - कोला - कोलोम्बिया को इस आधार पर अलग रखा गया कि बोतलबन्द करने की बाबत हुए समझौते के अन्तर्गत श्रम-सम्बन्ध नहीं आते हैं . बहरहाल , मुकदमा करने वाली यूनियन व मजदूर नेता फैसले के इस हिस्से से सहमत नही हैं चूंकि कोका - कोला ने २००३ में बोतलबन्द करने वाली पैनामको का अधिग्रहण कर लिया था . मजदूर नेताओं का मानना है कि कोका - कोला के एक इशारे से यह आतंकी अभियान रुक सकता है .फिलहाल २१ अप्रैल २००४ को कोका -कोला को मुकदमे में पक्ष माने जाने की प्रार्थना के साथ संशोधित मुकदमा कायम कर दिया गया है .

  यह गौरतलब है कि बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के परिसंघ द्वारा यह मांग उठाई जाती रही है कि निगमों को इसके कानून के दाएरे से अलग करने के लिए कानून में संशोधन किया जाना चाहिए . बहरहाल, अमेरिकी उच्चतम न्यायालय यह मांग अमान्य कर चुका है . यातना पीडित संरक्षण अधिनियम  के अन्तर्गत निगमों को ‘व्यक्ति’ न मानने का तर्क भी अदालत ने अस्वीकृत कर दिया है . यह गौरतलब है की इसी अमेरिकी कानून के अन्तर्गत भोपाल गैस पीडित महिला उद्योग संगठन की साथियों ने हत्यारी बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड एवं उसके तत्कालीन अध्यक्ष एन्डर्सन के खिलाफ़ मुकदमा ठोका है .

[अगली प्रविष्टि : कोला कम्पनियों द्वारा दोषसिद्ध रंगभेद ]

मंगलवार, जनवरी 22, 2008

कविता : इतिहास में जगह : राजेन्द्र राजन

वे हर वक्त पिले रहते हैं

इतिहास में अपनी जगह बनाने में

 

सिर्फ उन्हें मालूम है

कितनी जगह है इतिहास में

शायद इसीलिए वे एक दूसरे को

धकियाते रहते हैं हर वक्त

 

उनकी धक्कामुक्की

मुक्कामुक्की से बनता है

उनका इतिहास

 

इस तरह

इतिहास में अपनी जगह बना

लेने के बाद

वे तय करते हैं

इतिहास में दूसरों की जगह

 

जो इतिहास में उनकी बतायी

हुई जगह पर

रहने को राजी नहीं होते

उन्हें वे रह रहकर

इतिहास से बाहर कर देने की धमकियाँ देते हैं

 

