मंगलवार, सितंबर 09, 2008

इन्स्टीट्यूट ऑफ़ साइन्स बैंगलोर में गांधी

[ गत दिनों मशहूर गीतकार गुलज़ार बैंगलोर स्थित राष्ट्रीय महत्व के संस्थान इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ़ साइन्स गए थे । 'साहित्य के झरोखे से विज्ञान' विषयक प्रवचन तथा युवा वैज्ञानिकों से सवाल जवाब भी हुए । इसकी सुन्दर रिपोर्ट वहाँ के शोध छात्र श्रीराम यादव ने यहाँ दी है । इस पोस्ट से मुझे कुछ याद आया । १९८१ में समाजवादी अध्ययन केन्द्र, वाराणसी की पत्रिका संभावना का 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषांक' में मैंने गांधीजी के मुख और कलम से प्रकट कुछ स्फुट विचारों को संकलित कर प्रस्तुत किया था । १२ जुलाई १९२७ को इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइन्स जिसे टाटा इन्स्टीट्यूट कहा जाता रहा है में दिए गए (अंग्रेजी में )प्रवचन से प्रमुख अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । ]

   "  मैं सोच रहा था कि यहाँ कहाँ आ गया ? मुझ जैसे देहाती का , जिसकी वाणी यह सब देख कर विस्मय और आश्चर्य से मूक हो जाए , यहाँ क्या काम हो सकता है ? मैं ज्यादा कुछ कहने की मन:स्थिति में नहीं हूँ । मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि आप यहाँ जो बड़ी बड़ी प्रयोगशालाएं और बिजली के वैज्ञानिक उपकरण देख रहे हैं , वह सब करोड़ों सामान्य जनों के इच्छा और अनिच्छा से दिये गये , श्रम का फल है । क्योंकि टाटा ने जो तीस लाख रुपये दिये वह कहीं बाहर से नहीं आये थे , और मैसूर द्वारा दिया गया सारा अनुदान भी कहीं और से नहीं बेगार से ही प्राप्त हुआ था । अगर हम ग्रामीणों के पास जाकर उन्हें समझायें कि हम लोग उनके पैसे का उपयोग किस तरह उन बड़ी बड़ी इमारतों और कारखानों को खड़ा करने में कर रहे हैं जिनसे उन्हें तो नहीं पर शायद उनकी भावी पीढ़ियोंको लाभ हो सकता है तो वे इस बात को नहीं समझेंगे । वे इस बात पर कोई ध्यान ही नहीं देंगे । लेकिन हम उन्हें यह सब समझाने की कोशिश भी नहीं करते , उन्हें कभी कोई महत्व ही नहीं देते और उनसे जो मिलता है उसे हक़ मान कर उनसे ले लेते हैं और यह भूल जाते हैं कि " जिसका प्रतिनिधित्व नहीं है उस पर कर भी नहीं लगाया जा सकता " यह सिद्धान्त उन पर भी लागू होता है । यदि आप सचमुच इस सिद्धान्त को उन पर लागू करें और यह महसूस करें कि उनके प्रति भी आपकी जवाबदेही है तो आपको इन तमाम उपकरणों का एक और पहलू भी नजर आयेगा । तब आपके हृदय में उनके लिये विशाल स्थान होगा , और वह उनके लिए सहानुभूति से भरा होगा और यदि आप उस भावना को स्वच्छ और विमल रखेंगे तो आप अपने ज्ञान का उपयोग उन करोड़ों लोगों के कल्याण के लिये करेंगे जिनके श्रम के बल पर आप शिक्षा प्राप्त करते हैं । .................

    ............ आप जो आविष्कार करें , उन सब का उद्देश्य अगर गरीबों की भलाई नहीं है तो आपके तमाम कल कारखाने और प्रयोगशालायें , जैसा कि राजगोपालचारी ने विनोद में कहा , वास्तव में शैतान के कारखानों से अधिक कुछ नहीं होंगे । अच्छा तो , अगर आप सोचना चाहते हों जैसा कि सभी अनुसन्धान-छात्रों को चाहिए तो आपके सोचने के लिए अब मैंने काफी मसाला दे दिया है । ".... बंगलोर १२ जुलाई १९२७ . 

शुक्रवार, अप्रैल 11, 2008

शिक्षा , मलाईदार परतें और गैर आरक्षित क्रीमी लेयर

शिक्षा की अपनी एक दुनिया है । वहीं शिक्षा-जगत व्यापक विश्व का एक हिस्सा भी है - एक उप व्यवस्था । उप व्यवस्था होने के कारण व्यापक विश्व के- मूल्य , विषमतायें , सत्ता सन्तुलन आदि के प्रतिबिम्ब आप यहाँ भी देख सकते/सकती हैं । हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था उस जमाने के मूल्य , विषमताओं , सत्ता सन्तुलन को बरकरार रखने का एक औजार होती है । हमारी तालीम में एक छलनी-करण की प्रक्रिया अन्तर्निहित है । लगातार छाँटते जाना । मलाई बनाते हुए, छाँटते जाना। उनको बचाए रखना जो व्यवस्था को टिकाए रखने के औजार बनने ‘लायक’ हों । इस छँटनी-छलनी वाली तालीम का स्वरूप बदले इसलिए एक नारा युवा आन्दोलन में चला था - ‘खुला दाखिला ,सस्ती शिक्षा । लोकतंत्र की यही परीक्षा’ यानि जो भी पिछली परीक्षा पास कर चुका हो और आगे भी पढ़ना चाहता हो , उसे यह मौका मिले। १९७७ में यही नारा लगा कर हमारे विश्वविद्यालय में ‘खुला दाखिला’ हुआ था । इस नारे को मानने वाले उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोधी थे और नौकरियों में विशेष अवसर के पक्षधर । इस नारे की विफलता के कारण शिक्षा में आरक्षण की आवश्यकता आन पड़ी ।
न्यायपालिका (जहाँ आरक्षण नहीं लागू है) ने सांसद-विधायकों के बच्चों को क्रीमी लेयर मान कर आरक्षण से वंचित रखने की बात कही है । क्रीमी लेयर के कारण वास्तविक जरूरतमंद आरक्षण से वंचित हो जाते हैं यह माना जाता है। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति में क्रेमी लेयर के rider से न्यायपालिका ने इन्कार किया है । तीसरे तबके में क्रीमी लेयर की बाबत जज चुप हैं। क्या अनारक्षित वर्ग में मलाईदार परतें नहीं हैं ? क्या विश्वविद्यालयों में इस तबके मास्टरों के बच्चे उन्हीं विभागों में टॉप करने के बाद वहीं मास्टर नहीं बनते ? क्या अनारक्षित वर्ग के अफ़सरों के बच्चे अफ़सर नहीं बनते ? नेता के बच्चे नेता भी हर वर्ग में बनते हैं । गैर मलाईदार वर्गों के साथ उन्हें स्पर्धा में क्यों रखा जाता है ? गैर आरक्षित वर्ग के क्रीमी लेयर पर भी rider लगाने की बहस भी अब शुरु होनी चाहिए ।
पिछड़े वर्गों के कुछ अभ्यर्थी खुली स्पर्धा से भी चुने जाते हैं और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के भी । हर साल लोक सेवा आयोग द्वारा अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों के सामान्य वर्ग में चुने जाने की तादाद बढ़ने की स्वस्थ सूचना प्रेस कॉन्फ़रेन्स द्वारा दी जाती है। सामान्य सीटों पर उत्तीर्ण होने वाले पिछड़े वर्गों के अभ्यर्थियों की गिनती ‘कोटे’ के तहत क्यों नहीं की जाती इसे मण्डल कमीशन की रपट में बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कल दिए गए फैसले के बाद हमारे समाज की यथास्थिति ताकतें ( जैसे मनुवादी मीडिया और फिक्की , एसोकेम जैसे पूंजीपतियों के संगठन ) फिर खदबदायेंगी , यह लाजमी है ।

शनिवार, फ़रवरी 02, 2008

कोला कम्पनियों द्वाराश्रमिकों की हत्या , उत्पीड़न

इन दोनों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा गरीब देशों की इकाइयों में मजदूरों के साथ अत्यन्त अमानवीय कृत्य किए जाते हैं . दक्षिण अमेरिकी देश कोलोम्बिया में कोका - कोला कम्पनी द्वारा अपने मजदूरों पर दमन और अत्याचार सर्वाधिक चर्चित है . कोलोम्बिया की राष्ट्रीय खाद्य - पेय कामगार यूनियन - सिनालट्राइनाल ( SINALTRAINAL ) के अनुसार कोका - कोला की दक्षिणपन्थी सशस्त्र अर्धसैनिक गुंडा वाहिनी से सांठ - गांठ है तथा मजदूर नेताओं की हत्याओं का लम्बा सिलसिला , अपहरण , यूनियन गतिविधियों को कुचलने के लिए षडयंत्र ही कम्पनी की मुख्य रणनीति है . इन गिरोहों में कुछ पेशेवर सैनिक होते हैं और कुछ स्थानीय गुंडे . कोलोम्बिया में अमीर जमींदारों और नशीले पदार्थों के अवैध व्यवसाइयों ने ८० के दशक में वामपंथी विद्रोहियों का मुकाबला करने के लिए इनका गठन किया था . कोलोम्बिया के कई कोका - कोला संयंत्रों में इन्होंने अपने अड्डे या चौकियां बना ली हैं . इन संयंत्रों को वैश्वीकरण का प्रतीक मान कर वामपंथी विद्रोही इन पर हमला कर सकते हैं - यह बहाना देते हुए उनकी  ‘रक्षा ’ हेतु वे अपनी मौजूदगी को उचित बताते हैं . १९८९ से अब तक कोलोम्बिया के कोका - कोला संयंत्रों में कार्यरत आठ मजदूर नेताओं की हत्या इन गिरोहों द्वारा की जा चुकी है .

   वैसे,कोलोम्बिया में यूनियन नेताओं पर हिंसा एक व्यापक और आम घटना है . यह कहा जा सकता है कि कोलोम्बिया में श्रमिक संगठन बनाना दुनिया के अधिकतर मुल्कों से कहीं ज्यादा दुरूह काम है . एक अनुमान के अनुसार , १९८६ से अब तक वहां ३,८०० ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या हो चुकी है . श्रमिकों के अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुमान के अनुसार , दुनिया भर में होने वाली हर पांच ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की हत्याओं में से तीन कोलोम्बिया में होती हैं .

  कोलोम्बिया के कोरेपो स्थित कोका - कोला संयंत्र के यूनियन की कार्यकारिणी के सदस्य इसिडरो गिल की हत्या का मामला अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ है . घटनाक्रम इस प्रकार है . ५ दिसम्बर १९९६ , की सुबह एक अर्धसैनिक गिरोह से जुडे दो लोग मोटरसाइकिल से कोरेपो संयंत्र के भीतर पहुंचे . इन लोगों ने यूनियन नेता इसिडरो गिल पर दस गोलियां चलाईं जिससे उनकी मौत हो गयी . इसिडरो के सहकर्मी लुई कार्डोना ने बताया कि मैं काम पर था जब मैंने गोलियों की आवाज सुनी और इसिडरो के गिरते हुए देखा . मैं उसके पास दौड कर पहुंचा लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी . उसी रात यूनियन के दफ़्तर पर हमला हुआ . सभी दस्तावेज लूट लिए गये तथा दफ़्तर को जला दिया गया . कुछ घण्टों तक इस अर्धसैनिक गिरोह के अधिकारियों ने कार्डोना को रोक कर रखा . यहां से भाग निकलने में वह सफल रहा और स्थानीय पुलिस थाने में उसे शरण मिली . एक सप्ताह बाद इस अर्धसैनिक गिरोह के लोग फिर इस संयंत्र पर पहुंचे . इसिदरो गिल से जुडे सभी ६० मजदूरों को एक लाइन में खडा कर दिया गया और पहले से तैयार इस्तीफ़ों पर दस्तख़त करने का आदेश दिया गया . सभी ने दस्तख़त कर दिए . दो महीने बाद सभी कर्मचारियों ( जो सभी यूनियन से नहीं जुडे रहे ) को बर्खास्त कर दिया गया . २७ वर्षीय इसिडरो गिल इस संयंत्र में आठ वर्षों से कार्यरत था . उसकी विधवा एलसिरा गिल ने अपने पति की हत्या का विरोध किया तथा कोका - कोला से मुआवजे की मांग की . सन २०० में एलसिरा की भी इसी गिरोह ने हत्या कर दी . मृत दम्पति की दो अनाथ बेटियां रिश्तेदारों के पास छुप कर रहती हैं . कुछ समय बाद कोलोम्बिया की एक अदालत ने इसिडरो की हत्या के आरोपी लोगों को बरी कर दिया  इसिडरो

   जुलाई २००१ में अमेरिका की एक संघीय जिला अदालत में ‘विदेशी व्यक्ति क्षतिपूर्ति कानून ‘ के तहत मुकदमा कायम कर दिया गया . इसिडरो के परिजन व सिनालट्राइनाल के प्रताडित पांच यूनियन नेताओं की तरफ़ से वाशिंग्टन स्थित  ‘अन्तर्राष्ट्रीय श्रम - अधिकार संगठन ‘ तथा अमेरिकी इस्पात कर्मचारी संयुक्त यूनियन ने यह मुकदमा किया है . मुद्दई पक्षों ने आरोप लगाया कि कोका - कोला बोतलबन्द करने वाली कम्पनी ने अर्धसैनिक सुरक्षा बलों से सांठ- गांठ की है. इसके तहत चरम हिन्सा , हत्या , यातना तथा गैर कानूनी तरीके से निरुद्ध रखकर यूनियन नेताओं को ख़ामोश कर दिया जाता है . इसके अलावा यह मांग की गयी है कि कोका - कोला अपनी आनुषंगिक बोतलबन्द करने वाली कम्पनी की इन कारगुजारियों की जिम्मेदारी ले तथा इन अपराधों का हर्जाना भरे . इस मुकदमे में कोका -कोला के अलावा उसकी दो बोतलबन्द करने वाली आनुषंगिक कम्पनियों बेबीदास तथा पैनामको को प्रतिवादी बनाया गया है .

  इस मामले में ३१ मार्च , २००३ को अदालत ने फैसला दिया कि बोतलबन्द करने वाली दोनों कम्पनियों के खिलाफ़ अमेरिकी अदालत में मामला चलने योग्य है तथा ‘ यातना पीडित संरक्षण कानून ‘ के तहत भी मुद्दईगण दावा कर सकते हैं . इस निर्णय में कोका - कोला कम्पनी तथा कोका - कोला - कोलोम्बिया को इस आधार पर अलग रखा गया कि बोतलबन्द करने की बाबत हुए समझौते के अन्तर्गत श्रम-सम्बन्ध नहीं आते हैं . बहरहाल , मुकदमा करने वाली यूनियन व मजदूर नेता फैसले के इस हिस्से से सहमत नही हैं चूंकि कोका - कोला ने २००३ में बोतलबन्द करने वाली पैनामको का अधिग्रहण कर लिया था . मजदूर नेताओं का मानना है कि कोका - कोला के एक इशारे से यह आतंकी अभियान रुक सकता है .फिलहाल २१ अप्रैल २००४ को कोका -कोला को मुकदमे में पक्ष माने जाने की प्रार्थना के साथ संशोधित मुकदमा कायम कर दिया गया है .

