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बुधवार, अप्रैल 04, 2007

राजनीति में मूल्य (शेष भाग) : किशन पटनायक

पिछली प्रविष्टी से आगे : ऊपर की बातों से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि राजनीति में मूल्यों की प्रबलता का होना एक निरन्तर स्थिति नहीं है । यह भी सोचना गलत है कि साधारण मतदाता या जनसाधारण मूल्यों पर बहुत आग्रह रखता है या जनसाधारण के दबाव से ही राजनीति सही दिशा में प्रवाहित होगी ; इतिहास बताता है कि यह काम आम आदमी का दायित्व नहीं है । मूल्यों और दिशाओं का प्रवर्तन बुद्धिजीवी करते हैं - तब करते हैं जब वे या तो सत्य की खोज करते हैं या लोक के प्रति अपने को उत्तरदायी समझते हैं । एक छोटे समूह के द्वारा संगठित-प्रचार होकर ये मूल्य जनसाधारण का समर्थन प्राप्त करते हैं और व्यापक समाज में हलचल पैदा करते हैं । इसी बिन्दु पर जनसाधारण मूल्यों का संरक्षक भी बनता है ।लेकिन जब बौद्धिक समाज में जड़ता आ जाती है तब जनसाधारण पुन: मूल्यों के बारे में उदासीन हो जाता है ।

उत्तर भारत के मौर्यकाल से हर्षवर्धन तक और गोरे देशों में १७वीं-१८वीं सदी में ज्ञान और धर्म के क्षेत्रों में सांस्कृतिक आन्दोलन की प्रबलता थी । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रथमार्ध में यूरोप की राजनीति में क्रान्तिकारी मानवीय मूल्य स्थापित हुए और बाद में पूरे विश्व में इन मूल्यों का प्रसार हुआ ।कई औपनिवेशिक देशों में साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीति के तहत वहाँ के बौद्धिक समूह सक्रिय हुए । इन देशों की राजनीति में साम्राज्यवाद-विरोधी और पूँजीवाद-विरोधी मूल्यों और आदर्शों की स्थापना हुई । भारत में गांधी और समाजवाद के अपने-अपने बौद्धिक वर्ग बने । जब बौद्धिक वर्ग व्यापक ढंग से और निरन्तरता के साथ राजनीति को मूल्यों के द्वारा प्रभावित करता है तब जनसाधारण भी मूल्यों के बारे में मुखर होता है । हाल के चुनाव में यह कितना हास्यास्पद लगता था कि कुछ बुद्धिजीवी लोग चुनाव घोषित हो जाने और नामांकन हो जाने के बाद भ्रष्टाचारी और अपराधी प्रत्याशियों की पहचान करवाते थे । बुद्धिजीवियों के लिए यह जीवन भर का काम है, चुनाव के दिनों में वे अपना मत ठीक ढंग से दे दें , तो काफी है । प्रसिद्ध व्यावसायिक पत्रिका आउटलुक ने कई नामी-गिरामी बुद्धिजीवियों को लेकर प्रत्याशियों की नैतिकता की जाँच करने की एक टोली बनाई थी । लेकिन इनमें से एक भी आदमी स्पष्ट शब्दों में नहीं बताता कि उदारीकरण और ग्लोबीकरण से भारत की आम जनता को क्या लाभ होगा । इस टोली का कोई भी व्यक्ति यह नहीं बताता कि लगातार बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी को कैसे रोका जाए और बुद्धिजीवियों की वेतनवृद्धि क्यों वांछनीय है ।धन के केन्द्रीकरण का भ्रष्टाचार और अपराध से कोई सम्बन्ध है या नहीं ? अपने युग के ज्वलन्त और बुनियादी सवालों पर जिन बुद्धिजीवियों का कोई स्पष्ट मत नहीं है वे चले हैं चुनाव-राजनीति को प्रभावित करने ! पक्षधर बनकर या अपना खेमा गाड़कर ही कोई बौद्धिक समूह चुनाव को प्रभावित कर सकता है ।

असल में राजनैतिक अनैतिकता की वृद्धि का युग समाज में बौद्धिक पतन का भी युग होता है । पिछले कई सालों में भारत की ज्ञान-संस्थाओं की सबसे बड़ी घटना है प्रोफेसरों और विशेषज्ञों के रहन-सहन और वेतन-भत्तों में अभूतपूर्व वृद्धि । उनकी जड़ता और उदासीनता के कारण देश के साधारण जनों का जो अपना पारम्परिक ज्ञान और विवेक था वह भी नष्ट हो गया है और कोई नया मूल्य भी स्थापित नहीं हो पाया है ।

फिर भी चुनाव के दिनों में मूल्यों की बात इसलिए होती है कि राजनेता या उसका समर्थक - बुद्धिजीवी जब जनसाधारण के पास जाएगा तो मूल्यों के बिना कोई खुला संवाद हो नहीं सकता है । अगर राजनीति में जनसाधारण नहीं होता तो ये लोग मूल्यों की बात पाखंड के स्तर पर भी नहीं करते । यह सत्य है कि राजनैतिक अस्थिरता जनसाधारण को पसन्द नहीं है , देश के लिए अच्छी चीज नहीं है । लेकिन 'स्थिरता' कोई ऐसा मूल्य नहीं है जो कांग्रेस या भाजपा की सरकार बनने से लोगों को प्राप्त हो जाएगा । अस्थिरता की एक प्रक्रिया चल रही है ; इस प्रक्रिया को कहाँ रोका जाएगा ? कहाँ-कहाँ रोकने पर पाँच-दस साल के बाद स्थिरता आयेगी । उन मूल्यों को स्थापि करने का वायेदा कोई भी बड़ा रजनैतिक दल नहीं कर रहा है । चुनाव के बाद दल-बदल आधारित सरकार हम नहीं बनायेंगे - यह वायदा कोई नहीं करता ।तब स्थिरता कैसे लाएँगे ? किसी भी खेमे के घटक यह वायदा नहीं करते कि जिस खेमे की ओर से चुनाव लड़ते हैं , अगले चुनाव तक उसी खेमे में रहेंगे ? अगर खेमा बदलने की भी गुंजाइश है तो स्थिरता कैसे आयेगी ? अन्ततोगत्वा 'राजनैतिक स्थिरता' और 'साम्प्रदायिक शान्ति' आम जनता की आर्थिक सुरक्षा पर ही टिकी रहती है । आर्थिक गैर-बराबरी और असुराक्षा बढ़ती रहेगी और साम्प्रदायिक शान्ति कायम रहेगी , यह कैसे सम्भव है ? करोड़ों लोग बेकार होते जाएँगे , विस्थापित होते रहेंगे तो राजनैतिक स्थिरता का आधार क्या होगा ?