उनकी धमकियों का असर होता है

तभी तो इतिहास में

उचित स्थान पाने के इच्छुक

बहुत-से लोग

जहां कह दिया जाता है

वहीं बैठे रहते हैं

कभी उठकर खड़े नहीं होते ।

- राजेन्द्र राजन

स्रोत : सामयिक वार्ता/जनवरी २००८

गुरुवार, जनवरी 03, 2008

भोगवाद और ‘ वामपंथ का व्यामोह ‘ (३) : ले. सुनील

पिछले भाग : प्रथम , द्वितीय
सोवियत संघ जैसी व्यवस्था की वकालत करने वाले प्रभात पटनायक को इस बात का भी जवाब देना होगा कि आखिर क्यों सोवियत संघ एवं अन्य साम्यवादी देश ताश के पत्तों की तरह बिखर गए ? उनमें क्या अन्तर्विरोध थे ?क्या ऐसा नहीं है कि पूंजीवादी देशों जैसा ही औद्योगीकरण करने के चक्कर में सोवियत संघ ने भी अपने अंदर आंतरिक उपनिवेश विकसित किए , गांव तथा खेती का शोषण किया , क्षेत्रीय विषमताएं बढ़ाई तथा पूर्वी यूरोपीय देशों एवं अपने गैर-यूरोपीय हिस्सों के साथ औपनिवेशिक संबंध कायम किए ? इससे भी यही निष्कर्ष निकलता है कि बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण ही समस्या की जड़ है । इसका विकल्प ढूंढ़ना होगा । जाहिर है कि यह विकल्प गांधी की ओर ले जाता है ।
प्रभात पटनायक एक प्रखर , ईमानदार और सचेत वामपंथी बुद्धिजीवी होते हुए भी सही निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते हैं । ऐसा लगता है कि आधुनिक औद्योगीकरण के प्रति एक प्रकार का मोह मार्क्सवादी चिंतकों में व्याप्त है । इसके विनाशकारी नतीजी सामने दिखाई देते हुए भी वे इसके विकल्प के बारे में सोचे नहीं पाते । यह मोह कहीं न कहीं आधुनिक जीवन शैली के प्रति मोह से निकला है । इस मोह की झलक तब दिखाई देती है , जब प्रभात पटनायक कहते हैं कि बड़े उद्योगों से पैदा होने वाली चीजें हम छोड़ नहीं सकते , वे हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं । यदि वर्तमान विवाद के ठोस सन्दर्भ में देखें , तो शायद पटनायक कहना चाहते हैं कि सिंगूर में टाटा द्वारा बनाई जाने वाली कारें जरूरी हैं ,चाहे टाटा बनाए , चाहे वे सरकारी कारखानों में बनें । लेकिन निजी कारों से लेकर विलासितायुक्त भोगवादी आधुनिक जीवन की तमाम बढ़ती जरूरतों के कारण ही दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधंध दोहन व विनाश हो रहा है और इन संसाधनों से जुड़े लोगों का विस्थापन , वंचन और उत्पीड़न बढ़ रहा है । इसी के कारण धरती गर्म हो रही है और पर्यावरण के अभूतपूर्व संकट पैदा हो रहे हैं । ये अब मानी हुई बातें हैं , लेकिन लगता है मार्क्सवादी चिंतकों ने अभी तक इन्हें अपनी सोच और अपने विश्लेषण का हिस्सा नहीं बनाया है ।
आधुनिक जीवन शैली और आधुनिक औद्योगीकरण के प्रति मोह ही हमें उस राह पर ले जाता है , जो सिंगूर और नंदीग्राम तक पशुंचाती है । यदि विकास का यही मॉडल है और हर हालत में औद्योगीकरण करना ही है , तो टाटा और सालेम समूह की शरण में जाने में कोई हर्ज मालूम नहीं होगा । इस जीवन शैली व विकास की चकाचौंध में डूबे मध्यम वर्ग का समर्थन भी इसे मिल जाएगा , जिसे पश्चिम बंग के मुख्य्मन्त्री जनादेश कह रहे हैं । तब सैंकड़ों सिंगूर तथा हजारों नन्दीग्राम घटित होते रहेंगे। चीन की ही तरह पश्चिम बंगाल में चाहे नाम साम्यवाद का रहेगा , लेकिन पूंजीवाद का नंगा नाच होता रहेगा । यदि इस वामपंथ को इस दुर्गति व हश्र से बचाना है , तो अभी भी वामपंथी विचारकों के लिए इस व्यामोह से निकलकर , अनुभवों की रोशनी में , नए सिरे से अपने विचारों व नीतियों को गढ़ने का एक मौका है । यह मौका शायद दुबारा नहीं आएगा ।
[ लेखक समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । डाक सम्पर्क : ग्राम/पोस्ट -केसला,वाया-इटारसी ,जि. होशंगाबाद , (म.प्र.) -४६११११, फोन ०९४२५०४०४५२ ]
विषय से सम्बन्धित सुनील के अन्य लेख :
औद्योगीकरण का अन्धविश्वास : ले. सुनील ,
नारोदनिक,मार्क्स,माओ और गाँव-खेती : ले. सुनील ,
‘पूंजी’,रोज़ा लक्ज़मबर्ग,लोहिया : ले. सुनील (3) ,
औद्योगिक सभ्यता ,गाँधी ,नए संघर्ष : ले. सुनील(४)) ,
औद्योगिक सभ्यता के निशाने पर खेती-किसान : ले.सुनील (५) ,
खेती की अहमियत और विकल्प की दिशा:ले. सुनील(६) ,