  यह गौरतलब है कि बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के परिसंघ द्वारा यह मांग उठाई जाती रही है कि निगमों को इसके कानून के दाएरे से अलग करने के लिए कानून में संशोधन किया जाना चाहिए . बहरहाल, अमेरिकी उच्चतम न्यायालय यह मांग अमान्य कर चुका है . यातना पीडित संरक्षण अधिनियम  के अन्तर्गत निगमों को ‘व्यक्ति’ न मानने का तर्क भी अदालत ने अस्वीकृत कर दिया है . यह गौरतलब है की इसी अमेरिकी कानून के अन्तर्गत भोपाल गैस पीडित महिला उद्योग संगठन की साथियों ने हत्यारी बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड एवं उसके तत्कालीन अध्यक्ष एन्डर्सन के खिलाफ़ मुकदमा ठोका है .

[अगली प्रविष्टि : कोला कम्पनियों द्वारा दोषसिद्ध रंगभेद ]

मंगलवार, जनवरी 22, 2008

कविता : इतिहास में जगह : राजेन्द्र राजन

वे हर वक्त पिले रहते हैं

इतिहास में अपनी जगह बनाने में

 

सिर्फ उन्हें मालूम है

कितनी जगह है इतिहास में

शायद इसीलिए वे एक दूसरे को

धकियाते रहते हैं हर वक्त

 

उनकी धक्कामुक्की

मुक्कामुक्की से बनता है

उनका इतिहास

 

इस तरह

इतिहास में अपनी जगह बना

लेने के बाद

वे तय करते हैं

इतिहास में दूसरों की जगह

 

जो इतिहास में उनकी बतायी

हुई जगह पर

रहने को राजी नहीं होते

उन्हें वे रह रहकर

इतिहास से बाहर कर देने की धमकियाँ देते हैं

 

उनकी धमकियों का असर होता है

तभी तो इतिहास में

उचित स्थान पाने के इच्छुक

बहुत-से लोग

जहां कह दिया जाता है

वहीं बैठे रहते हैं

कभी उठकर खड़े नहीं होते ।

- राजेन्द्र राजन

स्रोत : सामयिक वार्ता/जनवरी २००८

गुरुवार, जनवरी 03, 2008

भोगवाद और ‘ वामपंथ का व्यामोह ‘ (३) : ले. सुनील

पिछले भाग : प्रथम , द्वितीय
सोवियत संघ जैसी व्यवस्था की वकालत करने वाले प्रभात पटनायक को इस बात का भी जवाब देना होगा कि आखिर क्यों सोवियत संघ एवं अन्य साम्यवादी देश ताश के पत्तों की तरह बिखर गए ? उनमें क्या अन्तर्विरोध थे ?क्या ऐसा नहीं है कि पूंजीवादी देशों जैसा ही औद्योगीकरण करने के चक्कर में सोवियत संघ ने भी अपने अंदर आंतरिक उपनिवेश विकसित किए , गांव तथा खेती का शोषण किया , क्षेत्रीय विषमताएं बढ़ाई तथा पूर्वी यूरोपीय देशों एवं अपने गैर-यूरोपीय हिस्सों के साथ औपनिवेशिक संबंध कायम किए ? इससे भी यही निष्कर्ष निकलता है कि बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण ही समस्या की जड़ है । इसका विकल्प ढूंढ़ना होगा । जाहिर है कि यह विकल्प गांधी की ओर ले जाता है ।
प्रभात पटनायक एक प्रखर , ईमानदार और सचेत वामपंथी बुद्धिजीवी होते हुए भी सही निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते हैं । ऐसा लगता है कि आधुनिक औद्योगीकरण के प्रति एक प्रकार का मोह मार्क्सवादी चिंतकों में व्याप्त है । इसके विनाशकारी नतीजी सामने दिखाई देते हुए भी वे इसके विकल्प के बारे में सोचे नहीं पाते । यह मोह कहीं न कहीं आधुनिक जीवन शैली के प्रति मोह से निकला है । इस मोह की झलक तब दिखाई देती है , जब प्रभात पटनायक कहते हैं कि बड़े उद्योगों से पैदा होने वाली चीजें हम छोड़ नहीं सकते , वे हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं । यदि वर्तमान विवाद के ठोस सन्दर्भ में देखें , तो शायद पटनायक कहना चाहते हैं कि सिंगूर में टाटा द्वारा बनाई जाने वाली कारें जरूरी हैं ,चाहे टाटा बनाए , चाहे वे सरकारी कारखानों में बनें । लेकिन निजी कारों से लेकर विलासितायुक्त भोगवादी आधुनिक जीवन की तमाम बढ़ती जरूरतों के कारण ही दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधंध दोहन व विनाश हो रहा है और इन संसाधनों से जुड़े लोगों का विस्थापन , वंचन और उत्पीड़न बढ़ रहा है । इसी के कारण धरती गर्म हो रही है और पर्यावरण के अभूतपूर्व संकट पैदा हो रहे हैं । ये अब मानी हुई बातें हैं , लेकिन लगता है मार्क्सवादी चिंतकों ने अभी तक इन्हें अपनी सोच और अपने विश्लेषण का हिस्सा नहीं बनाया है ।
आधुनिक जीवन शैली और आधुनिक औद्योगीकरण के प्रति मोह ही हमें उस राह पर ले जाता है , जो सिंगूर और नंदीग्राम तक पशुंचाती है । यदि विकास का यही मॉडल है और हर हालत में औद्योगीकरण करना ही है , तो टाटा और सालेम समूह की शरण में जाने में कोई हर्ज मालूम नहीं होगा । इस जीवन शैली व विकास की चकाचौंध में डूबे मध्यम वर्ग का समर्थन भी इसे मिल जाएगा , जिसे पश्चिम बंग के मुख्य्मन्त्री जनादेश कह रहे हैं । तब सैंकड़ों सिंगूर तथा हजारों नन्दीग्राम घटित होते रहेंगे। चीन की ही तरह पश्चिम बंगाल में चाहे नाम साम्यवाद का रहेगा , लेकिन पूंजीवाद का नंगा नाच होता रहेगा । यदि इस वामपंथ को इस दुर्गति व हश्र से बचाना है , तो अभी भी वामपंथी विचारकों के लिए इस व्यामोह से निकलकर , अनुभवों की रोशनी में , नए सिरे से अपने विचारों व नीतियों को गढ़ने का एक मौका है । यह मौका शायद दुबारा नहीं आएगा ।
[ लेखक समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । डाक सम्पर्क : ग्राम/पोस्ट -केसला,वाया-इटारसी ,जि. होशंगाबाद , (म.प्र.) -४६११११, फोन ०९४२५०४०४५२ ]
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औद्योगिक सभ्यता ,गाँधी ,नए संघर्ष : ले. सुनील(४)) ,
औद्योगिक सभ्यता के निशाने पर खेती-किसान : ले.सुनील (५) ,
खेती की अहमियत और विकल्प की दिशा:ले. सुनील(६) ,

मंगलवार, जनवरी 01, 2008

वामपंथ का व्यामोह (२) : ले. सुनील

   भाग एक यहाँ पढ़ें

 पश्चिम बंग की सरकार जिस प्रकार का औद्योगीकरण कर रही है , उसके खिलाफ यह एक स्पष्ट बयान है । पश्चिम बंग सरकार और माकपा नेतृत्व के इस तर्क को पटनायक अस्वीकार कर देते हैं कि पश्चिम बंगाल के विकास के लिए एवं बेरोजगारी की समस्या हल करने के लिए इस प्रकार का औद्योगीकरण जरूरी है और आज की परिस्थितियों में यह औद्योगीकरण देशी-विदेशी कंपनियों के माध्यम से ही होगा । हालांकि लेख में बाद में यह तर्क भी दिया गया है कि केन्द्र सरकार नव उदारवादी नीतियों को राज्य सरकारों पर कई तरीकों से लाद रही है और उन्हें अपनाने के लिए दबाव डाल रही है । ऐसी हालत में , एक राज्य सरकार के लिए स्वतंत्र एवं अलग राह पकड़ना बहुत मुश्किल है । फिर भी , पश्चिम बंग की स्थिति के प्रति प्रभात पटनायक की शिकायत एवं आलोचन छिपी नहीं रहती । अन्यत्र केरल सरकार की तारीफ़ में लेख लिखते हुए उन्होंने कहा है कि राज्य सरकारों के पास विकल्प हैं ।वे व्यंगपूर्वक कहते हैं , ' भारत में आज यह स्थिति है कि राज्य सरकारों की परियोजनाओं के लिए पूंजीपति एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं करते , बल्कि राज्य सरकारें पूंजीपतियों को आकर्षित करने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रही हैं । टाटा  को सिंगुर में ही जमीन चाहिए , कहीं अन्यत्र नहीं , और यदि नहीं मिली तो वे उत्तराखण्ड जाने की धमकी देते हैं ।'

    प्रभात पटनायक यह भी स्वीकार करते हैं कि  रोजगार पैदा करने एवं बढ़ाने में असफलता सिर्फ कॉर्पोरेट उद्योगों तक सीमित नही है । समस्या बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण में ही है ।  चीन में भी पिछले कुछ सालों में औद्योगिक रोजगार में बढोत्तरी नहीं के बराबर हुई है । पारम्परिक उद्योगों का स्थान बड़े उद्योगों के लेने  और तकनालाजी की प्रगति के कारण पैदा होने वाली बेरोजगारी की ओर भी उनका ध्यान है । लेकिन इतना कहने के बाद वे कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि 'औद्योगीकरण' होना ही नहीं चाहिए । बड़े उद्योगों से हमें बहुत सारी चीजें मिलती हैं,जो हमारे दैनन्दिन जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं । बड़े उद्योगों और औद्योगीकरण को जरूर बढ़ावा देना चाहिए, किंतु इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि आसपास की आबादी पर इसका विनाशकारी असर कम से कम हो ।किंतु कॉर्पॉरेट औद्योगीकरण में यह ध्यान रखना संभव नहीं है । इसलिए यह औद्योगीकरण सार्वजनिक क्षेत्र में या सहकारिता के माध्यम से होना चाहिए ।यही प्रभात पटनायक का विकल्प है । वे सोवियत संघ का भी उदाहरण देते हैं ,जहाँ एक बाजार-आधारित व्यवस्था के स्थान पर नियोजित अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों का विकास किया गया , तकनीकी व संरचनात्मक परिवर्तनों पर नियंत्रण रखा गया और इस कारण लोगों को कृषि से निकालकर उद्योगों में लगाया जा सका ।

    यहीं आकर प्रभात पटनायक भटक जाते हैं । बड़े उद्योगों पर आधारित आधुनिक औद्योगीकरण की रोजगार के सन्दर्भ में असफलता का सही विश्लेषण करने के बाद वे एक गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं । बड़े-बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण के बारे में कुछ और बातें वे नजरंदाज कर जाते हैं । एक ,इस तरह के औद्योगीकरण के लिए भारी मात्रा में पूंजी चाहिए । पूंजीवादी व्यवस्था हो या सोवियत संघ जैसी साम्यवादी व्यवस्था , कृषि एवं अन्य पारम्परिक ग्रामीण उद्योगों के शोषण एवं विनाश तथा अन्य देशों के शोषण से ही यह विशाल पूंजी जुटेगी । दूसरे शब्दों में , आंतरिक उपनिवेशों तथा बाहरी उपनिवेशों या नव-उपनिवेशों का निर्माण एवं शोषण इस प्रकार के औद्योगीकरण में निहित है । दो , अब यह बात खुलकर सामने आ रही है कि बड़े उद्योगों पर आधारित औद्योगीकरण की प्राकृतिक संसाधनों की भूख भी बहुत जबरदस्त है , जिसके कारण नए-नए संकट पैदा हो रहे हैं । जल-जंगल-जमीन से लोगों की बेदखली , विस्थापन तथा विनाश भी इस में अनिवार्य रूप से निहित है । इसलिए स्थानीय आबादी पर विनाशकारी असर को ज्यादा कम करना संभव नहीं है , चाहे वह पूंजीवादी व्यवस्था हो या साम्यवादी व्यवस्था । इसके लिए तो आधुनिक औद्योगीकरण का ही विकल्प ढूंढना होगा ।

    प्रभात पटनायक ने 'पूंजी के आदिम संचय' की नयी स्थितियों का जिक्र किया है , जिसमें उद्योगपति सरकार से रियायत मांगते हैं , लोगों को विस्थापित करते हैं, जमीन बहुत सस्ती दरों पर हासिल करते हैं और जमीन का सट्टात्मक धंधा करके भी विशाल कमाई करते हैं । मार्क्स ने इस शब्दावली का  इस्तेमाल इंग्लैंड में बड़े उद्योगों के हितों के लिए बड़े पैमाने पर किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने की प्रक्रिया को समझाने के लिए किया था। प्रभात पटनायक इसे 'अतिक्रमण के माध्यम से पूंजी संचय' का नाम देना चाहते हैं।लेकिन प्रभात पटनायक हों या मार्क्स के अन्य अनुयायी , उन्हें एक बात अब तक के अनुभव से समझ लेना चाहिए । वह यह कि सरकार की मदद से प्राकृतिक संसाधनों को 'माटी के मोल' हड़पने और उनसे लोगों को बेदखल करने की यह प्रक्रिया औद्योगिक पूंजीवाद में कहीं न कहीं निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । यह पूंजी का आदिम संचय नहीं, निरंतर चलने वाला बलात संचय है ।पूंजीवाद का विकास इस पर अनिवार्य रूप से टिका है ।

[ जारी ]

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रविवार, दिसंबर 23, 2007

मोदी की जीत गुजरात की शर्मनाक हार है

    मोदी द्वारा गुजरात की जनता का साम्प्रदायिकीकरण फिर सफलतापूर्वक प्रकट हुआ। उसका विकल्प न होना दुर्भाज्ञपूर्ण है । कांग्रेस का भोथरा सेक्यूलरवाद और मोदी की कांग्रेसी आर्थिक नीति गुजरात की जनता के लिए बुरे दूरगामी परिणाम लाएगी । हिटलर ने भी चुनाव जीता था और बहुसंख्यक की फिरकापरस्ती और उन्माद पर सवार हो कर राजीव गाँधी ने भी। एक झूठा दर्प भी हिटलर ने पैदा किया था, मोदी ने भी किया है। गनीमत है कि अभी भी हिटलर जितनी सफलता उसे नहीं मिली है । डॉ. लोहिया की बात याद आ रही है : गद्दार अपने आप में या गद्दारी भी खतरनाक नही होती , जनता का समर्थन न मिलने पर वह बेमानी साबित हो जाती है। गद्दारी खतरनाक तब हो जाती है जब उसको जनता का समर्थन मिल जाता है। राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद का प्रयोग सीमित दायरे में सफल होगा- जिन सूबों में सिर्फ दो दल होंगे , लगभग एक जैसे।

मंगलवार, दिसंबर 11, 2007

भारत का कुलीकरण (अंतिम) :टेक्नो बाबू का उदय : गंगन प्रताप

टेक्नो बाबू का उदय

    भारत जिस किस्म की सूचना टेक्नॉलॉजी (आई.टी.) में लगा है उसे राजेश कोचर ने "सूचना छेड़छाड़" की संज्ञा दी है । " यदि आई.टी. को हम एक नई सायकल डिज़ाइन करने जैसा मानें , तो भारत को जो काम सौंपा गया है वह मात्र पंचर जोड़ने का है ।" कोचर इसे कुलीकरण कहते हैं :

    " ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में जो औपनिवेशिक विज्ञान शुरु किया था और जिसमें देशी लोगों को नियुक्त किया गया था , वह प्रयोगशाला विज्ञान नहीं बल्कि मैदानी विज्ञान ( भूगोल,भूगर्भ विज्ञान,वनस्पति शास्त्र और यहाँ तक कि खगोलशास्त्र) था । आज एक सदी बाद फिर पश्चिमी देश लोगों को नियुक्त कर रहे हैं । यह काम देशांतर पर टिका है- पश्चिमी देशों का दिन अब २४ घण्ते का है - अंतर सिर्फ इतना है कि दफ्तर का काम अब ओवर टाइम देकर नहीं करवाया जाता बल्कि एक-तिहाई वेतन देकर करवाया जाता है । "

    इस तरह हम टेक्नो-बाबुओं के राष्ट्र बनकर रह गए हैं ।

    विचारों के इस पुंज का समापन मैं फ्राइडमैन के एक साक्षात्कार से करना चाहूँगा । यह साक्षात्कार मेरे एक मित्र ने मुझे भेजा था :

" यदि  आपका सामान ब्रिटिश एयर या स्विस एयर में गुम हो जाए तो आप इसकी तलाश के लिए फोन करते हैं । जो व्यक्ति जवाब देता है वह बैंगलोर में है । यदि आपके डेल कम्प्यूटर में कोई दिक्कत है और आप फोन करते हैं तो दूसरे छोर पर बैठा व्यक्ति एक भारतीय होगा जो बैंगलोर में बैठा है । यह शहर हर वर्ष विभिन्न इंजीनियरिंग व कम्प्यूटर विज्ञान संस्थाओं से करीब ४०,००० तकनीकी स्नातक तैयार करता है।ये सब किसी न किसी अमरीकी कम्पनी को बैकरूम क्षमता प्रदान करने में खप जाते हैं ,बैंगलोर में बैठे-बैठे।"

    जी हां , सिर्फ बैकरूम क्षमताएं , जबकि "केन्द्रीय क्षमताएं" यू.एस. में ही बनी रहती हैं । तो,अब आप समझ गए होंगे कि ए.एम. नाइक को गुस्सा क्यों आता है।जो बात फ्राइडमैन नहीं देख पाते उसे नाइक पकड़ते हैं- देश के सब से होनहार युवा धीरे-धीरे शेष विश्व के लिए टेक्नो कुली बनते जा रहे हैं । आपको उत्तरी अमरीका या युरोप के होशियार युवा किसी भारतीय या चीनी कम्पनी के लिए ऐसी कुलीगिरी करते नहीं मिलेंगे । इंफोसिस और विप्रो का चमत्कार यही है कि उन्होंने देश के सबसे होशियार लड़के-लड़कियों को इकट्ठा करके उन्हें उत्तरी अमरीका , युरोप , और जापान का टेक्नो कुली बना दिया है। सच्चाई यह है कि माइक्रोसॉफ़्ट या ओरेकल या सिस्को एम.आई.टी. और कैलटेक के होशियार स्नातकों को टेक्नो कुली बना बना कर दुनिया की सबसे अमीर कम्पनियाँ नहीं बनीं हैं। ये लोग तब भारत और चीन के लिए काम नहीं करते जब हम नींद में होते हैं ।यह एक ऐसा असंतुलन है जिसके परिणाम घातक हो सकते हैं। इसके चलते वैश्वीकरण तो कुलीकरण का पर्याय हो जाएगा।

( स्रोत फीचर्स )

गुरुवार, दिसंबर 06, 2007

भारत का कुलीकरण : लेखक - गंगन प्रताप







देश के सबसे होनहार युवा धीरे - धीरे शेष विश्व के लिए टेक्नो-कुली बनते जा रहे हैं । इंफोसिस और विप्रो का चमत्कार यही है कि उन्होंने देश के सबसे होशियार लड़के-लड़कियों को इकट्ठा करके उन्हें उत्तरी अमरीका , युरोप और जापान का टेक्नो-कुली बना दिया है । यह एक ऐसा असंतुलन है जिसके परिणाम घातक हो सकते हैं। इसके चलते वैश्वीकरण कुलीकरण का पर्याय हो जायेगा।इस महत्वपूर्ण मगर उपेक्षित मुद्दे पर कुछ विचारों व प्रतिध्वनियों की बानगी प्रस्तुत है। स्रोत : स्रोत , दिसम्बर २००५


केरल मॉडल


ई. एम. एस. नम्बुदरीपाद की संकलित रचनाओं के २१वें खण्ड में उन्होंने १९५८ के केरल की बुनियादी समस्या को इन शब्दों में पकड़ा था :



" राज्य की बुनियादी समस्या यह है कि वह अपने विशाल मानव संसाधन का उपयोग नहीं करता । राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की साज संभाल करने की बजाय केरल के लोग देश भर में क्लर्क और कुली बन रहे हैं ।"


भारतीय मॉडल


ई. एम.एस. ने जो बात केरल के बारे में कही थी , वह आज पूरे देश के बारे में कही जा सकती है । हमारे सर्वोत्तम व सबसे प्रतिभावान लोग ( आई.आई.टी. वगैरह ) दुनिया भर में क्लर्क और कुली बनते जा रहे हैं । भारत की बुनियादी समस्या अपने विशाल मानव संसाधन का उपयोग न कर पाने की हो गयी है । देश के प्राकृतिक संसाधनों को न संभालकर , भारतीय लोग पलायन कर रहे हैं । हमारे देश के सबसे प्रतिभावान युवा ( ७०,००० प्रवासी + २,००,००० एल-१ और एच-१ बी व छात्र वीसाधारी ) देश छोड़कर अमरीका चले जाते हैं ।


हमारे यहां इन्सानों की तरक्की पर चंद बिरले व असाधारण क्षमता वाले लोगों का बोलबाला रहता है। प्रतिभा पलायन एक छन्नी है, जिसके ज़रिए देश के सर्वोत्तम प्रशिक्षित व्यक्ति अन्य देशों में ( आजकल अधिकतर यू.एस.ए) चले जाते हैं। इस लिहाज से देखें, तो हमारे जैसे प्रतिभादानी देशों को इससे भारी नुकसान होता है और इस दान के प्राप्तकर्ता देशों को भरपूर लाभ भी होता है । अर्थात प्रतिभा पलायन एक ऐसी विकट समस्या है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।


जूठन की जूठन की जूठन


इन्द्रजीत गुप्त और रामी दत्ता हर्दसमलानी के साथ बातचीत के दौरान एल एण्ड टी के अध्यक्ष ए. एम. नाइक ने सवाल किया था कि "फिर भारत की सड़कें , बंदरगाह और पुल कौन बनायेगा?" एल एण्ड टी में आज ३०,००० कर्मचारी हैं ।निर्माण कार्य में लगी इस कम्पनी में १२,००० इजीनियर्स हैं । इसे हर साल २००० इजीनियर्स की जरूरत होती है ।मगर हर साल २००० इंजीनियर्स कंपनी छोड़कर चले जाते हैं और नए इंजीनियर्स आसानी से नहीं मिलते। कारण यह है कि आज ज्यादातर इंजीनियरिंग स्नातक उत्पादन के क्षेत्र में काम नहीं करना चाहते हैं ।ये सब नई अर्थव्यवस्था की सूचना टेक्नॉलॉजी कम्पनियों में काम करने को उत्सुक हैं ।जब १९६३ में स्वयं नाइक ने स्नातक उपाधि प्राप्त की ह्ती, तब इंजीनियरिंग की तीन पसंदीदा शाखाएं थीं : मेकेनिकल ,इलेक्ट्रिकल और सिविल। आज अधिकांश छात्र कंप्यूटर विज्ञान और इलेक्ट्रॉनिक्स की कतारों में नजर आते हैं। जो मेकेनिकल लेते हैं , वे भी एल एण्ड टी जैसी कम्पनी में २ साल काम करके विशेषज्ञता हासिल करके किसी आई.टी. कम्पनी में जाना चाहते हैं ।


नाइक का मुद्दा सीधा-सा है - देश में किसी को भी प्रतिभा प्लायन की प्रकृति की जानकारी नहीं है । किसी को भी इस बात का अन्दाज़ नहीं है कि विकसित देश भारतीय प्रतिभा भण्डार का कितना लाभ ले रहे हैं । यह सही है कि आज वैश्विक इजीनियरिग कम्पनियाँ शाखाएं भारत में खोल रही हैं मगर वे उत्पादन चीन में करवाती हैं । " यहां हम १७ अरब डॉलर के आउट्सोर्सिंग जॉब्स पर इतरा रहे हैं मगर हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इस कार्य ने अन्य देशों के लिए ३०० अरब डॉलर की जायदाद निर्मित की है ।और देश से बाहर जाने वाली प्रत्येक ३ करोड़ डॉलर की इंजीनियरिंग सेवाओं के कारण देश में १ अरब डॉलर का नुकसान होता है।" यह तर्क नाइक का है। वे आगे कहते हैं - "भारत में प्रतिभा उपलब्ध ही नहीं है। इंजीनियरिंग कॉलेजों से उत्तीर्ण होने वाले करीब ९५ प्रतिशत छात्र यू.एस. और युरोप या दुनिया के अन्य भागों का रुख करते हैं ।हमारे पास तो जूठन की जूठन की जूठन आती है, जो थोड़ा पॉलिश होकर हमें छोड़कर चली जाती है।"


[ जारी ]

शनिवार, दिसंबर 01, 2007

अहमद पटेल के भरोसे नरेन्द्र मोदी

    रेन्द्र मोदी के 'विकास' और मनमोहन सिंह अथवा बुद्धदेव के 'विकास' में फर्क नहीं है। स्वदेशी जागरण मंच अथवा उमा भारती का रिलायन्स फ्रेश के प्रति विरोध क्रमश: राँची और इन्दौर में होता है । अहमदाबाद , वडोदरा और सूरत में यह विकास (रिलायन्स फ्रेश टाइप) फलता - फूलता है । ' विशेष आर्थिक क्षेत्र ' और उनके लिए बनने वाले परमाणु बिजली घर यदि बंगाल के सिंगूर के निकट बनते हैं तो गुजरात के भावनगर के निकट भी बन रहे हैं ।

    सिर्फ़ साम्प्रदायिकता को राजनीति का आधार बनाने की जैसे एक सीमा है वैसे ही साम्प्रदायिकता-विरोध की राजनीति करने वालो की भी एक सीमा होती है यदि वे   आर्थिक नीतियों का विकल्प नहीं दे पाते ।   

     गुजरात से लोकसभा के लिए चुने गए सदस्यों की संख्या में भाजपा और कांग्रेस में उन्नीस - बीस (मुहावरा) का फर्क है । इसके बावजूद मोदी विरोधी सामाजिक तबके ( पटेल ) के भाजपा के विरोध में मुखर न हो पाना मोदी के हक में सब से बड़ी ताकत है । केशूभाई पटेल समर्थक कई विधायक भले ही इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं परन्तु स्वयं केशूभाई और कंशीराम राणा जैसे मोदी विरोधी नेताओं ने भाजपा नहीं छोड़ी है । वे अभी भी ख्वाब देख रहे हैं कि चुनाव के बाद वे ही भाजपा विधायक दल के नेता चुने जाएंगे। इस परिस्थिति का पूरा पूरा लाभ उठाने के लिए नरेन्द्र मोदी एक फिरकावाराना महीन खेल खेल रहे हैं । खुद से विमुख हो रही पटेल बिरादरी से मोदी पूछते हैं , ' क्या आप नरेन्द्र मोदी की जगह अहमद पटेल को मुख्यमन्त्री बनाना चाहते हैं ? '

    नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रूप मे किसी नेता के न प्रस्तुत होने का लाभ भाजपा को मिल रहा है । राज्य में सक्रिय दोनों प्रमुख दलों की समान आर्थिक नीतियों का खामियाजा अन्तत: गुजरात के दलित , आदिवासी , किसान और अकलियतों को भुगतना पड़ सकता है।

शुक्रवार, नवंबर 23, 2007

बम धमाके : सच के अंश वाली अफवाहें

अफवाहों में सच का अंश होता है । कुछ ऐसा तत्व जो अफवाह को विश्वसनीय बना देता है । उत्तर प्रदेश के तीन जिला मुख्यालयों की कचहरियों में एक साथ हुए बम विस्फोटों के बाद हाल ही में हुईं दो घटनाओं से जनता ने इनका सम्बन्ध जोड़ा । आतंकी घटनाओं के पक्ष में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता परन्तु आज हुई अमानुषिक कारगुजारी से जनता ने दो घटनाओं को जोड़ा।
लखनऊ की कचहरी में पेश कुछ आतंकवादियों की वकीलों द्वारा पिटायी पहली घटना है । बनारस में इस ‘कारण’ से ज्यादा महत्व एक अन्य घटना को मिला । आज से तीन दिन पहले बनारस की अदालत में बनारस की अदालत में हत्या के एक मामले में एक विधायक - माफिया-अभियुक्त के खिलाफ़ एक अन्य माफिया-विधायक द्वारा गवाही दिया जाना - दूसरी घटना है। आज के धमाकों के समय गवाही देने वाले विधायक के कचहरी परिसर में मौजूद होने की चर्चा से इस अफवाह को और बल मिला।
जनता यह मानती है कि हत्या अभियुक्त विधायक तीनों शहरों में एक साथ धमाके करवाने की औकात रखता है । हत्या अभियुक्त विधायक है सपा समर्थित विधायक मुख़्तार अन्सारी जिस पर लगे अवधेश राय हत्याकाण्ड में भाजपा विधायक अजय राय ने गवाही दी है । अवधेश अजय के भाई थे ।

रविवार, नवंबर 18, 2007

तेलुगु कहानी (२) : मैं कौन हूँ : पी. सत्यवती :अनुवाद - जे. एल. रेड्डी

    रात को खाना खाते समय उसने पति से पूछा , 'सुनिए , मैं अपना नाम भूल गयी हूँ । आप को तो याद होगा , बताइए न ?'

    पति ने ठहाका मार कर कहा , ' क्या बात हो गई भई ! जो बात कभी नहीं पूछी , वह आज क्यों पूछ रही हो ? जब तुम से शादी की है , तब से तुम को  " ऐ सुनो " कह कर पुकारने की आदत हो गई है । तुम ने कभी नहीं कहा कि ' ऐसे मत पुकारिए , मेरा नाम नहीं है क्या ? ' इसलिए मैं भी भूल गया हूँ । अब क्या हो गया ? सब लोग तुमको मिसेज मूर्ती कहते हैं तो ? '  'मिसेज मूर्ती नहीं , मुझे अपना असली नाम चाहिए । अब क्या करूँ ? ' उस ने परेशान हो कर कहा ।

    ' इस में कौन-सी परेशानी है ? कोई भी नया नाम रख लो बस !' पति ने सलाह दी।

    ' आप भी खूब हैं ।जब आप का नाम सत्यनारायण मूर्ती हो और आप से कोई शिवराव या सुंदरराव नाम रख लेने को कहे तो आप रख लेंगे ? मुझे अपना ही नाम चाहिए ।' गृहणी ने हठ किया ।

    ' तुम तो अजीब हो ! पढ़ी-लिखी हो न ? सर्टिफ़िकेट देख लो । उन पर तो नाम होगा ही। इतना भी कॉमनसेंस न हो तो कैसे चलेगा ? देखो जा कर ।' उन्होंने फिर सलाह दी ।

    गृहिणी सर्टिफ़िकेट ढूँढ़ने में जी-जान से लग गई । अलमारी में रेशमी , शिफॉन, सूती और वाइल की साड़ियाँ , मैचिंग ब्लाउज़ , पेटीकोट , चूड़ियाँ , मनके , पिन , मोती , कुमकुम की डिब्बियाँ , चंदन की कटोरियाँ , चाँदी के थाल , सोने के गहने , सब तो व्यवस्थित ढंग से रखे मिले । लेकिन सर्टिफ़िकेटों का अतापता नहीं था । हाँ , याद आया, शादी के बाद जब मैं यहाँ आई , तब लाई ही नहीं थी । उसने सोचा ।

    ' जी हाँ, मैं उन को यहाँ ले कर नहीं आई थी - अपने गाँव जा कर सर्टिफिकेट ढूँढूँगी और अपने नाम का पता लगा कर दो दिन में लौट आऊँगी । ' उस ने पति से कहा ।

    ' बड़ी अजीब बात है ! नाम के लिए गाँव जाओगी क्या ? तुम गाँव जाओगी तो दो दिन घर की लिपाई-पुताई कौन करेगा ?' पति परमेश्वर ने कहा । हाँ बात सही है - मैं ही सब से अच्छी तरह लीपती - पोतती हूँ न ! इसलिए - इतने दिन यह काम मैं ने यह काम किसी को करने नहीं दिया । हरेक का अपना-अपना काम है तो ! उन को नौकरी - बच्चों की पढ़ाई-बेचारे वे क्यों परेशान हों-यह सोच कर खुद यह काम करती आई हूँ । उन से यह सब होता नहीं है न !