बेरोजगारी , अशिक्षा आदि प्रश्नों का सीधा सम्बन्ध आर्थिक क्षमता से है । मार्च १९९८ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने १० वर्षों के कुछ लक्ष्य घोषित किए ? बेकारी १० वर्षों में पूरी तरह समाप्त हो जाएगी । इतनी पूँजी और बजट का व्यय कहाँ से आएगा ? वेतन वृद्धि से ५० से १०० हजार करोड़ रु. का जो अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा , वह पैसा कहाँ से आएगा ? क्या इसके बाद भी बजट में में इतना पैसा रह जाएगा जिससे भाजपा सरकार नए रोजगार और सम्पूर्ण प्राथमिक शिक्षा की योजनाएँ बना पाएगी ? वित्तीय इन्तजाम का उपाय बताये बगैर लोककल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करना विशुद्ध बेईमानी है । वेतन-वृद्धि को रोककर उसी पैसे को या तो प्राथमिक शिक्षा या रोजगार विस्तार के लिए लगाया जा सकता है । कोई खेमा इसके लिए तैयार नहीं है । यानी उनकी सरकारें न बेरोजगारी दूर करने के बारे में गम्भीर हैं , न प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के बारे में ।

जब अच्छाई कहीं भी नहीं होती है , और नए सिरे से अच्छाई पैदा करने की शक्ति मुख्य नायकों में नहीं होती है तब एक तरकीब निकलती है : बुराइयों को छोटी और बड़ी में बाँटने की । वैसे , बुराई से जुड़ना एक मानवीय स्थिति है ।व्यवहार के हर मोड़ पर ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है जिसमें किसी न किसी बुराई के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से समझौता करना होता है । लेकिन छोटी बुराई का एक अपना दर्शन है ।अगर कोई बड़ी अच्छाई लाने का जोखिम भरा काम करने जा रहे हैं तभी आपका यह नैतिक अधिकार होता है कि किसी छोटी बुराई का सहारा वक्ती तौर पर ले लें ।जहाँ अच्छाई की नयी धारा प्रचलित करने का कोई संकल्प या साधना नहीं है ही नहीं , वहाँ छोटी बुराई की बात केवल अपनी अवसरवादी राजनीति को जारी रखने का बहाना है ।इसका एक दुष्चक्र बनता है । छोटी बुराई का सहारा लेते-लेते छोटी बुराई खुद एक बड़ी बुराई हो जाती है और आप बड़ी बुराई को छोटी समझने लगते हैं ।

१९६७ में कांग्रेस को बड़ी बुराई मानकर गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति अपनाई गई थी । इस रणनीति के प्रवर्तकों ने सोचा था कि समाजवाद की राजनैतिक ताकत को बढ़ाने के लिए यह एक वक्ती कौशल है । जैसे-जैसे समाजवाद का अपना जनाधार सशक्त और व्यापक होता जाएगा , वैसे-वैसे छोटी बुराई और भी छोटी हो जाएगी । समाजवादियों और प्रगतिशीलों को इस रणनीति से बहुत फायदा हुआ ।उनको शक्ति बढ़ाने का बहुत मौका मिला - १९६७ से १९९७ तक , तीस साल का मौका मिला । लेकिन समाजवादियों और प्रगतिशीलों ने इस मौके का इस्तेमाल किया सत्ता-भोग के लिए , जनाधार बढ़ाने के लिए नहीं ।जन संघ उर्फ भारतीय जनता पार्टी ने इस समय का इस्तेमाल जनाधार बढ़ाने के के लिए किया । फलस्वरूप ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है कि समाजवादियों और प्रगतिशीलों का खेमा एकदम शक्तिहीन हो गया है । (समाप्त)

स्रोत - सामयिक वार्ता , फरवरी , १९९८.

सोमवार, अप्रैल 02, 2007

राजनीति में मूल्य : किशन पटनायक

राजनीति एक व्यवहार है । जैसे-जैसे किसी राजनैतिक व्यक्ति या समूह की क्षमता और प्रभाव बढ़ने लगता है , उसको अपने आदर्श और नीति का कार्यरूप बतलाना पड़ता है । सिद्धान्त और व्यवहार में तालमेल रखना एक कठिन काम प्रतीत होने लगता है । सत्ता से वह जितना दूर रहेगा उतना वह आदर्श और नैतिकता की बात करेगा । प्रभाव बढ़ने पर और सत्ता हासिल करना सम्भव दिखाई देने पर उसकी असली परीक्षा शुरु होती है । आदर्श की चुनौती और स्खलन का आकर्षण - इन दो पाटों के बीच विवेकशील राजनेता सावधान रहता है । सत्ता से दूर रहते समय उसकी जो प्रतिबद्धताएँ और नैतिक संस्कार बन जाते हैं , सत्ताभोग के काल में उसके लिए कवच बनते हैं । इसलिए लम्बे समय तक सत्ता के पदों पर बना रहना अच्छा नहीं है । सफल और प्रभावी राजनेताओं को चाहिए कि वे स्वेच्छा से कुछ अरसे के लिए सत्ता की इच्छा पर संयम रखें । सत्ता की इच्छाविहीन राजनीति में कोई रस नहीं होता है ; मगर सत्ता की इच्छा पर संयम न होने से राजनीति की नैतिक प्रेरणा नष्ट हो जाती है ।

अगर प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने १८ साल के प्रधानमंत्रित्व के बीच कभी पाँच या सात साल का सत्ता पद से सन्यास लिया होता तो शायद वे आज भी एक आलोक-स्तम्भ बने रहते । सत्तापद पर चिपके रहने के कारण उनकी क्या दुर्दशा हुई है यह हाल के चुनावों में स्पष्ट हो रहा है । उनकी दौहित्र-वधु सोनिया के कांग्रेस के मुख्य प्रचारक होने के बावजूद उनके भाषण में कहीं यह बात नहीं आती है कि नेहरू की सरकारी नीतियों से देश को सही मार्गदर्शन मिला था । एक व्यक्तित्व के तौर पर इन्दिरा गांधी या राजीव गांधी की कोई तुलना जवाहरलाल नेहरू से नहीं हो सकती है । लालबहादुर शास्त्री से भी नेहरू बहुत बड़े आदमी थे। लेकिन आज के चुनाव में शास्त्री , इन्दिरा , राजीव , इन सबका नाम ले कर वोट माँगा जा सकता है । नेहरू के नाम से कोई वोट नहीं माँगता है । यह कितना विचित्र है ?

राजनीति में व्यवहार का पलड़ा कभी - कभी इतना भारी होता है कि मूल्यों से समझौता न करनेवालों को जनता भी हिकारत भरी नजर से देखती है । मानो बिलकुल शुद्ध होना अव्यावहारिकता है और इसलिए राजनीतिक अक्षमता का परिचायक है । मूल्यों और नैतिकता के बारे में जनसाधारण उतना कठोर नहीं है जितना कि हमलोग अकसर सोचते हैं । जनसाधारण राजनीति से कुछ परिणाम देखना चाहता है । आदर्शवादी व्यक्तियों और समूहों से परिणामों की उम्मीद नहीं जगती है तो आदर्श के प्रति वह उदासीन हो जाता है । जनसाधारण राजनीति से कैसा परिणाम चाहता है ? क्या जनसाधारण राजनीति में नैतिकता का नियामक बन सकता है ? इसका जवाब आज के राजनैतिक अध्ययनों-चिन्तनों से नहीं मिलता है ।

समझ लेना चाहिए की जनसाधारण की उपस्थिति सार्वजनिक जीवन में एक नियामक का काम नहीं करती है । लोगों की भावना सिर्फ यह होती है कि अनैतिक काम बहुत अधिक नहीं होने चाहिए । अनैतिकता बहुत अधिक दिखाई नहीं देनी चाहिए ।अगर दो प्रतिद्वन्द्वी है और दोनों पराक्रमी हैं और उनमें से एक ज्यादा कलंकित है तो लोग अपेक्षाकृत साफ-सुथरे आदमी को पसन्द करेंगे । इस अर्थ में जनसाधारण की नैतिकता के बारे में एक नियामक भूमिका है । चूँकि जनसाधारण उपस्थित है और राय देने वाला है इसलिए भी राजनेता उसकी नैतिकता सम्बन्धी भावनाओं को अपील करने की कोशिश करते हैं । इसी तरह जनसाधारण एक नियामक है । जनसाधारण की उपस्थिति नहीं रहेगी तो शायद नैतिकता का प्रसंग भी नहीं उठेगा ।इस सीमित दायरे में जनसाधारण सार्वजनिक नैतिकता का नियामक है।