मंगलवार, जनवरी 01, 2008

वामपंथ का व्यामोह (२) : ले. सुनील

   भाग एक यहाँ पढ़ें

 पश्चिम बंग की सरकार जिस प्रकार का औद्योगीकरण कर रही है , उसके खिलाफ यह एक स्पष्ट बयान है । पश्चिम बंग सरकार और माकपा नेतृत्व के इस तर्क को पटनायक अस्वीकार कर देते हैं कि पश्चिम बंगाल के विकास के लिए एवं बेरोजगारी की समस्या हल करने के लिए इस प्रकार का औद्योगीकरण जरूरी है और आज की परिस्थितियों में यह औद्योगीकरण देशी-विदेशी कंपनियों के माध्यम से ही होगा । हालांकि लेख में बाद में यह तर्क भी दिया गया है कि केन्द्र सरकार नव उदारवादी नीतियों को राज्य सरकारों पर कई तरीकों से लाद रही है और उन्हें अपनाने के लिए दबाव डाल रही है । ऐसी हालत में , एक राज्य सरकार के लिए स्वतंत्र एवं अलग राह पकड़ना बहुत मुश्किल है । फिर भी , पश्चिम बंग की स्थिति के प्रति प्रभात पटनायक की शिकायत एवं आलोचन छिपी नहीं रहती । अन्यत्र केरल सरकार की तारीफ़ में लेख लिखते हुए उन्होंने कहा है कि राज्य सरकारों के पास विकल्प हैं ।वे व्यंगपूर्वक कहते हैं , ' भारत में आज यह स्थिति है कि राज्य सरकारों की परियोजनाओं के लिए पूंजीपति एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं करते , बल्कि राज्य सरकारें पूंजीपतियों को आकर्षित करने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रही हैं । टाटा  को सिंगुर में ही जमीन चाहिए , कहीं अन्यत्र नहीं , और यदि नहीं मिली तो वे उत्तराखण्ड जाने की धमकी देते हैं ।'

    प्रभात पटनायक यह भी स्वीकार करते हैं कि  रोजगार पैदा करने एवं बढ़ाने में असफलता सिर्फ कॉर्पोरेट उद्योगों तक सीमित नही है । समस्या बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण में ही है ।  चीन में भी पिछले कुछ सालों में औद्योगिक रोजगार में बढोत्तरी नहीं के बराबर हुई है । पारम्परिक उद्योगों का स्थान बड़े उद्योगों के लेने  और तकनालाजी की प्रगति के कारण पैदा होने वाली बेरोजगारी की ओर भी उनका ध्यान है । लेकिन इतना कहने के बाद वे कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि 'औद्योगीकरण' होना ही नहीं चाहिए । बड़े उद्योगों से हमें बहुत सारी चीजें मिलती हैं,जो हमारे दैनन्दिन जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं । बड़े उद्योगों और औद्योगीकरण को जरूर बढ़ावा देना चाहिए, किंतु इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि आसपास की आबादी पर इसका विनाशकारी असर कम से कम हो ।किंतु कॉर्पॉरेट औद्योगीकरण में यह ध्यान रखना संभव नहीं है । इसलिए यह औद्योगीकरण सार्वजनिक क्षेत्र में या सहकारिता के माध्यम से होना चाहिए ।यही प्रभात पटनायक का विकल्प है । वे सोवियत संघ का भी उदाहरण देते हैं ,जहाँ एक बाजार-आधारित व्यवस्था के स्थान पर नियोजित अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों का विकास किया गया , तकनीकी व संरचनात्मक परिवर्तनों पर नियंत्रण रखा गया और इस कारण लोगों को कृषि से निकालकर उद्योगों में लगाया जा सका ।

    यहीं आकर प्रभात पटनायक भटक जाते हैं । बड़े उद्योगों पर आधारित आधुनिक औद्योगीकरण की रोजगार के सन्दर्भ में असफलता का सही विश्लेषण करने के बाद वे एक गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं । बड़े-बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण के बारे में कुछ और बातें वे नजरंदाज कर जाते हैं । एक ,इस तरह के औद्योगीकरण के लिए भारी मात्रा में पूंजी चाहिए । पूंजीवादी व्यवस्था हो या सोवियत संघ जैसी साम्यवादी व्यवस्था , कृषि एवं अन्य पारम्परिक ग्रामीण उद्योगों के शोषण एवं विनाश तथा अन्य देशों के शोषण से ही यह विशाल पूंजी जुटेगी । दूसरे शब्दों में , आंतरिक उपनिवेशों तथा बाहरी उपनिवेशों या नव-उपनिवेशों का निर्माण एवं शोषण इस प्रकार के औद्योगीकरण में निहित है । दो , अब यह बात खुलकर सामने आ रही है कि बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण की प्राकृतिक संसाधनों की भूख भी बहुत जबरदस्त है , जिसके कारण नए-नए संकट पैदा हो रहे हैं । जल-जंगल-जमीन से लोगों की बेदखली , विस्थापन तथा विनाश भी इस में अनिवार्य रूप से निहित है । इसलिए स्थानीय आबादी पर विनाशकारी असर को ज्यादा कम करना संभव नहीं है , चाहे वह पूंजीवादी व्यवस्था हो या साम्यवादी व्यवस्था । इसके लिए तो आधुनिक औद्योगीकरण का ही विकल्प ढूंढना होगा ।