    फिर भी नाम जाने बगैर जिएँ भी तो कैसे ? इतने दिन यह बात याद नहीं आई,इसलिए चल गया । आब याद आने के बाद तकलीफ़ होने लगी है ।

    ' दो दिन किसी तरह परेशानी उठाइए । जा कर अपने नाम का पता कर के लौट बग़ैर ज़िन्दा रहना मुश्किल हो रहा है । ' मिन्नत कर के गृहिणी बाहर निकल पड़ी ।

    'क्यों बेटी , ऐसे एकाएक कैसे चली आई? ' कह कर माँ और बापू ने स्नेहपूर्वक हालचाल पूछा ।फिर भी वे कुछ सशंक से लगे ।असली काम याद आया तो वह बोली :

    ' माँ , मेरा नाम क्या है , बताओ तो ? गृहिणी ने चिन्ता से पूछा ।

    ' यह क्या पूछ रही हो ? तुम हमारी बड़ी बेटी हो । तुम को बी.ए. तक पढ़ाया और पचास हजार दहेज दे कर शादी कर दी - दो प्रसव कराए- हर बार अस्पताल के खर्चे हम ने ही उठाए- तुम्हारे दो बच्चे हैं ।तुम्हारे पति की अच्छी नौकरी है-वे बहुत अच्छे हैं-तुम्हारे बच्चे होनहार हैं ।'

    मुझे अपना इतिहास नहीं , अपना नाम चाहिए माँ - कम से कम यह तो बताओ कि मेरे सर्टिफ़िकेट कहाँ रखे हैं । '

    ' पता नहीं बेटी ! कुछ दिन पहले अलमारी में से पुराने काग़ज़ , फ़ाइलें वग़ैरह निकाल कर उसमें शीशे का सामान रखवाया है ।थोड़ी-सी जरूरी फ़ाइलों को अटारी पर डाल दिया है। कल ढुँढवा देंगे । अभी कौन-सी जल्दी है? आराम से नहा कर खाना खा लो बेटी ! ' माँ ने कहा। गृहिणी ने आराम से नहा कर भोजन तो किया लेकिन उसको नींद नहीं आई । उस ने कभी नहीं सोचा था कि हँसते-गाते , घर को लीपते और रंगोली बनाते-बनाते नाम भूल जाने से इतनी सारी मुसीबते खड़ी होंगी ।

    सवेरा हुआ । लेकिन अटारी में सर्टिफिकेट ढूँढने का काम पूरा नहीं हुआ । इस बीच जो भी सामने पड़ा, उस से गृहिणी ने पूछा- पेड़-पत्तों से, बॉबी से,तालाब से,अपने स्कूल और कॉलेज से,    सब से पूछ कर,चीख़ कर चिल्ला कर अंत में एक सहेली से मिलकर उस ने अपना नाम पा ही लिया । उस सहेली ने उसी की तरह , उसी के साथ पढ़-लिख कर उसी की तरह शादी की थी ।लेकिन वह हमारी गृहिणी की तरह घर को लीपने-पोतने को ही जीवन न मान कर उसे जीवन का एक हिस्सा भर मानती थी और अपना नाम और अपनी सहेलियों के नाम याद रखती थी । वह सहेली इसको देखते ही चिल्ला उठी, ' ऐ शारदा ! मेरी प्यारी शारदा!'और गले से लग गई ।जैसे लू से झलसे , प्यास से सूखे और मरणासन्न व्यक्ति को कोई नई सुराही का पानी चम्मच से मुँह में डाल कर जीवनदान दे, वैसे ही उस सहेली ने इसे जीवनदान दिया । '

    ' तुम शारदा हो । तुम अपने स्कूल में दसवीं कक्षा में प्रथम आई थीं । कॉलेज की संगीत प्रतियोगिता में भी प्रथम थीं । बीच-बीच में अच्छी तसवीरें भी बनाती रहती थीं । हम सब दस थीं । उन सब से मिलती ही रहती हूँ । हम एक दूसरे को चिट्ठी भी लिखती रहती हैं । बस, तुम्ही से नाता टूट गया है। बताओ ऐसा अज्ञातवास क्यों कर रही हो ? ' सहेली ने जवाब तलब किया ।

    ' हाँ, प्रमिला ! तुम्हारी बात सही है। मैं शारदा हूँ।तुम्हारे बताने तक मुझे याद ही नहीं आया। मेरे दिमाग के सारे खाने तो लीपने -पोतने से ही भरे हुए हैं और किसी बात की वहाँ गुंजाइश ही नहीं रही । तुम नहीं मिलती तो मैं पगला जाती ।' शारदा नामधारी उस गृहिणी ने कहा । शारदा सीधी घर गई, अटारी पर चढ़ी और पुरानी फ़ाइलों की छानबीन करके अपने सर्टिफिकेट ,अपनी बनाई हुई तसवीरें ,पुराना अलबम ,सब कुछ ढूँढ़ लाई ।स्कूल और कॉलेज में जीते पुरस्कार भी उस ने ढूँढ लिए ।

    अपने घर बाग़-बाग़ लौट आई ।'तुम नहीं थीं-घर को देखो कैसा हो गया है-सराय लगने लगा है । जय भगवान तुम आ गईं । हमारे लिए तो अब त्योहार ही समझो भई !' पति ने कहा ।'घर को लीपने-पतने से ही त्योहार हो जाता । हाँ,एक बात और।आज से आप मुझे "ऐ,ओय" कह कर मत बुलाइए । मेरा नाम शारदा है ।"शारदा" कह कर बुलाइए।ठीक है न ?' कह कर वह गुनगुनाती हुई अंदर चली गई।किस कोने में धूल है,कहाँ सामान बेक़रीने से रखा है, यह जानने के लिए घर भर सूँघती फिरती शारदा दो दिन की गर्द समेटे सोफ़े पर फैल कर बैठी , बच्चों को अपने लाए खिलौने दिखा रही थी।

                                      **************

पी. सत्यवती : जन्म १९४०। जानी मानी कहानीकार और उपन्यासकार ।लगभग एक सौ कहानियाँ प्रकाशित। सत्यवति कथलु नाम से दो कहानी-संकलनों के अतिरिक्त पाँच उपन्यास भी प्रकाशित।स्त्री का जीवन और उसकी समस्याएँ इन के साहित्य के मुख्य विषय हैं। संपर्क: ए१,जुही अपार्टमेंट्स,एफ़.सी.आई. के पीछे,मुग़ल राजपुरम रोड,विजयवाड़ा ५२००१० (आंध्र प्रदेश

 

जे. एल रेड्डी : जन्म १९४० । अनुवादक।ऋषिकेश का पत्थर नामक अनुदित तुलुगु कहानियों के संकलन के अतिरिक्त दो उपन्यासों के अनुवाद प्रकाशित।संपर्क : बी-१/९३.जनकपुरी,नई दिली ११००५८

तेलुगु कहानी : मैं कौन हूँ : पी. सत्यवती :अनुवाद- जे.एल.रेड्डी

[ समकालीन भारतीय साहित्य के जुलाई - सितंबर १९९५ अंक में यह कहानी प्रकाशित हुई थी । आभार सहित यहाँ प्रस्तुत है । ]

    गृहणी बनने से पहले वह एक लड़की थी । सुशिक्षित , चतुर , व्युत्त्पन्नमति । साथ ही चपल और लावण्यमयी भी ।

    उस लड़की का सौन्दर्य और बुद्धिकुशलता और उस के पिता द्वारा दिया गया दहेज खूब पसंद आए तो एक नवयुवक ने उस लड़की के गले में मंगलसूत्र धारण करा कर उसे एक घर की गृहणी बनाया और बोला , ' देखो मेरी प्यारी ! यह तुम्हारा घर है । ' उस गृहणी ने झट से पल्लू कमर में कस लिया , सारे घर को खूबसूरती से लीपा - पोता और रंगोली बनाई । नवयुवक ने फ़ौरन गृहणी के सराहना करते हुए कहा , ' घर को लीपने - पोतने में तुम बड़ी कुशल हो । रंगोली बनाने में तो और भी ज्यादा । शाबाश ! कीप इट अप । 'और अंग्रेजी में भी एक बार और प्रशंसा कर के उसका कंधा थपथपाया ।

    गृहणी फूली नहीं समाई और घर को लीपने-पोतने को ही अपना लक्ष्य बना कर जीवन बिताने लगी । वह हमेशा घर को एकदम सफाई से लीपती-पोतती और रंगोली के रंग-बिरंगे डिजाइनों से सजाती ।इस तरह उस का जीवन पोंछनों और रंगोली की पिटारियों से भरा-पूरा रहा । लेकिन एक दिन घर लीपते - पोतते हुए , उस ने अचानक सोचा , ' मेरा नाम क्या है ? 'और एकदम चौंक पड़ी । हाथ का पोंछना और रंगोली की पिटारी फेंक कर वह खिड़की के पास खड़ी हो गई और सिर खुजाती हुई लगातार सोचती रही । ' मेरा नाम क्या है ?  मेरा नाम क्या है?' सामने के मकान पर टँगे नामपट्ट पर लिखा था - श्रीमती एम. सुहासिनी , एम.ए.,पी-एच.डी. , प्रिंसिपल 'एक्स' कॉलेज । हाँ , इसी तरह मेरा भी कोई नाम होना चाहिए न ?सोच कर वह परेशान हुई । मन में बेचैनी भर गई ।उस ने किसी तरह उस दिन का लीपना-पोतना ख़त्म किया । इतने में कामवाली औरत आ गयी । शायद इस को याद हो , यह सोच कर उसने पूछा, ' क्यों री लड़की! मेरा नाम जानती है ? '

    ' आप यह क्या पूछ रही हैं अम्मा ! मालकिनों के नाम से हमें क्या मतलब ? आप हमारे लिए मालकिन हैं - फलाने सफ़ेद मकान के निचले हिस्से में रहने वाली मालकिन का मतलब - आप ।' उस लड़की ने जवाब दिया ।

    ' ठीक है , तुझ बेचारी को कहाँ से पता होगा ? ' गृहणी ने सोचा ।

    दुपहर को बच्चे खाना खाने स्कूल से आए - गृहणी ने सोचा - बच्चों को शायद याद हो । उस ने पूछा, 'बच्चो ! मेरा नाम क्या है, जानते हो ? ' बच्चे चकित हो कर बोले , ' तुम माँ हो - तुम्हारा नाम माँ ही है । जब से हम पैदा हुए हैं , तब से हम यही जानते हैं । पिताजी के नाम से चिट्ठियाँ आती हैं । उन को सब लोग नाम से बुलाते हैं , इसलिए हम उन का नाम जानते हैं । तुम ने अपना नाम हमें बताया ही कब है ? तुम्हारे नाम चिट्ठियाँ भी तो नहीं आतीं ! ' वह फिर सोच में पड़ गयी - हाँ , ठीक ही तो है , मुझे छिट्ठी लिखता ही कौन है ? माँ और बाबूजी हैं तो , लेकिन वे एक या दो महीने में फ़ोन करते हैं । छोटी और बड़ी बहनें भी हैं तो , लेकिन वे भी अपने अपने घर को लीपने-पोतने में लगी रहती हैं । कभी शादी या महिला-कार्यक्रमों में मिलती हैं , तो रंगोली के नये डिजाइनों या फिर नए पक़वानों के बारे में ही बात करती हैं । चिट्ठी-पत्री कुछ नहीं ।गृहणी निराश हो गयी ।मन में व्याकुलता और बढ़ी । इतने में पड़ोसिन , महिलाओं के किसी कार्यक्रम के लिए न्योता देने आई । कम से कम इसको तो याद होगा , यह सोच कर उस से पूछ तो वह खी-खी करती बोली :

    ' बात यह है कि न मैं ने कभी आप का नाम पूछा न आप ने बताया । दाईं ओर के सफ़ेद मकान वाली या दवाइयों की कंपनी के मैनेजर की बीवी या फिर गोरी और लंबी वाली औरत - इस तरह आपस में हम आपके बारे में बात करते हैं । बस । '

    अब कोई फायदा नहीं । बच्चों के दोस्त भी क्या बतायेंगे ? वे यही जानते हैं कि मैं मैं कमला की माँ हूँ या आंटी हूँ ।  अब एक पतिकी शरण में जाना पड़ेगा -  उन को याद होना चाहिए.......

[ शेष भाग , अगली बार ]

मंगलवार, नवंबर 06, 2007

नई राजनीति के नेता : जुगलकिशोर रायबीर

  

 

    उत्तर भारत की राजनीति पर नज़र रखने वाले बसपा के गाँधी-विरोधी तेवर से परिचित होंगे। राजनीति की इतनी खबर रखने वाले यह भी जानते होंगे कि नक्सलबाड़ी उत्तर बंगाल का वह गाँव है जहाँ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हो कर भा.क.पा. ( मा-ले ) की स्थापना हुई और इस नई जमात द्वारा " बुर्जुआ लोकतंत्र को नकारने तथा वर्गशत्रु के खात्मे" के सिद्धान्तों की घोषणा हुई ।

    उत्तर बंगाल के इन्हीं चार जिलों ( कूच बिहार , उत्तर दिनाजपुर , जलपाईगुड़ी , दार्जीलिंग ) से एक अन्य जनान्दोलन भी गत तीन दशकों में उभरा जिसने उत्तर बंग को एक आन्तरिक उपनिवेश के रूप में चिह्नित किया और बुलन्दी से इस बात को कहा कि आजादी के बाद विकास की जो दिशा तय की गई उसमें यह अन्तर्निहित है कि बड़े शहरों की अय्याशी उत्तर बंगाल , झारखण्ड , पूर्वी उत्तर प्रदेश , उत्तराखन्ड , छत्तीसगढ़ जैसे देश के भीतर के इन इलाकों को 'आन्तरिक उपनिवेश' बना कर,  लूट के बल पर ही मुमकिन है । नक्सलबाड़ी में वर्ग शत्रु की शिनाख्त सरल थी । खेती की लूट का शिकार छोटा किसान भी है और उसे खेत मजदूर के साथ मिल कर इस व्यवस्था के खिलाफ़ लड़ना होगा इस समझदारीके साथ उत्तर बंग में जो किसान आन्दोलन उभरा उसके प्रमुख नेता थे साथी जुगलकिशोर रायबीर जुगलदा की अगुवाई में उत्तर बंगाल के किसान आन्दोलन के दूसरी प्रमुख अनूठी बात थी कि इस जमात में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग जुटे जो अम्बेडकर की सामाजिक नीति के साथ गाँधी की अर्थनीति को लागू करने में यकीन रखते हैं। बंगाल के अलावा कर्नाटक का 'दलित संघर्ष समिति' ऐसी जमात है जिसके एक धड़े ने बहुजन समाज पार्टी में विलय से पहले  कांशीरामजी के समक्ष शर्त रखी थी कि आप गांधी की  आलोचना नहीं करेंगे। 

    नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के मकसद से १९९२ में जब समाजवादी जनपरिषद की स्थापना हुई तब लाजमी तौर पर इसके पहले अध्यक्ष साथी जुगलकिशोर रायबीर चुने गए और इस बार ( सातवें सम्मेलन में ) पुन: राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। आज सुबह साढ़े चार बजे उनकी मृत्यु हुई । वे रक्त कैन्सर से जूझ रहे थे । अपने क्रान्तिकारी साथी की मौत पर हम संकल्प लेते हैं कि उनके सपनों को मंजिल तक पहुँचाने की हम कोशिश करेंगे।

 

शनिवार, अक्टूबर 06, 2007

मायावती और चरखा

    २ अक्टूबर २००७ को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने अम्बर चरखा चलाते हुए फोटो खिंचवायी , खादी पर राज्य सरकार की तरफ़ से १० फीसदी छूट का ऐलान किया और 'गांधी के सपनों के भारत' की भी चर्चा की। कुछ वर्ष पहले 'हरिजन' शब्द पर रोक लगाने की मांग  के साथ मायावती ने सवाल उठाया था कि,'क्या गांधी शैतान की औलाद है ?' 

मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ ली जाँए,

  'उस   समय से , इस समय की, कुछ दशा ही और है। पलटता रहता समय , संसार में सब ठौर है ।'

 इस सन्दर्भ में क्या ठौर है ? और क्या पलट गया ?

    पूना करार के तहत पृथक निर्वाचन क्षेत्र नहीं माना गया था। बाबासाहब अनुसूचित जाति के लिए जितनी सीटें चाहते थे उससे ज्यादा सीटें निर्धारित हुई लेकिन सिर्फ़ अनुसूचित जाति के मतदाताओं के  वोट से प्रतिनिधी चुने जाने की प्रस्तावित व्यवस्था नहीं मानी गयी। इस व्यवस्था के तहत हुए चुनावों में कांग्रेस को ही ज्यादा सफलता मिली।बाबासाहब ने अनुसूचित जाति तथा अंग्रेज पाठकों को ध्यान में रख कर किताब लिखी ,'कांग्रेस और मि. गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?'

  पुणे वार्ताओं के फलस्वरूप बाबासाहब और गांधीजी एक दूसरे से काफ़ी हद तक प्रभावित हुए थे ।यरवड़ा जेल में हुई वार्ता से पहले गांधी अस्पृश्यता की जड़ धर्म में मानते थे जबकि बाबासाहब चाहते थे कि सामाजिक-आर्थिक सहूलियतें बढ़ने से ये दिक्कत दूर हो जाएगी। समझौते के बाद गांधी ने सामाजिक - आर्थिक सहूलियतों के लिए 'हरिजन सेवक संघ' बनाया और बाबासाहब धर्म - चिकित्सा  और धर्मान्तरण तक गए ।

    गांधी और जयप्रकाश के जीवन और विचार यात्राओं के क्रम को नजरअन्दाज करके ऐसे उद्धरन प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनके सहारे जेपी को मार्क्सवादी तथा गांधीजी को जाति प्रथा का पक्षधर बताया जा सकता है । गांधी को ऐसी सम्भावित विसंगतियों की परवाह नहीं थी।इसके लिए उन्होंने उपाय कर लिया था- हर मौलिक पुस्तक में 'पाठकों से' यह स्पष्ट कहा जाता है कि 'सत्य की खोज' में मैंने कई विचारों का त्याग किया है और नयी चीजें सीखीं हैं।सुधी पाठक , यदि उन्हें मेरी दिमागी दुरुस्ती पर भरोसा हो तो एक ही विषय पर बाद में कही गयी बात को ग्रहण करेंगे 'मेरी विचार यात्रा में' जेपी इस प्रकार की सावधानी बरतने का पाठकों से आग्रह करते हैं ।

    वर्तमान समय में बुद्धिवादियों का एक समूह सती-प्रथा और वर्ण व्यवस्था का पक्षधर है । कुछ राजनैतिक हलकों में इस समूह को हिन्दू नक्सलाइट नाम दिया गया है। इन हिन्दू नक्सलाइटों द्वारा वर्ण व्यवस्था के पक्ष में गांधी के उद्धरणों का बौद्धिक बेइमानी के तहत इस्तेमाल किया गया।

   जाति प्रथा के सन्दर्भ में १९४६ के आस-पास गांधी ने नियम बना लिया था कि वे अन्तर्जातीय विवाह में ही भाग लेंगे।अन्तर्जातीय में एक पक्ष दलित हो,यह भी शर्त थी।

  संविधान बनाते वक्त विशेशज्ञों के बारे में विचार विमर्श हो रहा था।जवाहरलाल ने अपनी प्रकृति के अनुसार कहा था कि पश्चिम से किसी विशेषज्ञ को बुलाना चाहिए।गांधीजी ने पूछा ,'विदेश से क्यों? देश में क्या ऐसे विशेषज्ञ नहीं हैं?' जवाहरलाल ने कहा ,'मुझे तो कोई नहीं दीखता।'तब गांधीजी ने कहा' अम्बेदकर हैं  ! उन्हें बुलाओ।' नेहरू ने कहा,'बापू! वे तो कांग्रेस के विरोधी हैं।' तब गांधीजी ने जो प्रश्न किया वह कभी भुलाया नहीं जा सकता है।उन्होंने नेहरू से पूछा , ' तुम संविधान कांग्रेस का बनाना चाहते हो या देश का ?' संविधान प्रारूपण समिति की अध्यक्षता के लिए जब अम्बेडकर के पास निमन्त्रण पहुँचा तब उन्होंने कहा ,'मैंने इतनी ज्यादा अपेक्षा नहीं रखी थी।'

गुरुवार, अक्टूबर 04, 2007

अमृत घूंट (४) : ले. नारायण देसाई ( प्रश्नोत्तरी )

एक सभा में प्रश्नोत्तरी

    प्रश्न : स्वराज के मार्ग में मुख्य विघ्न क्या है ?

    उत्तर : अंग्रेज सत्ताधारी सत्ता छोड़ना  चाहते नहीं अथवा हम उनके हाथसे  बलपूर्वक सत्ता छीन नहीं सकते ।

    प्रश्न : आप हिंदुस्तान को साम्राज्य से किस हद तक अलग करेंगे ?

    उत्तर : साम्राज्य से पूर्णत: , ब्रिटिश प्रजा से तनिक भी नहीं ।

    प्रश्न : क्या आप यह मानते हैं कि हिन्दुस्तान अपना भावि इंग्लैण्ड के साथ अभेद्यरूप से जोड़ेगा ?

    उत्तर : हाँ , जब तक वह भागीदार रहेगा तब तक । लेकिन जब वह यह देखेगा कि यह भागीदारी राक्षस और बौने के बीच की है , या उस भागीदारी का उपयोग दूसरी प्रजाओं को लूटने के लिए हो रहा है , तो वह भागीदारी तोड़ देगा ।

    प्रश्न : आपको स्वराज देने में हमारी भूल नहीं होगी ?

    उत्तर : मेरे खयाल से आप अगर किसी को स्वराज दें तो वह भूल हो सकती है , सही ।

    प्रश्न : (इंग्लैण्ड निवासी भारतीयों को ): हिन्दुस्तान की उत्तम सेवा किस प्रकार हो सकती है ?

    उत्तर :आपकी बुद्धि को पैसों में भुनाने के बदले उसे देश सेवामें इस्तेमाल करने से ।

( मारूं जीवन ए ज मारी वाणी खण्ड ३ से उद्धृत )

 

मंगलवार, अक्टूबर 02, 2007

अमृत घूंट (३)[चार्ली चैप्लिन और बर्नॉर्ड शॉ से भेंट] : ले. नारायण देसाई

     [ पहला तथा दूसरा भाग ] यॉर्कशायर के मिल मालिकों के एक विश्रांति गृह में बेरोजगार लोगों के संगठन ने खास उपासना का आयोजन कर प्रार्थना की कि 'प्रभो , तुम्हारी इच्छा पूरी हो ।'

    गांधीजी करुणा-सभर लेकिन दृढ़ थे । ' मैं आपके साथ ईमानदार न बनूँ तो मैं बेवफ़ा बनूँगा , झूठा मित्र माना जाऊँगा । आपके यहाँ तीस लाख बेकार हैं । लेकिन हमारे यहाँ तो लगभग तीस करोड़ लोग छ: महीने बेकार रहते हैं । आपको बेरोजगारी की राहत में ७० शीलिंग मिलते हैं । हमारी औसत आय हर माह साढ़े सात शीलिंग ही है । उस कारीगर ने जो कहा वह ठीक ही कहा कि उसकी अपनी नज़र में उसकी कीमत घटती जाती है । बेकार रहना और दया-दान पर जीना : मनुष्य के लिए लगभग अध:पात करने वाला है- यह मैं अवश्य मानता हूँ । अत: आप कल्पना कीजिए कि तीस करोड़ लोगों को काम न मिलता हो और करोड़ों लोग हर रोज काम के अभाव में स्वमानशून्य , ईश्वरनिष्ठाशून्य हो जाते हों ; यह कितनी बड़ी आपत्ति होनी चाहिए ।...उन भूखे करोड़ों लोगों के समक्ष ईश्वर का नाम लेना हो तो उस कुत्ते के समक्ष लेने के बराबर है । उनके पास ईश्वर का सन्देश ले जाना हो तो मुझे पवित्र परिश्रम का संदेश ही ले जाना चाहिए ।...आपकी विपत्ति में भी आप अपेक्षाकृत सुखी हैं । उस सुख की मैं ईर्ष्या नहीं करता ।मैं आपका भला चाहता हूँ ।लेकिन हिन्दुस्तान के करोड़ों कंगालों की कबर पर आबाद रहने का आप विचार मत करना । हिन्दुस्तान के लिए नितान्त एकाकी जीवन मैं नहीं चाहता । लेकिन मेरे देश को अन्नवस्त्र के लिए मैं किसी दूसरे देश पर अवलंबित रखना नहीं चाहता । आज के संकट को पार कर जाने के उपाय तो हम जरूर सोचें , लेकिन मुझे आपसे यह कहना होगा कि लंकाशायर का पुराना व्यापार पुन: जीवित करने की आशा तो नहीं रखनी चाहिए । वह असंभवित बात है । उस क्रिया में मैं धर्म-बुद्धि से मदद नहीं कर सकता ।.."

    महादेव भाई अपनी डायरी में लिखते हैं कि जो बेकार मजदूर गांधीजी से मिले उनके मनमें कोई कडुवाहट नहीं थी ।... उनमें से एक ने कहा, " इसमें से कुछ अच्छा फल निकले बिना नहीं रहेगा ।और शुभेच्छा तो तात्कालिक फल है ही । "

    लेखक को इस अवसर का एक प्रसंग प्यारेलाल ने बताया था । एक श्रमिक ने गांधीजी को अपना पेट दिखा कर उनसे कहा, " देखिये आपके बहिष्कार से हमारे पेटमें एक एक इंच जितने गड्ढे पड़ गये हैं । " बापूने करुणा भरी आवाजमें कहा , " यह सच है भाई, पर हमारे करोडों के पेटमें बित्ते - बित्ते गहरे गड्ढे पड़ गये हैं सो मत भूलना । "

    महादेवभाई ने एक बेरोजगार मजदूर को अपने किसी साथी से यह कहते सुना था : "मैं बेकार हूँ । लेकिन अगर हिन्दुस्तानमें होता तो वही बात कहता जो गांधी कह रहे हैं । "

    ज्यॉर्ज बर्नार्ड शॉ की लम्बे अर्से से गांधीसे मिलने इच्छा थी । वैसे वे खुद संकोचशील व्यक्ति के नाते मशहूर नहीं थे , लेकिन गांधीजी से मिलने में काफी संकोच अनुभव कर रहे थे। गांधीजी के साथ प्राय: घण्टे भर बैठे होंगे । उन्होंने दुनिया भर की बातें- नृतत्वशास्त्र , धर्म , राजनीति , अर्थनीति के विषय छिड़े । उनकी बातों में विनोद और कटाक्ष का होना अवश्यंभावि था । उन्होंने कहा , ' आपके बारेमें मैं कुछ जानता था ।मैंने यह महसूस किया कि आप भी हमारे समानधर्मी हैं । हमारा वर्ग दुनिया में बहुत छोटा है । ' गोलमेज परिषद के बारेमें एक प्रश्न पूछे बिना वे नहीं रह पाये : ' यह परिषद आपके धीरज की कसौटी नहीं करती ?'  गांधीजी   दु:ख के साथ कबूल करना पड़ा , ' उसमें पारावार धैर्य की जरूरत पड़ती है । सारी चीज  एक बहुत बड़ा इन्द्रजाल है । जो लच्छेदार भाषण हमें सुनाये जाते हैं,वे तो केवल समय बिताने के लिए होते हैं । मैं उनसे पूछता हूँ कि अपने मन की बात साफ़ बोल डाल कर अपनी नीति क्यों घोषित नहीं करते हो ? और हमें पसंदगी क्यों नहीं करने देते ? लेकिन जान पड़ता है कि ऐसा करना अंग्रेजों के राजनैतिक स्वभाव में नहीं है । उनको तो लम्बी और टेढ़ी - मेड़ी राह पर चलना पड़ता है ।'

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    विख्यात साहित्यिक एडवर्ड तॉमसन ने एक बैठक का वर्णन यों किया है :

मैंने एक बार एक ऐसी मंडली में , जिसमें बालियॉल कॉलेज के अध्यक्ष गिल्बर्ट मरे , सर माइकल सेडलर और पी.सी. ल्योन जैसे धुरंधर थे , तीन तीन घण्टे तक गांधी को मोरचा सम्हालते देखा है । उनसे प्रश्न किए गए और परिप्रश्न किए गए । वह काफ़ी कठिन कसौटी थी । लेकिन उन्होंने क्षण भर भी आगा पीछा नहीं किया था।यह सोचते बैठे नहीं रहे कि क्या जवाब दें । उनका खुद पर संपूर्ण अंकुश था और उनकी सेहत देख मुझे इस बात का पूरा विश्वास हुआ कि इस मामलेमें सॉक्रेटीस के बाद और कोई पैदा नहीं हुआ जो इनकी बराबरी कर सके । घड़ीभर मैंने अपने आपको उनकी जगह रखा जिन्हें एक जमाने में इस अभेद्य शांति और स्थिर मतिका मुकाबला करना पड़ा होगा , तब मैं यह समझ पाया कि एथेन्स के लोगोंने शहादत का वरण किए हुए इस दलीलबाज को ज़हर क्यों पिलाया होगा । ।"

    गांधीजीने ऑक्स्फॉर्डमें वहाँ के बौद्धिकों से कहा , ' अच्छा, तो आप हम पर विश्वास नहीं रखेंगे ? तब हमें भूल करने की स्वतंत्रता दीजिये । यह कौन कह सकेगा कि अगर हम अपने प्रश्न आज नहीं सम्हाल सकेंगे तो फिर कब सम्हालेंगे? बल्कि इससे विपरीत मेरा तो यह कहना है कि हमारी अव्यवस्था का कारण तो ब्रिटिश राज है , क्योंकि आप ही ने 'बांटो और राज करो' के सिद्धान्त के अनुसार हम पर राज किया है ।