जनसाधारण पहले पराक्रम को देखता है , बाद में नैतिकता को । सामर्थ्य या पराक्रम हासिल करने के नियम और शुद्धता हासिल करने के नियम अलग-अलग होते हैं । शुद्धता के द्वारा कोई पराक्रमी नहीं बन पाता है । गांधीजी पराक्रमी थे , मगर शुद्धता के कारण नहीं ; पराक्रम अर्जन करने के उनके काम अलग थे , और शुद्ध बनने के अलग । नैतिकता और पराक्रम का संयोग उनमें १९१६ से १९४५ तक रहा । १९४५ के बाद उनका पराक्रम कम हो गया ।

पराक्रम प्राप्त करने के महान उपाय भी होते हैं , जोखिम भरे काम होते हैं , लेकिन बहुत छोटे-छोटे रास्ते भी होते हैं । धनी और सम्भ्रान्त लोग राजनीति में जल्द सफल हो जाते हैं।कुछ लोग चोरी करके धनी बनते हैं , धन के सहारे राजनीति करते हैं और सम्भ्रान्त बन जाते हैं । तीसरे कदम पर वे धन और आभिजात्य के बल पर राजनीति की चोटी पर जाने का दाँव लगाते हैं । निर्धनों और शूद्रों के लिए राजनीति में बने रहना बहुत कठिन है।इसलिए भी शूद्र राजनेता नैतिकता के प्रश्न को गौण कर देता है ।

पराक्रमी होने के लिए ये सारे छोटे रास्ते हैं । ये रास्ते प्राचीन काल से हैं । इस पराक्रम से सत्ता प्राप्ति हो सकती है - राष्ट्र या जनता को महान नहीं बनाया जा सकता है ।

राजनीति का स्वर्णयुग यानी पराक्रम और मानवीय मूल्यों का संयोग तब होता है जब किसी राज्य या भूभाग में धर्म , संस्कृति , ज्ञान , अर्थनीति या राजनीति के क्षेत्र में मूल्यों का आन्दोलन होता है । मूल्यों का यह आन्दोलन राजनीति के बाहरी क्षेत्रों में होने पर भी राजनीति इसके द्वारा प्रभावित होती है , नए मूल्यों को राजनीति में स्थापित करने की एक धारा राजनीति के अन्दर भी सबल होने लगती है । भारत के बौद्ध युग और गांधी युग की राजनीति में मानवीय मूल्यों का स्तर अन्य युगों की तुलना में उच्चतर था । जिसको भारत में गांधी युग कहा जाएगा वह विश्व के लिए समाजवादी आन्दोलन के विकास का भी युग था। इस संयोग का प्रभाव इतना अधिक था कि पूँजीवादी और प्रतिगामी विचारों के राजनैतिक दलों को भी कुछ मानवीय तथा प्रगतिशील मूल्यों के अनुकूल अपनी घोषणाएँ करनी पड़ती थीं। नेहरू-इन्दिरा की कांग्रेस अपने को समाजवादी कहती थी , यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी ( जनसंघ ) ने एक बार अपने को ' गांधीवादी समाजवादी ' घोषित कर दिया था । 'आखिरी आदमी ' - जो गांधीजी का शब्द था , अभी हाल तक राजनैतिक घोषणापत्रों पर मँडराता था । ( अगली प्रविष्टी में जारी ) ( स्रोत - सामयिक वार्ता , फरवरी १९९८ )

मंगलवार, फ़रवरी 13, 2007

आयात - निर्यात और मीडिया : किशन पटनायक

' हम निर्यात करेंगे तो हमारा विकास होगा ।' मीडिया के लिए यह एक मंत्र है । विश्व बैंक से यह मंत्र आया है । हमारे विद्वानों में यह साहस नहीं है कि इस गलत धारणा को देश के दिमाग से हटाने की कोशिश करें । भारतीय अर्थनीति में निर्यात की भूमिका के बारे में एक सही दृष्टि होनी चाहिए ।

कुछ ही देश होंगे जिनका प्रारंभिक विकास निर्यात पर निर्भर है । साधारण नियम यह है कि जिस देश में अगर कृषि और उद्योग का विकास हो रहा है तो विकास का तकाज़ा है कि आयात निर्यात में भी वृद्धि की जाए ।यूरोप अमरीका में भी यह हुआ । उद्योग का तीव्र विकास होने लगा तो निर्यात भी बढ़ा ।

विश्व बैंक जानबूझकर विकासशील देशों को गलत सलाह देता है । निर्यात को कृत्रिम ढंग से बढ़ाने के लिए विकासशील देश अपनी वस्तुओं का दाम कम कर देते हैं । इससे पश्चिम के धनी देशों को बहुत फायदा है ।एक हिसाब के मुताबिक १९८० के बाद गरीब देशों से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं का दाम ४५ प्रतिशत घटा है । यानी पश्चिम के उपभोक्ताओं को हमारी चीजें आधे दाम पर मिल जाती हैं । इसी कारण पश्चिम के नागरिक मौजूदा अर्थव्यवस्था से खुश हैं ।

विकासशील देशों को यह देखना होगा कि उनका आयात निर्यात से अधिक न हो । आयात अगर निर्यात से ज्यादा होगा तो व्यापारिक घाटा होगा । पिछले दस साल के आयात-निर्यात को देखेंगे तो हम पाते हैं कि भारत हमेशा घाटे में व्यापार कर रहा है ।

विकासशील देशों के आयात को बढ़ाने के लिए विश्वव्यापार संगठन का अपना नियम है । आयात शुल्कों को घटाने के लिए मुद्राकोष और विश्वव्यापार संगठन दोनों दबाव डालते हैं । जैसे-जैसे उपभोक्तावादी संस्कृति फैलती है और आयात शुल्क शून्य की ओर बढ़ता है आयात तीव्र गति से बढ़ता है ।उसके साथ निर्यात का कोई मेल नहीं रह जाता है ।निर्यात बढ़ाने की आतुरता में हमारी सरकार निर्यातकारी व्यवसाइयों की गलतियों को अनदेखी कर देती है । इसका फायदा उठाकर आयात-निर्यात के दौरान ये व्यवसायी देश का धन विदेशों में ले जाकर वहाँ के बैंकों में रखते हैं। यानी विदेशों में भारत का काला धन संचित होता है ।राष्ट्रपति के.आर. नारायण जब उपराष्ट्रपति थे , तब उन्होंने एक बार कहा था कि केवल यूरोप के बैंकों में भारत का एक लाख करोड़ रुपया अवैध रूप से रखा हुआ है ।

रुपया हमारी आर्थिक स्थिरता का प्रतीक है । लेकिन रुपया हर साल गिरते जा रहा है। कभी स्थिर नहीं रहा ,न ऊपर चढ़ा। कभी मुद्राकोष के आदेश से वह गिरता है तो कभी बाजार के दबाव में गिरता है । इस पर जब चिंता व्यक्त होती है तो मीडिया प्रचार करती है कि इससे निर्यात को फायदा है । निर्यात सर्वोपरि है ।उसके ऊपर विकास निर्भर है । अगर रुपया गिरने से निर्यात बढ़ेगा तो गिरने दो । इस प्रकार की मानसिकता सचमुच राष्ट्र के लिए लज्जा की बात है ।

मीडिया अक्सर इस बात को छुपाती है कि निर्यात के लिए सरकार को कितना घाटा सहना पड़ता है ?सरकार को कितनी सबसिडी निर्यात को देनी पड़ती है ।सबसिडी को बदनाम किया जाता है,निर्यात का उल्लेख तक नहीं होता है ।

मीडिया का इसमें अपना स्वार्थ है । मीडिया के बहुत सारे मालिक हैं जिनका अपना आयात-निर्यात का धंधा रहता है । निर्यात को प्रोत्साहन मिलने पर या आयात को नि:शुल्क कर देने पर उनको बहुत ज्यादा फायदा होता है ।संपन्न लोगों का वर्ग स्वार्थ इसमें है कि निर्यात बढ़ रहा है कह कर आयात बढ़ाने की छूट मिल जाती है और संपन्न वर्ग की चाह के मुताबिक विदेशों से उपभोक्तावादी वस्तुएं देश में आ जाती हैं । मीडिया का जुड़ाव इसी वर्ग के साथ है । हम सूचना के लिए मीडिया का सहारा लेते हैं । लेकिन मीडिया निष्पक्ष सूचना कम देती है । अर्थनीति और संस्कृति के बारे में गलत धारणाओं को फैलाना इसका मुख्य काम होता जा रहा है ।