    प्रभात पटनायक ने 'पूंजी के आदिम संचय' की नयी स्थितियों का जिक्र किया है , जिसमें उद्योगपति सरकार से रियायत मांगते हैं , लोगों को विस्थापित करते हैं, जमीन बहुत सस्ती दरों पर हासिल करते हैं और जमीन का सट्टात्मक धंधा करके भी विशाल कमाई करते हैं । मार्क्स ने इस शब्दावली का  इस्तेमाल इंग्लैंड में बड़े उद्योगों के हितों के लिए बड़े पैमाने पर किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने की प्रक्रिया को समझाने के लिए किया था। प्रभात पटनायक इसे 'अतिक्रमण के माध्यम से पूंजी संचय' का नाम देना चाहते हैं।लेकिन प्रभात पटनायक हों या मार्क्स के अन्य अनुयायी , उन्हें एक बात अब तक के अनुभव से समझ लेना चाहिए । वह यह कि सरकार की मदद से प्राकृतिक संसाधनों को 'माटी के मोल' हड़पने और उनसे लोगों को बेदखल करने की यह प्रक्रिया औद्योगिक पूंजीवाद में कहीं न कहीं निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । यह पूंजी का आदिम संचय नहीं, निरंतर चलने वाला बलात संचय है ।पूंजीवाद का विकास इस पर अनिवार्य रूप से टिका है ।

[ जारी ]

विषय से सम्बन्धित सुनील के अन्य लेख :

औद्योगीकरण का अन्धविश्वास : ले. सुनील ,

नारोदनिक,मार्क्स,माओ और गाँव-खेती : ले. सुनील ,

‘पूंजी’,रोज़ा लक्ज़मबर्ग,लोहिया : ले. सुनील (3) ,

औद्योगिक सभ्यता ,गाँधी ,नए संघर्ष : ले. सुनील(४)) ,

 औद्योगिक सभ्यता के निशाने पर खेती-किसान : ले.सुनील (५) ,

खेती की अहमियत और विकल्प की दिशा:ले. सुनील(६) ,

 

रविवार, दिसंबर 23, 2007

मोदी की जीत गुजरात की शर्मनाक हार है

    मोदी द्वारा गुजरात की जनता का साम्प्रदायिकीकरण फिर सफलतापूर्वक प्रकट हुआ। उसका विकल्प न होना दुर्भाज्ञपूर्ण है । कांग्रेस का भोथरा सेक्यूलरवाद और मोदी की कांग्रेसी आर्थिक नीति गुजरात की जनता के लिए बुरे दूरगामी परिणाम लाएगी । हिटलर ने भी चुनाव जीता था और बहुसंख्यक की फिरकापरस्ती और उन्माद पर सवार हो कर राजीव गाँधी ने भी। एक झूठा दर्प भी हिटलर ने पैदा किया था, मोदी ने भी किया है। गनीमत है कि अभी भी हिटलर जितनी सफलता उसे नहीं मिली है । डॉ. लोहिया की बात याद आ रही है : गद्दार अपने आप में या गद्दारी भी खतरनाक नही होती , जनता का समर्थन न मिलने पर वह बेमानी साबित हो जाती है। गद्दारी खतरनाक तब हो जाती है जब उसको जनता का समर्थन मिल जाता है। राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद का प्रयोग सीमित दायरे में सफल होगा- जिन सूबों में सिर्फ दो दल होंगे , लगभग एक जैसे।