    जब गांधीजी ने यह सुना कि विख्यात हास्य-नट चार्ली चैप्लिन उनसे मिलना चाहते हैं तो पहला प्रश्न किया कि ये सज्जन कौन हैं ? इस विषय में महादेवभाई ने यह स्पष्ट किया है कि ' शायद ही यह बात कोई सच माने। अनेक वर्षों से गांधीजी का जीवन ऐसा हो गया है कि खुदके लिए जो कुछ तय कर रखा है वह करते करते जो चीजें सामने आये , उनको छोड़ कर और कुछ भी देखने या सुनने का उनके पास वक़्त नहीं बच पाता ।' मि. चैप्लिन ईस्ट एन्ड में ही रहते थे । वे आम लोगों में एक बन कर रहे हैं । उनके विषय में एच. जी. वेल्स ने यह कहा है कि उन्होंने इन लोगों को बोलना सिखाया । यह सुनकर गांधीजी तुरंत उनसे मिलने को राजी हो गये । मि. चैप्लिन ने पहला प्रश्न यह किया कि गांधीजी यंत्र का विरोध क्यों करते हैं । गांधीजी को रामनाम बोलने में थकान भले लगे चर्खे के बारे में  बोलने में नहीं  लगती थी। गांधीजी ने हिन्द के किसानों की अर्ध-बेकारी की बात बता कर कहा कि उन के लिए कोई पूरक उद्योग दिए बिना कोई चारा नहीं है । चैप्लिन ने कहा कि मतलब सिर्फ कपड़ों के बारेमें यह विचार है । गांधीजी ने 'हाँ' कह कर यह विचार समझाया कि हर प्रजा को अपने अन्नवस्त्र स्वयं पैदा करने चाहिए ।

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  ईटन के विद्यालय में गांधी जी ने कहा आपमें से कई भविष्य में प्रधान मंत्री और सेनापति बनेंगे । इसलिए अभी, जिस समय आपका चरित्र गठित ही हो रहा है तब आपके हृदय में प्रवेश करना आसान मानता हूँ । मैं उसके लिए इन्तेज़ार हूँ । आपको जो गलत इतिहास परंपरा से सिखाया जाता है उसके खिलाफ़ मैं आपके सामने कुछ हकीकतें रखना चाहता हूँ । मैं आपको साम्राज्य-शासक नहीं मानता वरन जिस राष्ट्र ने दूसरे राष्ट्र को लूटना बंद किया होगा और अपने शस्त्रबल से नहीं , बल्कि नीतिबल से जगत की शांति का रक्षक बना होगा उस राष्ट्र के प्रजाजन मानता हूं ।

    सम्प्रदायवाद का भूत अधिकतर तो शहरों में ही है । अंग्रेज मंत्रीमंडल स्वतंत्रता के जिस सवाल को जानबूझकर दूर रखना चाहता है उसके आगे यह साम्प्रदायिक प्रश्न किसी बिसातमें नहीं है । वे भूल जाते हैं कि असंतोषी बगावत करने वाले हिंद को वे लम्बे अर्से तक अपने कब्जेमें नहीं रख सकेंगे । यह साफ़ है कि हमारी बग़ावत अहिंसक है, लेकिन वह बगावत तो है ही ।

    आप इस सवाल का साम्प्रदायिक दृष्टि से अध्ययन करेंगे तो उससे आपको कोई लाभ नहीं होगा । और जब आप दिल दहला देने वाली तफ़सीलोंमें जायेंगे तब आप यह सोचेंगे कि तेम्स नदी में डूब मरें तो अच्छा ।

    आप इतिहास का अध्ययन कीजिए। करोड़ों लोगोंने अहिंसा स्वीकारने का निश्चय किस प्रकार किया और उस निर्णय पर किस प्रकार डटे रहे उस बड़े सवाल का अध्ययन कीजिए । मनुष्यके पशुस्वभाव का अध्ययन मत कीजिए, मगर मनुष्यकी आत्मा के वैभव का अध्ययन की जिए। साम्प्रदायिक झगड़े में पड़े लोग पागलखाने के बाशिंदों जैसे हैं ।लेकिन जो लोग स्वदेश की मुक्ति की वास्ते किसी को हानि पहुँचाये बिना अपने प्राण की आहुति देते हैं उनका निरीक्षण कीजिए । आत्मा की आवाज का, प्रेमधर्म का अनुसरण करनेवाले मनुष्यों का अध्ययन कीजिए, ताकि बड़े होने पर आप अपनी विरासत को सुधार सकें ।

    आपका राष्ट्र हम पर अधिकार चला रहा है , उसमें आपके लिए कोई गर्व करने लायक बात हो नहीं सकती । गुलाम को बांधनेवाला खुद न बँधा हो , ऐसा कभी हुआ नहीं ।  ..इंग्लैण्ड और हिंद के बीच आज जो संबंध है वह अतीव पापी संबंध है, अतिशय अस्वाभाविक संबंध है । स्वतंत्रता प्राप्त करने का हमारा स्वाभाविक अधिकार है और हमने जो तपस्या की है , जो कष्ट सहे हैं उससे हमारा वह हक दुगुना हुआ है । मैं चाहूंगा कि आप जब बड़े हों तब अपने राष्ट्र्को लुटेरेपन के पापमें से मुक्त कर उसकी कीर्तिमें अद्वितीय योगदान दें । "

[ जारी ]  

 

बुधवार, सितंबर 05, 2007

खेती की अहमियत और विकल्प की दिशा:ले. सुनील(६)

    मानव समाज में खेती का स्थान तीन कारणों से महत्वपूर्ण रहा है और रहेगा ।

    एक , अमरीका-यूरोप में खेती का स्थान गौण हो सकता है , लेकिन तमाम औद्योगीकरण और विकास के बावजूद आज भी मानव जाति का बड़ा हिस्सा गांवों में रहता है और अपनी जीविका के लिए खेती , पशु - पालन , मत्स्याखेट , आदि पर आश्रित है । भारत जैसे देशों में आज भी ७० प्रतिशत से ज्यादा लोग गांवों में निवास करते हैं । भले ही भारत की राष्ट्रीय आय में खेती का हिस्सा २५ प्रतिशत से नीचे जा रहा है , आज भी देश की ६५ प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है । ( यह भी खेती के शोषण का एक सूचक है । ) इसलिए यदि विकास की कोई भी योजना समावेशी होना चाहती है और एकांगी व असंतुलित नहीं है , तो उसे गाँव और खेती को अपने केन्द्र में रखना पड़ेगा । खेती की उपेक्षा करके इस विशाल आबादी को उद्योगों या महानगरों में बेहतरी के सपने दिखाना एक तुगलकी योजना , एक दिवास्वप्न और एक छलावे से अलग कुछ नहीं हो सकता ।

    दूसरी बात यह है कि खेती , पशुपालन आदि से ही मनुष्य की सबसे बुनियादी आवश्यकता - भोजन - की पूर्ति होती है । अभी तक खाद्यान्नों का कोई औद्योगिक या गैर खेती विकल्प आधुनिक तकनालाजी नहीं ढूंढ पाई है । भविष्य में इसकी संभावना भी नहीं है। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति में खाद्य आपूर्ति और खेती का बड़ा महत्व है । जो देश स्वतंत्रता और सम्मान के साथ रहना चाहते हैं , वे खाद्य स्वावलम्बन पर बहुत जोर देते हैं । खाने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाना चरम लाचारी का द्योतक है । जापान जैसे देश तो भारी अनुदान देकर भी अपनी धान की खेती को कायम रखना चाहते हैं । संयुक्त राज्य अमरीका ने भी अपनी खेती के अनुदान लगातार बढ़ाये हैं , ताकि वह ज्यादा उत्पादन करके दुनिया में खाद्य व अन्य कच्चे माल के बाजार पर अपना नियंत्रण बनाए रख सकें । विश्व व्यापार संगठन की वार्ताओं में खेती के मुद्दे पर ही गतिरोध बना हुआ है ।

    तीसरी बात यह है कि मानव समाज की आर्थिक गतिविधियों में ( खेती एवं पशुपालन , मछलीपालन आदि ) ही ऐसी गतिविधि हैं , जिसमें वास्तव में उत्पादन एवं नया सृजन होता है । प्रकृति की मदद से किसान बीज के एक दाने से बीस से तीस दाने तक पैदा कर लेता है । उद्योगों में कोई नया उत्पादन नहीं होता , पहले से उत्पादित पदार्थों(कच्चे माल) का रूप परिवर्तन होता है । सेवाएं तो , जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं , परजीवी होती हैं और पहले से सृजित आय के पुनर्वितरण का काम करती हैं । उर्जा या कैलोरी की दृष्टि से भी देखें, तो जहाँ अन्य आर्थिक गतिविधियों में उर्जा की खपत होती है, खेती में ,पशुपालन में उर्जा या कैलोरी का सृजन होता है । इसमें मार्के की बात प्रकृति का योगदान है । खेती में प्रकृति मानव श्रम के साथ मिलकर वास्तव में सृजन करती है ।

    इन कारणों से मानव समाज में खेती का अहम स्थान बना रहेगा । विकास या प्रगति की किसी भी योजना में खेती व गाँव को केन्द्र में रखना होगा , तभी वह सही मायने में विकास कहला सकेगा । ऐतिहासिक रूप से चले आ रहे गाँव , खेती व किसानों के शोषण को समाप्त करना होगा और पूँजी के प्रवाह को उलटना पड़ेगा । बुद्धदेव भट्टाचार्य को इस बात का जवाब देना होगा कि आखिर किसान का बेटा किसान ही रहकर खुशहाल क्यों नहीं हो सकता ? अन्न उत्पादन करके मानव जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत पूरी करनेवाला किसान फटेहाल , अशिक्षित और कंगाल क्यों रहे ? वह इस देश का समृद्ध , सुशिक्षित , सम्मानित नागरिक क्यों नहीं हो सकता ?

    लेकिन क्या खेती से ही सबको रोजगार मिल जाएगा और औद्योगीकरण की कोई जरूरत नहीं है ? इसका जवाब है बिलकुल नहीं । लेकिन वह बिलकुल अलग किस्म का औद्योगीकरण होगा । आज भारत के गाँव उद्योगविहीन हो गए हैं और वहाँ खेती-पशुपालन के अलावा कोई धंधा नहीं रह गया है । गाँव और खेती एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं । दूसरी ओर गांव और उद्योग परस्पर विरोधी हो गये हैं । जहाँ गाँव है , वहाँ उद्योग नहीं है और जहाँ उद्योग है , वहाँ गाँव नहीं है । यह स्थिति अच्छी नहीं है और यह भी औपनिवेशिक काल की एक विरासत है । अँग्रेजी राज के दौरान भारत के सारे छोटे , कुटीर व ग्रामीण उद्योग धन्धों को खतम कर दिया गया । अर्थशास्त्री थॉर्नर दम्पती ने इसे विऔद्योगीकरण या औद्योगिक-विनाश (deindustralisation)  का नाम दिया था । उन्होंने जनगणना के आंकड़ों की तुलना करके बताया कि अँग्रेजी राज में कृषि पर निर्भर भारत की आबादी का हिस्सा घटने के बजाए बढ़ा था और उद्योगों पर निर्भर हिस्सा कम हुआ था । देश आजाद होने के बाद भी भारत के गांवों के औद्योगिक विनाश की यह प्रक्रिया कमोबेश चालू रही , हांलाकि अब वह जनगणना की आंकड़ों में उतने स्पष्ट ढंग से नहीं दिखाई देती । सिंगूर , नन्दीग्राम और विशेष आर्थिक क्षेत्रों से यह प्रक्रिया और तेज होगी ।

    यदि बंगाल की वामपंथी सरकार वास्तव में बंगाल का विकास करना चाहती है तथा बेरोजगारी दूर करना चाहती है , तो उसे इस प्रक्रिया को उलटना होगा । उसे टाटा और सालेम समूह को बुलाने के बजाय बंगाल के गांवों में लघु व कुटीर उद्योगों का जाल बिछाना होगा । जरूरी नहीं कि ये कुटीर उद्योग पुरातन जमाने की नकल हों । नई परिस्थितियों के मुताबिक नए ढंग के कुटीर उद्योग हो सकते हैं । लेकिन वे गाँव आधारित हों , गाँव के स्वावलम्बन को मजबूत करते हों , कम पूँजी और अधिक श्रम का इस्तेमाल करते हों । इस प्रकार के औद्योगीकरण में किसानों की जमीन छीनने और उन्हें विस्थापित करने की जरूरत नहीं होगी । बड़ी पूँजी लगाने के लिए देशी पूँजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की चिरौरी करने की जरूरत नहीं होगी । गाँवों के निवासियों को नगरों , महानगरों  व औद्योगिक केन्द्रों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा । गांवों और खेती को कंगाल बनाकर उनसे पूँजी खींचने की जरूरत नहीं होगी । इसमें आय , पूंजी व सम्पत्ति का केन्द्रीकरण नहीं होगा । प्रकृति से दुश्मनी और पर्यावरण का नाश भी कम होगा । हां , इसके लिए केन्द्र सरकार और भूमण्डलीकरण की ताकतों से जरूर वास्तव में लोहा लेना होगा । सिर्फ विरोध की रस्म अदायगी से काम नहीं चलेगा ।

    इसी प्रकार का विकेन्द्रित और गांव- केन्द्रित औद्योगीकरण तथा विकास ही भारत जैसे देशों के लिए उपलब्ध एकमात्र विकल्प है । आज के सन्दर्भ में समाजवाद का रास्ता भी यही है । इतिहास के अनुभवों की समीक्षा और विश्लेषण करते हुए और अपने वैचारिक पूर्वाग्रहों को छोड़ते हुए , तमाम वामपंथियों को इसे स्वीकार करना चाहिए । इसमें कुछ गाँधी और शुमाखर की बू आए , मार्क्स , माओ और गांधी का मेल करना पड़े , नारोदनिकों की जीत व लेनिन की हार दिखाई दे , तो होने दें , क्योंकि आम जनता के हित , समाजवाद का लक्ष्य और इतिहास की सच्चाई किसी भी वैचारिक हठ या पूर्वाग्रह से ज्यादा बड़ी चीज है ।

                                                                 लेखक - सुनील ,

                                                राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, समाजवादी जनपरिषद,

                                                    ग्राम/ पोस्ट केसला, वाया इटारसी ,

                                                    जिला होशंगाबाद (म.प्र.) ४६१ १११

                                                      फोन ०९४२५० ४०४५२

   

मंगलवार, सितंबर 04, 2007

औद्योगिक स्भ्यता के निशाने पर खेती-किसान : ले.सुनील (५)