निर्यात के बारे में हम कह सकते हैं कि एक अच्छी आधुनिक अर्थव्यवस्था का निर्यात एक अनिवार्य अंग है । लेकिन निर्यात का मूल्यांकन आयात के साथ जोड़कर होना चाहिए । आयात-निर्यात में देश की कृषि और उद्योग का विकास प्रतिफलित होना चाहिए । केवल निर्यात में वृद्धि आर्थिक सुधार का सूचक नहीं है ।

सोमवार, फ़रवरी 12, 2007

चीन और विदेशी पूंजी : किशन पटनायक

हम कह चुके हैं कि चीन में भारत की तुलना में बहुत ज्यादा विदेशी पूंजी का प्रवेश हो रहा है । चीन के एक निर्धारित इलाके में सघन रूप से पूंजीवादी विकास किया जा रहा है । वहाँ आधुनिक उद्योगों का विकास तीव्रता से हो रहा है । उसको देख कर चीन के औद्योगिक भविष्य के बारे में बहुत बड़ी उम्मीदें लगायी जा रही हैं ।

चीन के भविष्य के बारे में सन्देह भी पैदा होता है ।संदेह की चर्चा करने के पहले यह समझना होगा कि चीन में पूंजीवादी विकास की सफलता के कारण क्या हैं ?

  1. चीन जैसे विशाल देश का यह औद्योगिक इलाका एक छोटा अंश है । भारत के अनुभव से हम जानते हैं कि एक बड़े देश के छोटे इलाके को आधुनिक उद्योग के द्वारा संपन्न किया जा सकता है। एक बड़े इलाके को पिछड़ा रखकर छोटे हिस्से को समृद्ध करने के सिद्धान्त को 'आंतरिक उपनिवेश' का सिद्धान्त कहा जाता है । पिछड़ा अंश उपनिवेश जैसा ही होता है । इस बड़े इलाके में बेरोजगारी बढ़ती है और उद्योगहीनता भी फैलती है ।
  2. विदेशी पूंजी पर चीन सरकार का नियंत्रण अभी भी है । पूंजी निवेश किस क्षेत्र में होगा , किन वस्तुओं के लिए होगा इनका निर्धारण चीन की साम्यवादी सरकार के नियंत्रण से होता है। यानि चीन के अनुशासन के तहत विदेशी पूंजी काम करती है।चीन विश्वव्यापार संगठन का सदस्य नहीं हुआ है ।इसलिए भारत में जिस प्रकार की खुली छूट विदेशी पूंजी को है , वैसी चीन में नहीं है।

फिर भी कुछ नकारात्मक परिणाम दिखायी देने लगे हैं और चीन के नेतृत्व को चिंतित होना पड़ रहा है । चीन के देहातों में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है । नयी शिक्षित युवा पीढ़ी में उपभोक्तावादी प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं । चीन में राष्ट्रवादी भावना अटूट है । विदेशी पूंजी से खतरा दिखाई देगा तो राष्ट्रवादी भावना विदेशी पूंजी के खिलाफ भी हो सकती है । इसलिए पूंजीवादी शक्तियाँ चीन को बहुत सारी रियायतें दे रही हैं । जब वे देखेंगी कि चीन में पूंजीवाद जड़ जमा चुका है और चीन का मध्यम वर्ग उपभोक्तावाद को छोड़ नहीं पाएगा तब वे चीन की प्रगति को रोकेंगे ; चीन में उनका साम्राज्यवादी शोषण तेज हो जाएगा । यह संभावना इसलिए दिखती है कि पूर्व एशिया के कई देशों के साथ हाल में ऐसा हुआ है ।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद न सिर्फ सोवियत रूस मजबूत हुआ , बल्कि चीन में भी साम्यवाद की स्थापना हो गयी और समूचे पूर्व एशिया में साम्यवाद के फैलने के डर से पश्चिम के पूंजीवादी देश त्रस्त हो गये । इसलिए जहाँ भी पूंजीवाद बच पाया , वहाँ पूंजीवाद को लोकप्रिय बनाने के लिए वहाँ के पूंजीवाद को नाना प्रकार की रियायतें वे देने लगे । उन देशों के जनसाधारण के सामान्य जीवन को बेहतर बनाने के लिए सलाह और आर्थिक सहयोग देने लगे । युद्ध में जापान की शत्रुता को भूलकर अमेरिका ने उसको सहयोग दिया ।इसी कारण जापान अभूतपूर्व ढंग से विकसित हुआ । दक्षिण कोरिया , हांगकांग , सिंगापुर , ताइवान , मलेशिया ,थाइलैंड आदि का किस्सा भी इसी तरह का था । १९९० में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप से साम्यवाद का पराभव हो गया । चीन में भी पूंजीवादी नीतियाँ प्रचलित होने लगीं । तब जाकर साम्यवाद का भय पश्चिम के दिमाग से हटा ।उसके बाद पूर्वी एशिया के देशों को जो सहयोग मिलता था उसका अंत हुआ ।पश्चिम के कुछ पूंजीवादी केन्द्रों से साजिश की गयी थी कि एशिया के देशों के आर्थिक विकास को रोका जाए और उनकी अर्थव्यवस्था में यूरोप अमेरिका की बड़ी कंपनियों का आधिपत्य हो। इसी साजिश के तहत इन देशों में वित्तीय संकट पैदा किया गया। संकट से उबरने के लिए इन देशों को मुद्राकोष की शरण में जाना पड़ा । तब मुद्राकोष उन पर अपनी शर्तें लगा रहा है । इन शर्तों का पालन होने पर जापान छोड़कर बाकी एशियाई देशों में यूरोप अमेरिका की कंपनियों का वर्चस्व बढ़ जाएगा ।

क्या चीन के साथ भी वैसी साजिश होगी ? इसका उत्तर आसान नहीं है ।चीन के लिए सन्तोष का भी कोई कारण नहीं है ।(जारी)

रविवार, फ़रवरी 11, 2007

बैंक बीमा और पेटेंट : किशन पटनायक

राष्ट्र की सारी बचत राशि बैंकों और बीमा के पास जाती है । वहाँ हमारी राष्ट्रीय पूंजी संचित है । उस पर भी विदेशी कंपनियों को वर्चस्व चाहिए । इसलिए भाजपा सरकार कांग्रेस का समर्थन पाकर इससे संबंधित कानूनों को बदल रही है । पेटेंट कानून भी बदल रहा है । दुनिया से सीखकर नयी तकनीकों को अपनाने का रास्ता इससे बन्द हो जायेगा । प्रत्येक उन्नत देश ने अतीत में दूसरे देशों और दूसरी सभ्यताओं से ज्ञान-विज्ञान का सहारा लिया है । आधुनिक टेक्नोलाजी के बारे में अमरीका ने यूरोप से सीखा , जापान ने अमरीका से सीखा । अब विकासशील देशों की बारी आई तब नियम बन गया है कि यह चोरी है।तकनीकी का अनुसरण करना भी अपराध है । सीखना और प्रयोग करना भी अपराध है।विदेशी उद्योगों को हम राष्ट्रीय सम्मान देने के लिए बाध्य होंगे , लेकिन उन उद्योगों से तकनीक की शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते हैं । उनकी कंपनियों के लिए हम दरवाजा खोल देंगे लेकिन हमारे प्रशिक्षित मजदूरों के लिए उनका दरवाजा बंद रहेगा । अगर कंपनी यहाँ आती है तो मजदूर वहाँ भी जा सकते हैं - यह राय सारे विकासशील देशों की है ।लेकिन यह मानी नहीं जाती है क्योंकि विश्वव्यापार संगठन के नियम मतदान के द्वारा नहीं बने हैं ।बातचीत के द्वारा , धौंस जमाकर निर्णय कराए जाते हैं । विश्वबैंक , अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्वव्यापार संगठन ये तीनों धनी पूँजीवादी देशों के हथकंडे हैं । हम उसमें सदस्य होने पर भी विदेशी हैं। जैसे कि हम अंग्रेजी साम्राज्य में थे लेकिन अंग्रेज हमारे लिए विदेशी थे ।

विदेशी पूंजी भारत और चीन

कोई पूछ सकता है - ये सब तो नकारात्मक बातें हैं , कुछ सकारात्मक पहलू भी तो होगा ? हमारे देश में पूंजी की कमी है । अब बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी आ रही है । अगर हम पूंजी प्राप्त कर रहे हैं तो क्या उससे हमारा भविष्य बेहतर नहीं होगा ?