मंगलवार, दिसंबर 11, 2007

भारत का कुलीकरण (अंतिम) :टेक्नो बाबू का उदय : गंगन प्रताप

टेक्नो बाबू का उदय

    भारत जिस किस्म की सूचना टेक्नॉलॉजी (आई.टी.) में लगा है उसे राजेश कोचर ने "सूचना छेड़छाड़" की संज्ञा दी है । " यदि आई.टी. को हम एक नई सायकल डिज़ाइन करने जैसा मानें , तो भारत को जो काम सौंपा गया है वह मात्र पंचर जोड़ने का है ।" कोचर इसे कुलीकरण कहते हैं :

    " ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में जो औपनिवेशिक विज्ञान शुरु किया था और जिसमें देशी लोगों को नियुक्त किया गया था , वह प्रयोगशाला विज्ञान नहीं बल्कि मैदानी विज्ञान ( भूगोल,भूगर्भ विज्ञान,वनस्पति शास्त्र और यहाँ तक कि खगोलशास्त्र) था । आज एक सदी बाद फिर पश्चिमी देश लोगों को नियुक्त कर रहे हैं । यह काम देशांतर पर टिका है- पश्चिमी देशों का दिन अब २४ घण्ते का है - अंतर सिर्फ इतना है कि दफ्तर का काम अब ओवर टाइम देकर नहीं करवाया जाता बल्कि एक-तिहाई वेतन देकर करवाया जाता है । "

    इस तरह हम टेक्नो-बाबुओं के राष्ट्र बनकर रह गए हैं ।

    विचारों के इस पुंज का समापन मैं फ्राइडमैन के एक साक्षात्कार से करना चाहूँगा । यह साक्षात्कार मेरे एक मित्र ने मुझे भेजा था :

" यदि  आपका सामान ब्रिटिश एयर या स्विस एयर में गुम हो जाए तो आप इसकी तलाश के लिए फोन करते हैं । जो व्यक्ति जवाब देता है वह बैंगलोर में है । यदि आपके डेल कम्प्यूटर में कोई दिक्कत है और आप फोन करते हैं तो दूसरे छोर पर बैठा व्यक्ति एक भारतीय होगा जो बैंगलोर में बैठा है । यह शहर हर वर्ष विभिन्न इंजीनियरिंग व कम्प्यूटर विज्ञान संस्थाओं से करीब ४०,००० तकनीकी स्नातक तैयार करता है।ये सब किसी न किसी अमरीकी कम्पनी को बैकरूम क्षमता प्रदान करने में खप जाते हैं ,बैंगलोर में बैठे-बैठे।"

    जी हां , सिर्फ बैकरूम क्षमताएं , जबकि "केन्द्रीय क्षमताएं" यू.एस. में ही बनी रहती हैं । तो,अब आप समझ गए होंगे कि ए.एम. नाइक को गुस्सा क्यों आता है।जो बात फ्राइडमैन नहीं देख पाते उसे नाइक पकड़ते हैं- देश के सब से होनहार युवा धीरे-धीरे शेष विश्व के लिए टेक्नो कुली बनते जा रहे हैं । आपको उत्तरी अमरीका या युरोप के होशियार युवा किसी भारतीय या चीनी कम्पनी के लिए ऐसी कुलीगिरी करते नहीं मिलेंगे । इंफोसिस और विप्रो का चमत्कार यही है कि उन्होंने देश के सबसे होशियार लड़के-लड़कियों को इकट्ठा करके उन्हें उत्तरी अमरीका , युरोप , और जापान का टेक्नो कुली बना दिया है। सच्चाई यह है कि माइक्रोसॉफ़्ट या ओरेकल या सिस्को एम.आई.टी. और कैलटेक के होशियार स्नातकों को टेक्नो कुली बना बना कर दुनिया की सबसे अमीर कम्पनियाँ नहीं बनीं हैं। ये लोग तब भारत और चीन के लिए काम नहीं करते जब हम नींद में होते हैं ।यह एक ऐसा असंतुलन है जिसके परिणाम घातक हो सकते हैं। इसके चलते वैश्वीकरण तो कुलीकरण का पर्याय हो जाएगा।

( स्रोत फीचर्स )