    भारत की खेती और भारत के किसान  ,आज इस औद्योगिक सभ्यता के प्रमुख निशाने पर हैं । बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसमें अपने मुनाफों की नयी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं । भूमण्डलीकरण का जो चौतरफा हमला भारत के किसानों पर हो रहा है, सीधे जमीन का अधिग्रहण और विस्थापन उस हमले का सिर्फ एक हिस्सा है ।आम किसानों के लिए खेती की लागतों को बढ़ाना तथा उनको मिलने वाले कृषि उपज के दामों को गिराना ( या पर्याप्त बढ़ने न देना) और इस प्रकार खेती को निरंतर घाटे का धन्धा बनाना, इस हमले की रणनीति का प्रमुख अंग है । नतीजा यह हुआ है कि आम किसान भारी कर्ज में डूब रहे हैं और बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं । किसान स्वयं खेती छोड़ दें या फिर कंपनियों के चंगुल में आ जाएं इसके लिए कई कानून , नीतियाँ व योजनाएँ बनाई जा रही हैं । खाद्य स्वावलम्बन या खाद्य सुरक्षा की बात अब पुरानी हो गयी है । मुक्त व्यापार के सिद्धान्तकारों का कहना है कि कोई जरूरी नहीं कि भारत अपनी जरूरत का अनाज , दालें या खाद्य तेल खुद पैदा करें ।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कर्पोरेट खेती ही आगे बढ़ेगी , शेष खेती डूब जायेगी । जब भारत सरकार खेती की विकास दर बढ़ाने और दूसरी हरित क्रांति की बात करती है , तो उसकी नजर में इसी प्रकार की खेती होती है । इसलिए , भारत सरकार हो या पश्चिम बंग सरकार , सिंगूर-नन्दीग्राम के छोटे छोटे किसानों की खेती को बचाना या उसे समृद्ध बनाना , उनके एजेण्डे में नहीं है । यह एक संयोग नहीं है कि पिछले वर्षों में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार की कृषि नीति को तैयार करने का काम ब्रिटेन की मेकिन्जी नामक उसी सलाहकार कंपनी को दिया गया था , जो विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक की परियोजनाओं में अक्सर मौजूद रहती है और जो भारत के योजना आयोग , भारत सरकार के अनेक मंत्रालयों और भूमण्डलीकरण पथ अनुगामी राज्य सरकारों को अक्सर सलाह देती रहती है ।

    यह सही है कि आज भारत के किसानों की हालत अच्छी नहीं है और गांवों में रोजगार , प्रगति तथा बेहतरी के अवसर नजर नहीं आते हैं । बुद्धदेव भट्टाचार्य जब सवाल पूछते हैं कि  ' क्या किसान का बेटा किसान ही रहेगा ? ' तो वे ग्रामवासियों और किसानों की इस बदहाली व प्रगतिहीनता की स्थिति को अपने पक्ष में भुनाना चाहते हैं । लेकिन सवाल यह है कि गांव - खेती की इस बदहाली , जाहिली व गतिहीनता के लिए कौन जिम्मेदार है ? क्या तीस वर्षों से बंगाल पर राज कर रही वामपंथी सरकार स्वयं नहीं , जिसने ऑपरेशन बरगा वाले भूमि सुधारों को अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली और उसके बाद कुछ नहीं किया ? क्या भारत सरकार और पश्चिम बंगाल द्वारा समान रूप से अपनाई जा रही विकास नीतियाँ इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ?

    दूसरा सवाल यह है कि सिंगूर-नन्दीग्राम वगैरा से बेदखल कितने किसान-पुत्रों को महानगरों में सम्मानजनक रोजगार मिल पाएगा ? क्या वे महानगरों के नारकीय जीवन वाली झुग्गी झोपड़ियों की संख्या ही बढ़ाने का काम नहीं करेंगे ?

    जब बुद्धदेव भट्टाचार्य ( या मनमोहन सिंह , चिदम्बरम ,अहलूवालिया) औद्योगीकरण को बंगाल (या भारत) की बेरोजगारी की समस्या का एकमात्र हल बताते हैं , तो वे इस ऐतिहासिक तथ्य को भूल जाते हैं कि इस प्रकार के औद्योगीकरण से दुनिया में कहीं भी बेरोजगारी की समस्या हल नहीं हुई है ।इस औद्योगीकरण से तो बेरोजगारी पैदा होती है , खतम नहीं होती है । पश्चिमी यूरोप के देशों में भी पूँजीवाद एवं औद्योगीकरण ने बेरोजगारी पैदा की है । लेकिन वहाँ की बेरोजगारी हमें इसलिए नहीं दिखाई देती , क्योंकि यूरोप के लोग अमरीका- ऑस्ट्रेलिया - दक्षिणी अफ्रीका में फैल गये और वहाँ के मूल निवासियों को बेदखल करके वहाँ के संसाधनों पर कब्जा करके वहीं बस गये । एक प्रकार से अपनी बेरोजगारी व बदहाली उन्होंने गैर-यूरोपीय अश्वेत लोगों को स्थानांतरित कर दी । आज भी यूरोप-अमरीका से रोजगार का प्रमुख स्रोत उद्योग नहीं तथाकथित सेवाएँ हैं ।ये सेवाएँ एक प्रकार का भ्रामक नाम है । पूरी दुनिया को लूटकर जो पैसा व समृद्धि अमरीका-यूरोप में बटोरी जाती है , उसी को आपस में बांतने व मौज करने का नाम ये सेवायें हैं ।पाँच सितारा होटल , रेस्तराँ , पर्यटन , टेलीफोन , टी.वी. , फिल्म , विज्ञापन , परिवहन , व्यापार , बैंक , बीमा आदि आज की प्रमुख सेवाएँ हैं । इन सेवाओं में वास्तविक उत्पादन या सृजन नहीं होता है ।खेती-उद्योगों में जो उत्पादन और आय-सृजन होता है , उसी को बांटने का काम सेवाएँ करती हैं । इन्हें परजीवी   भी कहा जा  सकता है ।

    जिस चीन की चमत्कारिक प्रगति को आज मनमोहन - माकपा दोनों अनुकरणीय मान रहे हैं, वहाँ भी तेजी से औद्योगीकरण और निर्यातों में वृद्धि होने के बावजूद रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। 'फ्रन्टलाइन' के एक ताजे अंक में अर्थशास्त्री जयति घोष ने अपने स्तम्भ में बताया है कि चीन में उद्योगों से अधिकतम रोजगार वर्ष १९९५ में १० करोड़ से भी कम था । निर्यात-आधारित उद्योगों में तेजी से वृद्धि के बावजूद उद्योगों से रोजगार अब उस से भी १२ प्रतिशत कम है । (फ्रन्टलाइन , १२ अप्रैल २००७)

    अमरीका-यूरोप की समृद्धि की चकाचौंध से चमत्कृत पूँजीवादी तथा माकपा-छाप साम्यवादी दोनों एक साधारण सा प्रश्न भूल जाते हैं । यूरोप-अमरीका में खेती और उद्योगों से बेदखल व बेरोजगार हुए लोग तो पूरी दुनिया में बंट गये , औपनिवेशिक तथा नव-औपनिवेशिक लूट में खप गए ,जम गए। भारत में यदि बड़े पैमाने पर गाँव गाँव-खेती से लोग बेदखल होंगे, तो वे करोडों लोग कहाँ जाएंगे?उनका क्या भविष्य होगा ?

( जारी )

पिछले भाग : एक , दो , तीन , चार .

   

रविवार, सितंबर 02, 2007

औद्योगिक सभ्यता ,गाँधी ,नए संघर्ष : ले. सुनील(४)





पूंजीवादी और औद्योगिक सभ्यता के इस विनाशकारी पहलू का अहसास उन्नीसवीं शताब्दी में मार्क्स सहित यूरोपीय विचारकों को नहीं होना स्वाभाविक था ,लेकिन गांधी ने इसे बहुत पहले ताड़ लिया था ।इसीलिए गांधी ने इसे राक्षसी सभ्यता कहा था । यूरोप - अमेरिका में हाल में दो - तीन दशक पहले , जब प्रदूषण से उनका खुद का जीवन नारकीय होने लगा , तब जाकर इसके विरुद्ध आवाज उठी और ग्रीन्स जैसे आंदोलनों ने जन्म लिया । अब तो ओजोन की छतरी में छेद और दुनिया के बढ़ते तापमान की चिन्ता उन्हें सता रही है । स्वयं के जंगलों को नष्त करके और पूरी दुनिया के जंगलों के नाश के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार होने के बाद अब वे जंगलों और जंगली जानवरों की प्रजातियों को बचाने के लिए अभियान चला रहे हैं ।लेकिन इस पर्यावरण चेतना में अभी भी यह बात पूरी तरह नहीं आई है कि सल में इस विनाश का कारण तो औद्योगिक सभ्यता और आधुनिक जीवन शैली है । जब तक उसपर रोक नहीं लगायी जाती ,और उसका विकल्प नहीं ढ़ूँढा जाता , तब तक पर्यावरण और मानवीय दोनों प्रकार के संकट गहराते जाएंगे ।



नन्दीग्राम , सिंगूर ,कलिंगनगर , काशीपुर आदि इस बात के भी द्योतक हैं कि आधुनिक औद्योगीकरण की जल - जंगल-जमीन-खनिज की भूख बहुत जबरदस्त है। यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ रही है कि बड़े उद्योगों , आधुनिक जीवन-शैली और भूमण्डलीकरण के लिए किसानों-मजदूरों का शोषण तथा उससे पूंजी संचय ही पर्याप्त नहीं है , उसे बड़े पैमाने पर जमीन भी चाहिए । इसी प्रकार पानी की उसकी जरूरत भी जबरदस्त है और कई स्थानों पर पानी को ले कर भी झगड़े और संकट पैदा हो रहे हैं । उड़ीसा की महानदी पर हीराकुद बांध चार दशक पहले सिंचाई के लिए बना था,किन्तु अब उसके बगल में ढेर सारे उद्योगों के इस बांध से पानी देने के करार उड़ीसा सरकार ने कर लिये हैं , जिससे किसान आशंकित और आन्दोलित हो गये हैं ।केरल के प्लाचीमाड़ा जैसे आन्दोलन भी बहुचर्चित हैं जहाँ स्वयं पानी एक बाजार में बेचने की वस्तु बनने और उसके अत्यधिक खनन से संकट पैदा हो गया है और पानी पर किसका अधिकार होगा, वहाँ यह सवाल खड़ा हो गया है । इसी प्रकार , उड़ीसा - झारखण्ड-छत्तीसगढ़ में खनिजों को लेकर बड़े पैमाने पर करार हो रहे हैं , जिन्में पोस्को व मित्तल जैसे समझौते भी हैं ।दुनिया के खनिज भण्डार सीमित हैं । अब पूंजीवादी औद्योगीकृत देशों की रणनीति है कि वे अपने खनिज भण्डार सुरक्षित रखकर शेष दुनिया के खनिजों का दोहन करना चाहते हैं ।मुक्त व्यापार और निर्यात आधारित विकास का जो पाठ दुनिया के गरीब ' अविकसित ' देशों को पढ़ाया जा रहा है , वह उनकी इस रणनीति में काफी सहायक साबित हो रहा है । विश्व व्यापार संगठन , विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष इसमें उनके औजार हैं । लेकिन जहाँ इनसे काम नहीं चलता , वे सीधे सैनिक बल का प्रयोग करने से भी नहीं चूकते । इराक और अफगानिस्तान में अमरीका- ब्रिटेन का हमला इसका ताजा उदाहरण है ।



आज भारत में या दुनिया के स्तर पर जो संघर्ष हो रहे हैं या जो विवाद चल रहे हैं , उनके केन्द्र में नव-औपनिवेशिक शोषण , साम्राज्यवादी चालें , अस्मिताओं की टकरहाट एवं प्राकृतिक संसाधनों को लेकर टकराव ही है । मालिक-मजदूरों के संघर्ष या तो अनुपस्थित हैं या नेपथ्य में चले गये हैं । भारत में पिचले तीन दशकों में जो आन्दोलन चर्चा व सुर्खियों में रहे हैं, वे या तो सीधे जल-जंगल-जमीन को लेकर हुए हैं जैसे चिपको , नर्मदा बचाओ, चिलिका,गंधमार्दन,काशीपुर,गोपालपुर,कोयलकारो ,टिहरी , प्लचीमाड़ा , मेंहदीगंज , कालाडेरा,बालियापाल,नेतरहाट,पोलावरम ,कलिंगनगर , लांजीगढ़ , कावेरी जल विवाद , या फिर किसानों के , आदिवासियों के, दलितों के , और क्षेत्रीय अस्मिताओं (असम,झारखण्ड , पृथक तेलंगाना,पंजाब,कश्मीर,उत्तरपूर्व ,उत्तरबंग आदि) के संघर्ष रहे हैं ।वे भी आधुनिक विकास की विसंगतियों ,क्षेत्रीय विषमता और अत्यधिक केन्द्रीकरण से उपजे हैं। दुनिया के स्तर पर भी जो संघर्ष एवं टकराव चल रहे हैं जैसे इराक , अफगानिस्तान , वेनेजुएला , बोलिविया , इरान , नाईजीरिया , फिलीस्तीन आदि, उनके पीछे भी तेल , प्राकृतिक गैस , जमीन ,खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों का झगड़ा एक प्रमुख कारक है । बींसवीं और इक्कीसवीं सदी की दुनिया की यह एक बड़ी सच्चाई है , जिसकी रोशनी में हमें अपने पुराने सिद्धान्तों और विश्वासों को परखना होगा , नन्दीग्राम-सिंगूर जैसी घटनाओं को देखना होगा तथा आगे की राह खोजना होगा ।



( जारी ) लेख के पिछले भाग : एक , दो , तीन .





शनिवार, सितंबर 01, 2007

'पूंजी',रोज़ा लक्ज़मबर्ग,लोहिया : ले. सुनील (3)

   

निश्चित रूप से कार्ल मार्क्स का ध्यान इस ओर गया था और उन्होंने अपने ग्रन्थ 'पूंजी' में औपनिवेशिक लूट का विस्तृत वर्णन किया है । लेकिन इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य को उन्होंने अपने विश्लेषण का अंग नहीं बनाया । बाद में रोज़ा लक्ज़मबर्ग ने कुछ हद तक इस कमी को पूरा करने की कोशिश की । लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि उपनिवेशों की लूट और शोषण , पूंजीवाद के विकास तथा औद्योगीकरण का एक प्रमुख आधार है , तो दुनिया के गैर - यूरोपीय देशों के लिए तो यह रास्ता खुला ही नहीं है । वे कहाँ के उपनिवेश लाएँगे ? इसलिए भारत सहित एशिया-अफ़्रीका-लातिनी अमेरिका के तमाम देशों के लिए पूंजीवादी विकास और औद्योगीकरण का विकल्प मौजूद ही नहीं है । वहाँ सीमित और अधकचरे किस्म का वैसा ही औद्योगीकरण हो सकता है , जैसा अभी तक हुआ है ।लेकिन आधुनिक औद्योगिकरण की औपनिवेशिक शोषण की अनिवार्यता इतनी गहरी है व अन्तर्निहित है कि इसके लिए भी इन देशों के बाहर उपनिवेश नहीं मिले , तो देश के अंदर उपनिवेश विकसित करने पड़े । इन देशों के पिछड़े इलाके , आदिवासी अंचल , गाँव और खेती आधारित समुदाय , एक प्रकार के ' आंतरिक उपनिवेश ' हैं , जो लगातार उपेक्षा , शोषण , लूट व विस्थापन के शिकार होते रहते हैं । इसलिए खेती और किसानों का दोयम दर्जा , कंगाली व शोषण आधुनिक पूंजीवादी विकास और औद्योगिक व्यवस्था में अंतर्निहित है। वह पूंजी संचय और पूंजी निर्माण का एक प्रमुख स्रोत है । मार्क्सवादी विचार की एक प्रमुख कमी यह है कि एक कारखाने के अंदर मजदूरों के शोषण को ही उसने , अतिरिक्त मूल्य का प्रमुख स्रोत मान लिया लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार , विनिमय एवं पूंजी के जरिये अन्य देशों का शोषण तथा देश के अन्दर अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों का शोषण इसका ज्यादा बड़ा स्रोत साबित हुआ है । इसी शोषण के कारण पश्चिमी यूरोप के देशों में पूंजीपतियों और मजदूरों दोनों की आमदनी में वृद्धि संभव हुई , दोनों के बीच का टकराव टालना संभव हुआ तथा इन देशों में वह क्रान्ति नहीं हुई , जिसकी भविष्यवाणी मार्क्स और एन्गल्स ने की थी । दुनिया के गैर यूरोपीय देशों की दृष्टि मार्क्स के विचार की यह एक प्रमुख कमी थी , जिसे भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने' मार्क्स के बाद का अर्थशास्त्र' ( Economics after Marx, 'Marx,Gandhi and Socialism') नामक अपने निबंध में अच्छे ढंग से उजागर किया है ।