अगर अर्थनीति की बातों को विद्वान लोग लोक भाषा में सहज ढंग से समझा कर लिखते तो इस तरह के भ्रम नहीं होते । तब तो साधारण आदमी अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल कर सकता है ।इस वक्त चाहिए कि जो लोग अर्थशास्त्री हैं और देशभक्त भी हैं वे भारतीय भाषा में औसत शिक्षित लोगों को समझायें की देश की अर्थनीति का क्या हो रहा है । इससे विदेशी पूंजी के बारे में पढ़े लिखे लोगों की मोहग्रस्तता टूटती ।(इस विषय पर सरल भाषा में इन लेखों को पढ़ा जा सकता है ।-अफ़लातून)

तर्क के लिए मान लें कि विदेशी पूंजी बड़ी मात्रा में आ रही है । तो पूछना चाहिए क्या फायदा हुआ है ? १९९१ से हम कह रहे हैं कि आ रही है , विदेशी पूंजी उत्साहित होकर आ रही है । तब से लोगों का ध्यान कृषि से हटकर उद्योग के ऊपर बंध गया है - उद्योग की बहुत ज्यादा तरक्की होगी । हमारा औद्योगिक क्षेत्र गतिशील हो जाएगा ; बहुत रोजगार भी देगा ।

नयी आर्थिक नीति के समर्थक लोगों को यह समझ में आना चाहिए कि जितनी मात्रा में विदेशी पूंजी भारत में आ रही है और जिस काम के लिए आ रही है , उससे भारत के औद्योगीकरण में कोई तेजी नहीं आएगी । जो भी विदेशी पूंजी आ रही है उसका निवेश मोटरगाड़ी ,बिस्कुट,टेलिविजन,वाशिंग मशीन, कोका कोला ,कंप्यूटर,सौन्दर्य प्रसाधन आदि उपभोक्तावादी उद्योगों में हो रहा है ।इन वस्तुओं का खरीददार देश का संपन्न वर्ग है । संख्या में यह बहुत छोटा है। आश्चर्य की बात यह है कि उन वस्तुओं के खरीददारों की संख्या बढ़ाने के लिए पांचवें वेतन आयोग के बहाने देश के सभी सरकारी अफसरो-कर्मचारियों का वेतन भत्ता बढ़ाया गया है । वेतन लेनेवाले और उनके ट्रेड यूनियन भी शायद नहीं जानते हैं कि उनके वेतनों में वृद्धि का मुख्य कारण यह है । वे यह जानेंगे तो उन्हें कुछ शर्म भी लगेगी ।

इसके बावजूद उद्योग में प्रगति नहीं होगी उलटा आर्थिक प्रगति के बगैर वेतनवृद्धि होने से विषमतायें बढ़ेंगी और अर्थव्यवस्था में नये असंतुलन पैदा होंगे । उद्योगों में गतिशीलता तब आयेगी जब आबादी का बड़ा हिस्सा उद्योग द्वारा निर्मित वस्तुओं का खरीददार होगा । इसका मतलब है कि कृषि की उन्नति से जब छोटे किसानों और मजदूरों की क्रय शक्ति बढ़ेगी तब उनकी आवश्यकता पूरी करने वाले उद्योगों को बल मिलेगा । आधुनिक उपभोक्तावादी बाजार पैदा करके भारत के उद्योगों में लम्बे समय तक तेजी नहीं आएगी ।रोजगार बढ़ने से क्रय शक्ति बढ़ती है ।भारत में जितना देशी या विदेशी पूंजी निवेश १९९१ के बाद हो रहा है उससे रोजगार बढ़ने के बजाये घट रहा है । अत्याधुनिक टेक्नोलाजी के कारण ऐसा हो रहा है । बेरोजगारी अधिक व्यापक होगी तो उद्योग किस आधार पर बढ़ेगा ? भारत के कई प्रसिद्ध औद्योगिक घरानों की ओर से (उदाहरण के लिए टाटा कंपनी) यह ऐलान हो रहा है कि अगले कुछ सालों में उनके मजदूरों की संख्या कम हो जाएगी ।इनसे पूछा जाना चाहिए कि मजदूरों की संख्या अगर घटती जाएगी तो किन किन समूहों की क्रय शक्ति के बल पर भारत का औद्योगीकरण होगा ?

विदेशी पूंजी के बारे में और एक तथ्य जानना जरूरी है । सारे विश्व में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश के जो परिणाम हैं उसका नब्बे प्रतिशत दुनिया के विकसित औद्योगिक इलाकों में चला जाता है। यानि उत्तर अमरीका ,यूरोप , जापान में । चीन का जो नया औद्योगीक इलाका चाएन के तटीय प्रांत में विकसित हो रहा है वह भी इसमें शामिल है । बाकी दस प्रतिशत में से अपना हिस्सा मांगने के लिए सारे विकासशील देश होड़ लगाये हुए हैं । इससे यह समझ में आना चाहिए कि हमको एक नगण्य हिस्सा ही मिल सकता है । हमारी अपनी पूंजी से विदेशी पूंजी का अनुपात बहुत छोटा होगा । लेकिन विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए हम अपनी औद्योगिक नीतियों को विदेशियों के हित में बदल रहे हैं । नतीजा यह हो रहा है कि हमारी अपनी पूंजी का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है ।वह सड़ रही है । क्योंकि विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए हम दिन-रात सार्वजनिक क्षेत्र की निन्दा कर रहे हैं । उसकी इतनी बदनामी हो चुकी है कि लोगों के मन से भी उस पर भरोसा उठ रहा है ।उसको बेचने पर भी उचित दाम नहीं मिलेगा ।होना यह चाहिए था कि सार्वजनिक उद्योगों की त्रुटियों को समझकर उनकी कार्यकुशलता बढ़ाई जाती । स्वदेशी उद्योग का नारा देने वालों को यही करना चाहिए था ।

शनिवार, फ़रवरी 10, 2007

आर्थिक संप्रभुता क्या है ? : किशन पटनायक

इतिहास की उथल - पुथल से , युद्ध - संधि , विकास और विद्रोह से राष्ट्रों का निर्माण तथा नवनिर्माण होता है । एक बहुत बड़े उथल - पुथल से भारतीय राष्ट्र का नवगठन १५ अगस्त १९४७ को हुआ । बीसवीं सदी के इस काल खण्ड में आज के अधिकांश विकासशील देशों का नये सिरे से अभ्युदय धरती पर हुआ । ये सारे राष्ट्र आज़ाद हैं । आज़ाद राष्ट्र की संप्रभुता होती है । यानी प्रत्येक राष्ट्र अपनी बुद्धि विवेक से अपनी जनता की सुरक्षा और कल्याण संबंधी नीतियों का निर्णय करता है ।देश के बाहर की कोई शक्ति हम पर यह लाद नहीं सकती है कि हमारी नीतियाँ और कानून क्या होंगे । इसीको राष्ट्र की संप्रभुता कहा जाता है ।