गुरुवार, दिसंबर 06, 2007

भारत का कुलीकरण : लेखक - गंगन प्रताप







देश के सबसे होनहार युवा धीरे - धीरे शेष विश्व के लिए टेक्नो-कुली बनते जा रहे हैं । इंफोसिस और विप्रो का चमत्कार यही है कि उन्होंने देश के सबसे होशियार लड़के-लड़कियों को इकट्ठा करके उन्हें उत्तरी अमरीका , युरोप और जापान का टेक्नो-कुली बना दिया है । यह एक ऐसा असंतुलन है जिसके परिणाम घातक हो सकते हैं। इसके चलते वैश्वीकरण कुलीकरण का पर्याय हो जायेगा।इस महत्वपूर्ण मगर उपेक्षित मुद्दे पर कुछ विचारों व प्रतिध्वनियों की बानगी प्रस्तुत है। स्रोत : स्रोत , दिसम्बर २००५


केरल मॉडल


ई. एम. एस. नम्बुदरीपाद की संकलित रचनाओं के २१वें खण्ड में उन्होंने १९५८ के केरल की बुनियादी समस्या को इन शब्दों में पकड़ा था :



" राज्य की बुनियादी समस्या यह है कि वह अपने विशाल मानव संसाधन का उपयोग नहीं करता । राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की साज संभाल करने की बजाय केरल के लोग देश भर में क्लर्क और कुली बन रहे हैं ।"


भारतीय मॉडल


ई. एम.एस. ने जो बात केरल के बारे में कही थी , वह आज पूरे देश के बारे में कही जा सकती है । हमारे सर्वोत्तम व सबसे प्रतिभावान लोग ( आई.आई.टी. वगैरह ) दुनिया भर में क्लर्क और कुली बनते जा रहे हैं । भारत की बुनियादी समस्या अपने विशाल मानव संसाधन का उपयोग न कर पाने की हो गयी है । देश के प्राकृतिक संसाधनों को न संभालकर , भारतीय लोग पलायन कर रहे हैं । हमारे देश के सबसे प्रतिभावान युवा ( ७०,००० प्रवासी + २,००,००० एल-१ और एच-१ बी व छात्र वीसाधारी ) देश छोड़कर अमरीका चले जाते हैं ।


हमारे यहां इन्सानों की तरक्की पर चंद बिरले व असाधारण क्षमता वाले लोगों का बोलबाला रहता है। प्रतिभा पलायन एक छन्नी है, जिसके ज़रिए देश के सर्वोत्तम प्रशिक्षित व्यक्ति अन्य देशों में ( आजकल अधिकतर यू.एस.ए) चले जाते हैं। इस लिहाज से देखें, तो हमारे जैसे प्रतिभादानी देशों को इससे भारी नुकसान होता है और इस दान के प्राप्तकर्ता देशों को भरपूर लाभ भी होता है । अर्थात प्रतिभा पलायन एक ऐसी विकट समस्या है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।


जूठन की जूठन की जूठन


इन्द्रजीत गुप्त और रामी दत्ता हर्दसमलानी के साथ बातचीत के दौरान एल एण्ड टी के अध्यक्ष ए. एम. नाइक ने सवाल किया था कि "फिर भारत की सड़कें , बंदरगाह और पुल कौन बनायेगा?" एल एण्ड टी में आज ३०,००० कर्मचारी हैं ।निर्माण कार्य में लगी इस कम्पनी में १२,००० इजीनियर्स हैं । इसे हर साल २००० इजीनियर्स की जरूरत होती है ।मगर हर साल २००० इंजीनियर्स कंपनी छोड़कर चले जाते हैं और नए इंजीनियर्स आसानी से नहीं मिलते। कारण यह है कि आज ज्यादातर इंजीनियरिंग स्नातक उत्पादन के क्षेत्र में काम नहीं करना चाहते हैं ।ये सब नई अर्थव्यवस्था की सूचना टेक्नॉलॉजी कम्पनियों में काम करने को उत्सुक हैं ।जब १९६३ में स्वयं नाइक ने स्नातक उपाधि प्राप्त की ह्ती, तब इंजीनियरिंग की तीन पसंदीदा शाखाएं थीं : मेकेनिकल ,इलेक्ट्रिकल और सिविल। आज अधिकांश छात्र कंप्यूटर विज्ञान और इलेक्ट्रॉनिक्स की कतारों में नजर आते हैं। जो मेकेनिकल लेते हैं , वे भी एल एण्ड टी जैसी कम्पनी में २ साल काम करके विशेषज्ञता हासिल करके किसी आई.टी. कम्पनी में जाना चाहते हैं ।