    मार्क्स के विश्लेषण में एक कमी और थी । श्रम को उन्होंने उत्पादन और मूल्य सृजन का मुख्य आधार माना । एक मजदूर के श्रम से जो उत्पादन होता है , उसका पूरा हिस्सा उसे न दे कर एक छोटा सा हिस्सा दिया जाता है, और यही अतिरिक्त मूल्य का व मालिकों के मुनाफ़े का का स्रोत बनता है ।यह सही है ,लेकिन इससे तस्वीर पूरी नहीं बनती । पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में औद्योगीकरण का एक प्रमुक आधार बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का मुफ्त या बहुत कम लागत पर दोहन , शोषण व विनाश भी रहा है । जिस तरह कारखाने के अन्दर एवं देश के अन्दर श्रम का शोषण पूंजीवादी औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं था , उसी तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट व बरबादी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई ।अंतर्राष्ट्रीय व्यापार,विनिमय व अंतर्राष्ट्रीय पूंजी निवेश इसके प्रमुख माध्यम बने । प्राकृतिक संसाधनों का यह शोषण कच्चे माल की निरंतर बढ़ती जरूरतों के रूप में तो है ही , जो खदानों , खेतों , जंगलों और सागरों से प्राप्त होता है ।लेकिन जल , जंगल , जमीन , हवा ,जैविक सम्पदा आदि को सीधे हड़पने , प्रदूषित करने और नष्ट करने की औद्योगिक पूंजीवाद की क्षमता व जरूरत भी जबरदस्त है । यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि अमेरिका के दोनों विशाल महाद्वीप व आस्ट्रेलिया महाद्वीप के मूल  निवासियों को नष्ट करके वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने तथा एशिया व अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने का मौका यूरोप को न मिला होता तो भी औद्योगिक क्रान्ति संभव नहीं होती । चूंकि दुनिया के गरीब एवं कथित रूप से 'अविकसित' देशों में अधिकांश लोगों की जिन्दगी अभी भी प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी है, वहां पर औद्योगिक सभ्यता का दोनों तरह का शोषण  ( श्रम एवं प्राकृतिक संसाधनों का ) काफी हद तक एकाकार हो जाता है । दोनों के विनाशकारी असर को भोगने के लिए वहां की जनता मानों अभिशप्त है ।*

 ( जारी )                                                                                                      

    * दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि पूंजीवादी मुनाफे के साथ एक प्रकार का 'लगान' भी पूंजीवाद का महत्वपूर्ण ( शायद ज्यादा महत्वपूर्ण )अंग है । यह 'लगान' प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जे व एकाधिकार से आता है । इसी प्रकार पेटेण्ट - कॉपीराइट कानूनों के जरिये ज्ञान पर एकाधिकार कायम करके कमाई जा रही रॉयल्टी भी इसी तरह की आय है । यह भी कहा जा सकता है कि जमीन एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों से लोगों को बेदखल करके होने वाला 'प्राथमिक पूंजी संचय'  कोई पूंजीवाद का पूर्व चरण या प्रारंभिक चरण नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाली पूंजी के विस्तार की पूंजीवाद की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है ।

शुक्रवार, अगस्त 31, 2007

नारोदनिक,मार्क्स,माओ और गाँव-खेती : ले. सुनील

 

पिछले भाग से आगे :

    दरअसल मार्क्सवादी और पूंजीवादी दोनों प्रकार के चिंतन में खेती व गांव एक पुरानी , पिछड़ी और दकियानूसी चीज है ,  एक पुरानी सभ्यता के अवशेष हैं । संयुक्त राज्य अमेरिका , कनाडा और पश्चिमी यूरोप में राष्ट्रीय आय में और कार्यशील आबादी में खेती का हिस्सा दो - तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं रह गया है । वहाँ तेजी से नगरीकरण हो रहा है । यूरोप के कुछ हिस्सों में तो कई गांव उजड़ चुके हैं या वहां कुछ बूढ़ों के अतिरिक्त कोई नहीं रहता है । हमारे अनेक नेताओं और बुद्धिजीवियों की दृष्टि में यही हमारी भी मंजिल है और इस दिशा में बढ़ने को वे स्वाभाविक व वांछनीय मानते हैं ।

    गांवों और खेती से विस्थापन की शुरुआत पश्चिम यूरोप में पूंजीवाद के आगमन के साथ ही हो गई थी । वहां बड़े पैमाने पर किसानों को जमीन से बेदखल किया गया था । इंग्लैंड में खेतों की जगह वस्त्र उद्योग के लिए बड़े पैमाने पर भेड़ पालन के लिए चारागाह बनाए गए थे । इससे , नवोदित बड़े उद्योगों के लिए सस्ते बेरोजगार मजदूरों की विशाल फौज भी उपलब्ध हुई । औद्योगिक क्रांति की प्रक्रिया का यह एक अनिवार्य व महत्वपूर्ण हिस्सा था । मार्क्स ने बताया कि जमीन से बेदखल इन मजदूरों ने " श्रम की सुरक्षित औद्योगिक फौज " को बढ़ाने का काम किया । मार्क्स ने इस प्रक्रिया को " प्राथमिक पूंजी संचय " का नाम दिया। भारत में आज जो कुछ हो रहा है उसकी तुलना इससे की जा सकती है । क्या सिंगूर नन्दीग्राम भी भारत का ' प्राथमिक पूंजी संचय ' है और पूंजीवाद के आगे बढ़ने की निशानी है ?  क्या इसीलिए बंगाल की वामपंथी सरकार इस प्रक्रिया को 'कष्टदायक किन्तु अनिवार्य' मानकर चल रही है ?

    कार्ल मार्क्स की खूबी यह थी कि पूंजीवाद के विकास के पीछे की इन सारी प्रक्रियाओं को उन्होंने उधेड़कर रख दिया था , और उनका निर्मम विश्लेषण किया था।किन्तु उनकी एक कमी यह थी कि पश्चिम यूरोप की इन तत्कालीन प्रक्रियाओं को उन्होंने इतिहास की अनिवार्य गति माना और यह मान लिया कि पूरी दुनिया में देर-सबेर इन्हीं प्रक्रियाओं को दोहराया जाना है।सांमंतवाद से पूंजीवाद में प्रवेश , फिर पूंजीवाद के अन्तर्विरोधों के परिपक्व होते हुए संकट आना और तब श्रमिक क्रांति के साथ समाजवाद का आगमन , यह इतिहास की अनिवार्य गति है । दुनिया के हर हिस्से को इस प्रक्रिया से गुजरना होगा तथा इसी पूंजीवादी औद्योगीकरण को बायपास करके कोई भी देश सीधे समाजवाद की ओर नहीं जा सकता । रूस के नारोदनिकों के साथ कम्युनिस्टों की बहस का प्रमुख मुद्दा यही था । नारोदनिक  सोचते थे कि जार को हटाकर रूस की पारम्परिक गांव आधारित सामुदायिक व्यवस्था से सीधे समाजवाद की ओर जाया जा सकता है । आज माकपा के महासचिव प्रकाश करात कह रहे हैं कि नन्दीग्राम -  सिंगूर मसले पर बंगाल सरकार की आलोचना करने वाले वामपंथी नारोदनिकों की ही तरह बात कर रहे हैं और सच्चे मार्क्सवादी नहीं हैं ।पूंजीवाद का विकास भी पश्चिम यूरोप की तरह होगा जिसमें बड़े - बड़े उद्योग होंगे तथा उनमें हजारों - हजारों की संख्या में मजदूर काम करेंगे । इन्हीं करखनिया मजदूरों के बढ़ते संगठन तथा उनकी बढ़ती वर्ग चेतना की बदौलत साम्यवादी क्रांति होगी और वे ही क्रांति के हरावल दस्ते होंगे ।

    इस सिद्धान्त में मार्क्स के अनुयायियों का विश्वास इतना गहरा था कि दुनिया के गैर-यूरोपीय हिस्सों में भी वे मानते रहे हैं कि पूंजीवाद का आगमन एवं विकास इतिहास का एक अनिवार्य और प्रगतिशील कदम है तथा औद्योगिक मजदूर ही क्रान्ति के अग्रदूत होंगे । भारत सहित तमाम देशों वहां की जमीनी असलियतों को नजरअन्दाज करते हुए , वे संगठित क्षेत्रों के मजदूरों को ही संगठित करने में लगे रहे । जाहिर है कि इस विचार में किसानों का कोई स्थान नहीं था । जमीन से चिपके होने के कारण किसान ' सर्वहारा ' नहीं हो सकते । सोवियत क्रांति में बोल्शेविकों ने किसानों का समर्थन हासिल किया था और बोल्शेविकों की जीत में इस समर्थन की महत्वपूर्ण भूमिका थी । लेकिन बाद में सोवियत रूस में औद्योगीकरण के एक अनिवार्य कदम के रूप में कृषि उपज की कीमतों में कमी की गयी , तब किसानों ने अपना अनाज बेचने से इंकार कर दिया । तब किसानों से जमीन छीनकर जबरदस्ती सामूहिक फार्म बना दिये गये और विरोध करने वाले लाखों किसानों को स्टालिन राज में मौत के घाट उतार दिया गया या दूरदराज के इलाकों में निष्कासित करके निर्माण कार्यों में मजदूरी पर लगा दिया गया । तभी से किसानों को ' कुलक ' कहकर मार्क्सवादी दुनिया में तुच्छ नजरों से देखा जाता है और आम तौर पर , उन्हें क्रांति-विरोधी माना जाता है । भारत में भी कई बार वामपंथियों द्वारा किसान आन्दोलनों को कुलक आंदोलन कह कर तिरस्कृत किया गया है ।

    चीन की परिस्थितियाँ अलग थीं और रूस जितना सीमित औद्योगीकरण भी वहां नहीं हुआ था । इसलिए माओ के नेतृत्व में चीन की साम्यवादी क्रांति पूरी तरह किसान क्रांति थी । इसलिए प्रारंभ में साम्यवादी चीन का रास्ता अलग भी दिखायी देता है । घर के पिछवाड़े इस्पात भट्टी , नंगे पैर डॉक्टरों और साईकिलों का चीन विकास की एक अलग राह पकड़ता मालूम होता है । लेकिन संभवत: पश्चिमी ढंग के औद्योगीकरण की श्रेष्ठता व अनिवार्यता का विश्वास मार्क्सवादी दर्शन में इतना गहरा था कि चीन के साम्यवादी शासकों ने भी यह मान लिया कि ये सब तो संक्रमणकालीन व्यस्थाएं हैं , अंतत: चीन को भी उसी तरह का औद्योगीकरण करना है , जैसा यूरोप-अमरीका में हुआ । इसी विश्वास और विकास की इसी राह की मजबूरियों आखिरकार साम्यवादी चीन को भी पूरी तरह पूंजीवादी पथ का अनुगामी बना दिया । यहाँ नोट करने लायक बात यह है कि सोवियत संघ के पतन के बाद चीन ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का मॉ्डल है । बुद्धदेव भट्टाचार्य और मनमोहन सिंह , दोनों चीन का गुणगान और अनुकरण करते नजर आते हैं । विशेष आर्थिक क्षेत्र की अवधारणा भी चीन से ही आई है ।चीन से जो खबरें आ रही हैं , उनसे मालूम होता है कि वहाँ बड़े पैमाने पर विस्थापन , बेदखली , प्रवास और बेरोजगारी का बोलबाला है । कई नन्दीग्राम वहाँ पर भी हो रहे हैं ।

    तो मार्क्सवाद की धारा में पूंजीवाद और ( पश्चिम यूरोप की तरह के) औद्योगीकरण से कोई छुटकारा नहीं है । समाजवाद के पहले पूंजीवाद को आना ही होगा । मार्क्स ने जिन्हें उत्पादन की शक्तियां कहा है , जिन्हें प्रचलित भाषा तकनालाजी कहा जा सकता है , जब तक उनका विकास नहीं होगा  तब तक समाजवाद के आने के लिए स्थिति परिपक्व नहीं होगी। पूरी दुनिया को इसी रास्ते से गुजरना होगा। आधुनिक औद्योगिक विकास का एक वैकल्पिक रास्ता सोवियत संघ का था , जिसमें पूंजी संचय और बड़े उद्योगों के विकास का काम सरकार करती है । किन्तु सोवियत मॉडल के फेल हो जाने के बाद , अब कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इसीलिए बंगाल की वामपंथी सरकार ने टाटा और सालेम समूह को आमंत्रित करके ही बंगाल के औद्योगीकरण की योजना बनाई है । देश के अन्य राज्यों के मुख्यमन्त्रियों की तरह ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आमंत्रित करने के लिए विदेश यात्राएं करते हैं । जिस टाटा - बिड़ला को कोसे बगैर भारतीय साम्यवादियों का कोई कार्यक्रम पूरा नहीं होता था , उसी टाटा से आज उनकी दोस्ती व प्रतिबद्धता इतनी गहरी हो गयी है कि वे अपने किसानों पर लाठी-गोली चला सकते हैं, लेकिन उनका साथ नहीं छोड़ सकते हैं । यह सब वे बंगाल के औद्योगीकरण के लिए कर रहे हैं । जाहिर है कि औद्योगीकरण में यह आस्था अंधविश्वास की हद तक पहुंच गयी है ।

    दरअसल , उदारवादी या नव उदारवादी तथा मार्क्सवादी दोनों विचारधाराओं में पूंजीवाद के विकास के एक महत्वपूर्ण आयाम को नजरअन्दाज करने से यह गड़बड़ी पैदा हुइ है। वह यह है कि पूंजीवाद के विकास में औपनिवेशिक लूट व शोषण की एक महत्वपूर्ण तथा अनिवार्य भूमिका थी । पूंजी संचय का स्रोत सिर्फ देश के अन्दर किसानों का विस्थापन और मजदूरों का शोषण नहीं था । पूरी दुनिया के किसानों , मजदूरों, करीगरों और पारम्परिक धंधों के शोषण व विनाश पर यूरोप की औद्योगिक क्रांति आधारित थी । यदि इंग्लैंड , फ्रान्स , जर्मनी , स्पेन , हालैन्ड , आदि के पास पूरी दुनिया के उपनिवेश नहीं होते , तो औद्योगिक क्रांति हो ही नहीं सकती थी । असली सर्वहारा तो इन उपनिवेशों के किसान, बुनकर ,करीगर और आदिवासी थे। आज भी नव-औपनिवेशिक तरीकों से पूरी दुनिया को लूटकर व चूसकर ही यूरोप-अमरीका में पूंजीवाद फला-फूल रहा है । भूमंडलीकरण इसी प्रक्रिया का नवीनतम और व्यापकतम रूप है। अमेरिका यूरोप की समृद्धि और एशिया-अफ़्रीका-लातिनी अमेरिका की कंगाली व बदहाली एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।

( जारी )