विश्व व्यापार संगठन एक विदेशी शक्ति है । कोई पूछ सकता है कि आपका देश उसका सदस्य है तो वह विदेशी कैसे है ?यह सही है कि हमारी सरकार ने गलत बुद्धि से परिस्थितियों के दबाव में आकर भारत को इसका सदस्य बना दिया है । राष्ट्रों के बीच अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से यह संगठन बना है । लेकिन इसका अधिकार क्षेत्र बहुत ज्यादा है ।संयुक्त राष्ट्र संघ का अधिकार इतना नहीं है जितना इस संगठन का है । यह संगठन हमें निर्देशित करता है कि अमुक कानून बनाओ । उसका निर्देश एक कानून है और हमे वह दंडित कर सकता है । एक व्यापार-सहयोग संस्था को धनी शक्तिशाली देशों ने एक विश्व सरकार का दर्जा दे दिया है । उनकी आपसी सहमति जिस बात पर हो जाती है वह संगठन का कानून बन जाता है ।उसके निर्णयों को विकासशील देश बिलकुल प्रभावित नहीं कर सकते हैं । निम्नलिखित कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि कैसे हमारे ऊपर निर्णय लाद दिये जाते हैं ।

स्वाधीनता के प्रथम दिवस से हमारा लक्ष्य रहा है कि भारत खाद्य के मामले में आत्म-निर्भर बनेगा। शुरु के दिनों मे हमारा खाद्य उत्पादन बहुत कम था और खाद्यान के आयात के लिए अमेरिका के ऊपर निर्भर रहना पड़ता था । हमको अपमान झेलना पड़ता था । बाद में स्थिति बहुत सुधरी और खाद्यान के आयात की जरूरत नहीं रह गयी । यह विश्वव्यापार संगठन अब कहता है कि हम खाद्यान्न आयात करने के लिए बाध्य हैं ।बुनियादी जरूरत की चीजों के लिए किसी भी देश को अन्य देशों पर निर्भर नहीं होना चाहिए । जिसके पास कृषि भूमि है उस देश को अपनी आबादी के प्रति-दिन के आवश्यक भोजन के लिए अन्य देशों पर निर्भर नहीं होना चाहिए । गरीब देश खाद्यान के लिए बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहें ताकि उनको दबाया जा सके , अंतर्राष्ट्रीय मामलों में झुकाया जा सके । कोई भी कारण बता कर वे अपना सहयोग बन्द कर सकते हैं । उसका ताजा उदाहरण सामने है। परमाणु विस्फोट का बहाना बना कर अमरीका तथा अन्य देशों ने भारत में पूंजी निवेश पर रोक लगा दी थी । स्वीडेन से बच्चों की शिक्षा के लिए जो पैसा आ रहा था उसको भी स्वीडेन की सरकार ने बंद कर दिया तो राजस्थान में बहुत सारे प्राथमिक स्कूल बन्द होने के कगार पर आ गए थे।

यह एक भयंकर गलती होगी कि हम प्रतिवर्ष खाद्यान्न का आयात करेंगे। इससे हमारी कृषि दिशाहीन और उद्देश्यहीन हो जाएगी । कृषि हमारा सबसे बड़ा उत्पादन का क्षेत्र है ।आबादी का दो-तिहाई हिस्सा इस क्षेत्र में रोजगार ढ़ूँढ़ता है । अंग्रेजों ने देढ़ सौ साल के राजत्व में हमारे देहातों को तहस नहस किया था । कृषि और गाँव को उस दशा से उबारने के लिए कृषि को सबसे अधिक महत्व देना होगा । किसानों को विशेष सहायता देनी होगी ,जिसको अनुदान या सब्सिडी कहा जाता है । भारी सब्सिडी के बल पर ही यूरोप और अमेरिका के देशों में कृषि समृद्ध हुई है । पूंजीवादी देशों में किसानों को सब्सिडी की जरूरत होती है। विश्वव्यापार संगठन हमें निर्देश देता है कि कृषि को अनुदान हम नहीं दे सकते हैं। छोटी पूंजी पर चलने वाले छोटे उद्योगों को भी हम संरक्षण नहीं दे सकते हैं । आधुनिक विशाल पैमानेके उद्योगों के लिए हमें विदेशी सहायता चाहिए क्योंकि इतना अधिक पूंजी निवेश हम नहीं कर सकते हैं । कम पूंजी वाला छोटा उद्योग ही हमारा स्वतंत्र राष्ट्रीय उद्योग हो सकता है । इसमें बहुत सारी देशी तकनीक का प्रयोग हो सकता है । इसको संरक्षण देना हमारा कर्त्तव्य है ।लेकिन विश्वव्यापार संगठन के आदेश के मुताबिक हम इनको संरक्षण नहीं दे सकते हैं ।जो भी संरक्षण पहले मिला था उसको एक-एक करके हटा रहे हैं । हमारे देश में हम अपनी कृषि और लघु उद्योग को संरक्षण देने से वंचित हैं , तो हम आजादी की लड़ाई क्यों लड़े थे ?

उल्टा हमे निर्देश होता है कि विदेशी कंपनियों को हम उतनी ही सुविधा दें , जितना अपने उद्योगों को देते हैं । इसके बारे में विश्वव्यापार संगठन की एक धारा है जिसका नाम है " राष्ट्रीय व्यवहार " । हम को तो करना यह चाहिए कि सबसे पहले हम अपने उद्योगों को संरक्षण दें । उसके बाद प्रतियोगिता के क्षेत्र में हम विकासशील देशों के उद्योगों को ज्यादा सुविधा दें और धनी देशों को कम । पाकिस्तानी उद्योगों को ज्यादा दें और अमरीकी को कम । लेकिन यह सब हम नहीं कर सकते हैं ।अमरीका और यूरोप औपनिवेशिक शोषण के बल पर अपना महान उद्योग खड़ा कर चुके हैं । विकासशील देशों का उद्योग लड़खड़ा रहा है । दोनों के प्रति समान व्यवहार नहीं हो सकता है । हमें यह कहने में लज्जा नहीं होनी चाहिए कि हम प्रतियोगिता में जर्मनी या ब्रिटेन के समकक्ष नहीं हैं । मुक्त व्यापार का जो अर्थ वे लगाते हैं वह हमें मान्य नहीं है ।अपने देश में अपनी कृषि , अपने उद्योग को हम संरक्षण अवश्य देंगे । ( जारी )

शुक्रवार, फ़रवरी 09, 2007

जगतीकरण क्या है ? : किशन पटनायक

सब दल लेकर हैं खड़े , अपने - अपने जाल

हे साधो ! कुछ चेतिए , देश बड़ा बेहाल .(१)

हल्दी ,तुलसी , नीम के , बाद जूट पेटेण्ट

ये भारत की सम्पदा , वो ग्लोबल मर्चेण्ट.(२)

भारत बस बाजार है , विस्तृत और समग्र

सिर्फ मुनाफे के लिए,मल्टीनेशनल व्यग्र.(३)

सम्प्रभुता,गौरव कहाँ,कहाँ आत्मसम्मान

अजी छोड़िए, आइए, करना है उत्थान.(४)

- शिव कुमार 'पराग' के दोहे(साभार-'देश बड़ा बेहाल')