नाइक का मुद्दा सीधा-सा है - देश में किसी को भी प्रतिभा प्लायन की प्रकृति की जानकारी नहीं है । किसी को भी इस बात का अन्दाज़ नहीं है कि विकसित देश भारतीय प्रतिभा भण्डार का कितना लाभ ले रहे हैं । यह सही है कि आज वैश्विक इजीनियरिग कम्पनियाँ शाखाएं भारत में खोल रही हैं मगर वे उत्पादन चीन में करवाती हैं । " यहां हम १७ अरब डॉलर के आउट्सोर्सिंग जॉब्स पर इतरा रहे हैं मगर हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इस कार्य ने अन्य देशों के लिए ३०० अरब डॉलर की जायदाद निर्मित की है ।और देश से बाहर जाने वाली प्रत्येक ३ करोड़ डॉलर की इंजीनियरिंग सेवाओं के कारण देश में १ अरब डॉलर का नुकसान होता है।" यह तर्क नाइक का है। वे आगे कहते हैं - "भारत में प्रतिभा उपलब्ध ही नहीं है। इंजीनियरिंग कॉलेजों से उत्तीर्ण होने वाले करीब ९५ प्रतिशत छात्र यू.एस. और युरोप या दुनिया के अन्य भागों का रुख करते हैं ।हमारे पास तो जूठन की जूठन की जूठन आती है, जो थोड़ा पॉलिश होकर हमें छोड़कर चली जाती है।"


[ जारी ]

शनिवार, दिसंबर 01, 2007

अहमद पटेल के भरोसे नरेन्द्र मोदी

    रेन्द्र मोदी के 'विकास' और मनमोहन सिंह अथवा बुद्धदेव के 'विकास' में फर्क नहीं है। स्वदेशी जागरण मंच अथवा उमा भारती का रिलायन्स फ्रेश के प्रति विरोध क्रमश: राँची और इन्दौर में होता है । अहमदाबाद , वडोदरा और सूरत में यह विकास (रिलायन्स फ्रेश टाइप) फलता - फूलता है । ' विशेष आर्थिक क्षेत्र ' और उनके लिए बनने वाले परमाणु बिजली घर यदि बंगाल के सिंगूर के निकट बनते हैं तो गुजरात के भावनगर के निकट भी बन रहे हैं ।

    सिर्फ़ साम्प्रदायिकता को राजनीति का आधार बनाने की जैसे एक सीमा है वैसे ही साम्प्रदायिकता-विरोध की राजनीति करने वालो की भी एक सीमा होती है यदि वे   आर्थिक नीतियों का विकल्प नहीं दे पाते ।   

     गुजरात से लोकसभा के लिए चुने गए सदस्यों की संख्या में भाजपा और कांग्रेस में उन्नीस - बीस (मुहावरा) का फर्क है । इसके बावजूद मोदी विरोधी सामाजिक तबके ( पटेल ) के भाजपा के विरोध में मुखर न हो पाना मोदी के हक में सब से बड़ी ताकत है । केशूभाई पटेल समर्थक कई विधायक भले ही इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं परन्तु स्वयं केशूभाई और कंशीराम राणा जैसे मोदी विरोधी नेताओं ने भाजपा नहीं छोड़ी है । वे अभी भी ख्वाब देख रहे हैं कि चुनाव के बाद वे ही भाजपा विधायक दल के नेता चुने जाएंगे। इस परिस्थिति का पूरा पूरा लाभ उठाने के लिए नरेन्द्र मोदी एक फिरकावाराना महीन खेल खेल रहे हैं । खुद से विमुख हो रही पटेल बिरादरी से मोदी पूछते हैं , ' क्या आप नरेन्द्र मोदी की जगह अहमद पटेल को मुख्यमन्त्री बनाना चाहते हैं ? '

    नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रूप मे किसी नेता के न प्रस्तुत होने का लाभ भाजपा को मिल रहा है । राज्य में सक्रिय दोनों प्रमुख दलों की समान आर्थिक नीतियों का खामियाजा अन्तत: गुजरात के दलित , आदिवासी , किसान और अकलियतों को भुगतना पड़ सकता है।

शुक्रवार, नवंबर 23, 2007

बम धमाके : सच के