भूमंडलीकरण , वैश्वीकरण ,खगोलीकरण , जगतीकरण आदि कई शब्दों का प्रयोग हो रहा है - अंग्रेजी शब्द , ग्लोबलाइजेशन के लिए । आधुनिक विश्व में तीन प्रकार के जगतीकरण हुए हैं । अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में प्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के द्वारा जगतीकरण का एक ढाँचा यूरोपीय देशों ने बनाया । जब यूरोप का बौद्धिक उत्थान हुआ और समुद्र पर उनकी श्रेष्ठता प्रमाणित हो गयी तो यूरोप के लोगों ने पूरी दुनिया से धन संपत्ति बटोरने के लिए समुद्री यात्राएं कीं । अनेक भूखंडों के मूलवासियों को हटाकर वहाँ पर वे खुद बस गये । दूसरे देशों पर उन्होंने अपना प्रत्यक्ष शासन यानि साम्राज्य स्थापित किया । आधुनिक यंत्र विद्या पहली बार साम्राज्य की केन्द्रीय व्यवस्था बनाए रखने में मददगार हुई । उसके पहले के युगों में जो साम्राज्य होते थे उनकी केन्द्रीय व्यवस्था नहीं हो सकती थी और शीघ्र ही वे बिखर जाते थे । सिकंदर और सीजर से लेकर सम्राट अशोक का यह किस्सा है कि थोड़े से समय के लिए धन बटोरा जाता था । लेकिन यंत्र विद्या केवल यूरोपीय साम्राज्यवाद के केन्द्रीकृत ढाँचे के तौर पर टिकी रही और शताब्दियों तक शोषण का अनवरत सिलसिला चलता रहा । कहावत बन गयी कि " ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य कभी डूबता नहीं है । " दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस प्रकार के जगतीकरण का अध्याय समाप्त हुआ ।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दो नये प्रकार के जगतीकरण शुरु हुए । उसकी एक धारा संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा चलायी गयी । संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा में राष्ट्रों की बराबरी मानी गई थी । इसलिए बहुत सारी बातचीत और लेन-देन राष्ट्रों के बीच बराबरी के आधार पर होती थी। सारे विश्व से साधन इकट्ठा कर दुनिया से भूख , बीमारी , अशिक्षा , नस्लवाद , हथियारवाद आदि मिटाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल और कार्रवाइयाँ हुईं । उस समय की अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक सहयोग की संस्थाओं की कार्य प्रणाली भी अपेक्षाकृत ज्यादा जनतांत्रिक थी । अंकटाड और डंकल प्रस्ताव के पहले की गैट संधि इसका उदाहरण है । संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से जिस प्रकार का यह जगतीकरण चला , उससे अमरीका बिलकुल खुश नहीं था।अमरीका ने जब देखा कि उसके साम्राज्यवादी उद्देश्यों में राष्ट्र संघ बाधक बन सकता है , उसने राष्ट्र संघ को चंदा देना बंद कर दिया और राष्ट्र संघ से बाहर ही अंतर्राष्ट्रीय कूटनैतिक कार्यकलापों को बढ़ावा देने लगा । सोवियत रूस के पतन के बाद अमरीका को मौका मिल गया कि राष्ट्र संघ को बिलकुल निष्क्रीय बना दिया जाय । ईराक और युगोस्लाविया पर हमला राष्ट्र संघ की उपेक्षा का ताजा उदाहरण है । राष्ट्र संघ के माध्यम से चलने वाला जगतीकरण इस वक्त पूरी तरह अप्रभावी हो गया है ।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमरीका की अपनी बुद्धि से अन्य एक प्रकार का जगतीकरण भी शुरु किया गया था । उसको उन दिनों वामपंथियों ने आर्थिक साम्राज्यवाद कहा , क्योंकि इस बीच अमरीका ने साम्राज्यवाद की अपनी शैली विकसित की थी । उसमें किसी औपनिवेशिक देश पर प्रत्यक्ष शासन करने की जरूरत नहीं होती है । कमजोर और गरीब मुल्कों पर दबाव डालकर उनकी आर्थिक नीतियों को अपने अनुकूल बना लेना उसकी मुख्य कार्रवाई होती है । उन आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप आत्मनिर्भरता खतम हो जाती है और औपनिवेशिक देश धनी देशों पर पहले से अधिक निर्भर हो जाते हैं । जब कोई बड़ा संकट होता है और धनी देशों की मदद की जरूरत होती है तब धनी देशों के द्वारा नयी शर्तें लगायी जाती हैं जिससे औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को थोड़े समय की राहत मिलती है;लेकिन वह अर्थव्यवस्था अधिक आश्रित हो जाती है,और धनी देशों के द्वारा शोषण के नये रास्ते बन जाते हैं।औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था वाला देश आर्थिक रूप से इतना कमजोर और आश्रित होता है कि उसकी राजनीति को भी आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है ।उपर्युक्त उद्देश्य से १९४५ में ही विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष नामक अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं की स्थापना हुई । १९९५ में विश्व व्यापार संगठन बना । ये तीन संस्थायें हैं जो नये जगतीकरण के तीन महत्वपूर्ण स्तंभ हैं । विश्वबैंक विकास के लिए ऋण देकर सहायता करता है और कैसा विकास होना चाहिए उसकी सलाह देता है । कई बार कर्ज लेने वाला देश विश्वबैंक की विकासनीति को अपनी विकास नीति के तौर पर मान लेने के लिए बाध्य होता है । इसलिए सारे गरीब देशों में एक ही प्रकार की विकास नीति प्रचलित हो रही है । यह विश्वबैंक के द्वारा बतायी गयी विकास नीति है ।

अक्सर हम विदेशी मदद की बात सुनते हैं । विश्वबैंक ,मुद्राकोष या धनी देशों की सरकारों से कम ब्याज पर जो ऋण मिलता है , उसी को विदेशी मदद कहा जाता है । विदेशी मदद के साथ-साथ विश्वबैंक की सलाह भी मिलती है कि हम अपने विकास के लिए क्या करें ।उनकी सलाह पर चलने का एक नतीजा होता है कि विदेशी मुद्रा की आवश्यकता बढ़ जाती है और उसकी कमी दिखाई देती है । जब विदेशी मुद्रा का संकट आ जाता है तब हमारा उद्धार करनेवाला अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष होता है । उसके पास जाना पड़ता है ।वह मदद देते समय शर्त लगाता है। उसकी शर्तें मुख्यत: दो प्रकार की होती हैं ;

(१) आर्थिक विकास के कार्यों मे सरकार की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होनी चाहिए। किसी उद्योग , व्यापार या कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी अनुदान ,सबसिडी नहीं दी जाएगी ।

(२) देश की आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए विदेशी पूंजी और विदेशी कंपनियों को अधिक से अधिक छूट देनी होगी ।उन पर और उनकी वस्तुओं पर लगने वाली टिकस कम कर दी जाएगी । यानी विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में धनी देशों के पूंजीपतियों का प्रवेश अबाध रूप से होगा ।इसके अलावा मुद्राकोष मदद माँगने वाले देश की मुद्रा का अवमूल्यन कराता है। ताकि हमारा सामान उनके देश में सस्ता हो जाए और उनकी वस्तुओं का दाम हमारे लिए महँगा हो जाए ।

सारे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के साथ इस प्रकार जुड़ जाती है । इस प्रकार का जुड़ाव प्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के युग में भी था । फर्क यह है कि उस जमाने में हमारी अर्थनीति और विकासनीति का राजनैतिक निर्णय साम्राज्यवादी सरकार करती थी । आज हम खुद अपनी अर्थनीति को धनी देशों की अर्थनीति के साथ जोड़ने का निर्णय कर रहे हैं ।वे लोग सलाह देते हैं , हमारी सरकार उसी सलाह को निर्णय का रूप देती है। इसलिए इसको जगतीकरण कहा जा रहा है ।

१९४५ से १९९५ तक विकासशील देशों की अर्थनीति को धनी देशों की अर्थनीति का पिछलग्गु बनाने के लिए जितने नियम और तरीके बनाये गए थे , उन सारे नियमों को विश्वव्यापार संगठन कानून का रूप देकर अपना रहा है । विश्वबैंक सलाह देता है ;मुद्राकोष शर्त लगाता है और विश्वव्यापार संगठन कानून चलाता है । यहाँ दन्ड का प्रावधान भी है । यह व्यापार के मामले में विश्व सरकार है । लेकिन इस सरकार के निर्णयों को विकासशील देश अपने हित की दृष्टि से प्रभावित नहीं कर पाते हैं । व्यापार की विश्व सरकार में वे केवल दोयम दर्जे के सदस्य हैं ।

विश्वबैंक , मुद्राकोष और विश्वव्यापार संगठन तीनों अपने - अपने ढंग से काम कर रहे हैं। लेकिन ये एक दूसरे के पूरक हैं ।तीनों में इतना मेल है कि तीनों मिलकर विकासशील देशों एक ही रास्ता दिखाते हैं - एक ही दिशा में ढ़केलते रहते हैं । इसलिए सारे विकासशील देशों की समस्याएं एक ही प्रकार की होती जा रही हैं । इससे जो प्रतिक्रिया होगी , जो असन्तोष होगा,उसको हम एक दिशा में ले जा सकेंगे , तब संभवत: एक नयी यानी चौथे प्रकार का जगतीकरण शुरु होगा । क्योंकि तीसरी दुनिया के सारे देशों की समस्याएं सुलझाने के बजाए जटिल होती जा रही हैं , मौजूदा जगतीकरण की व्यवस्था के खिलाफ़ सारे देशों में गुस्सा और विद्रोह होना चाहिए । धनी देशों पर अपनी निर्भरता खतम कर गरीब देश अगर एकल ढंगसे या परस्पर के सहयोग से आत्मनिर्भर होने का लक्ष्य अपना लेंगे तो प्रचलित जगतीकरण के विरुद्ध एक विश्वव्यापी विद्रोह का माहौल बन जाएगा । विकासशील देशों के परस्पर सहयोग से जो अंतर्राष्ट्रीय संबंध बनेगा , उसके आधार पर नये जगतीकरण का आरंभ होगा । ( जारी, अगला- ' आर्थिक संप्रभुता क्या है ?')

गुरुवार, फ़रवरी 08, 2007

वैश्वीकरण : देश रक्षा और शासक पार्टियाँ : किशन पटनायक

गत प्रविष्टी से आगे : देश - रक्षा में हथियारों का प्रमुख स्थान नहीं । अगर आप राजनीतिमें , कूटनीति में , अर्थनीतिमें सब कुछ समर्पित करते जाएंगे , तो लड़ने के लिए क्या रह जाता है ? आप अपने उद्योगों को , खदानों को , व्यापार को , भूमि और बंदरगाहोंपर अधिकार को , बैंक और बीमा को विदेशी शक्तियों को समर्पित करने के लिए तैयार हैं , तो परमाणु बम से किन चीजों की रक्षा करना चाहते हैं ?

विदेशी पूँजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हमारा कैसा सम्पर्क रहेगा , यह केवल वित्तमंत्री का विषय नहीं है । देश - रक्षा का सवाल इससे जुड़ा हुआ है क्योंकि सम्राज्यवादी शक्तियाँ विश्वबैंक , मुद्राकोष जैसी आर्थिक संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से काम कर रही हैं , उनका मुकाबला हम कैसे करें और अपने राष्ट्र को गुलामी से कैसे बचायें , इसकी रणनीति बनाने वाला कोई विभाग हमारी सरकार का नहीं है। प्रतिरक्षा विभाग केवल सैनिक गतिविधियों से संबंधित है । विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री का कार्यालय भी आर्थिक साम्राज्यवाद के प्रतिकार के बारे में कोई गम्भीर चर्चा नहीं करते हैं । इसका कारण यह है कि देश की शासक पार्टियाँ साम्राज्यवाद के प्रति नरम रुख अपना रही है ।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि भारतीय राष्ट्रीय जागरण और स्वाधीनता आंदोलन में सबसे बड़ी भूमिका कांग्रेस दल की रही ।लेकिन कांग्रेस का चारित्रिक पतन हो चुका है और जनाधार भी छिन्न-भिन्न हो चुका है । फिर भी इसकी शासक दल वाली हैसियत बनी हुई है । राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा शासक दल है भारतीय जनता पार्टी । देश के लिए यह एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग है कि साम्राज्यवाद की चुनौती के सामने इन दोनों दलों की नीति झुकने की है ।दोनों का राजनैतिक चरित्र मीरजाफ़र के जैसा है ।यहाँ पलासी युद्ध के मीरजाफ़र की बात हम नहीं करते हैं ।हम नवाब मीरजाफ़र की बात कर रहे हैं - जो कंपनी की माँगों को पूरा करने के लिए तैयार हो जाता है । अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गाँधी दोनों की भूमिका इस वक्त वही है । पेटेंट और बीमा संबंधी विधेयकों के सन्दर्भ में यह बात साबित हो गयी । दोनों को ले कर कुछ - कुछ आश्चर्य भी होता है ।कांग्रेस को लेकर इसलिए आश्चर्य है कि कांग्रेस मुख्य प्रतिपक्षी पार्टी थी (लेख मई,१९९९ का है), और शासक पार्टी (भाजपा) को इस मुद्दे पर अप्रिय करने का एक बड़ा मौका था । कांग्रेस ने यह मौका छोड़ दिया। इससे अंदाज होता है कि साम्राज्यवादी शक्तियाँ और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इन विधेयकों को प्रेरित कराने के लिए इतना अधिक दबाव पैदा कर रही हैं कि प्रतिपक्ष के दल को भी शासक दल द्वारा लाये गये विधेयकों का समर्थन करना पड़ रहा है ।

भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के पहले भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग पेटेंट तथा बीमा विधेयकों के विरोधी थे । भाजपा और रा. स्व. संघ ले लोगों का प्रशिक्षण ऐसा हुआ है कि वे राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता में फर्क नहीं कर पाते हैं । उनकी साम्प्रदायिक भावना ज्यादा प्रबल है और दबाव पड़ने पर उनका राष्ट्रवाद दब जाता है । और यही दृश्य देखने को मिला जब बीमा विधेयक को लेकर भाजपा के अन्दर विवाद खड़ा हुआ ।

इसमें कोई शक नहीं कि विदेशी शक्तियों का दबाव बहुत पड़ता है । लेकिन यह कहकर कायरता का समर्थन नहीं किया जा सकता । भारत की तुलना में चीन के नेतृत्व को अमेरिका का ज्यादा (या उतना ही) दबाव झेलना पड़ता है । लेकिन चीन का नेतृत्व दबंग है। चीन की किसी एक बात पर प्रशंसा होनी चाहिए तो उसके राष्ट्रवादी दबंगपन की होनी चाहिए । चीन सरकार की आर्थिक नीतियाँ गलत दिशा में जा रही हैं;फिर भी चीन की स्थिति तीसरी दुनिया के अन्य सभी देशों से बेहतर है ,कारण चीन का राष्ट्रवाद साम्राज्यवादी धमकी से दबता नहीं है ।अभी हाल में चीन के प्रधानमंत्री झुग रोंगजी अमेरिका गये थे ।चीन पर अमरीकी आरोपों का जवाब देते हुए झुग ने राष्ट्रपति क्लिंटन और उनके मंत्रियों को ऐसी खरी बात सुनाई कि अंग्रेजी अखबार वाले लिखते हैं क्लिंटन की बोलती बन्द हो गयी । श्री झुग अच्छी अंग्रेजी बोल सकते हैं , लेकिन अमरीका में उन्होंने अपनी भाषा में बात की ।क्या भारत का राजनैतिक नेतृत्व चीन से राष्ट्रवाद और स्वाभिमान की सीख ले सकता है ? देश रक्षा स्वाभिमान से शुरु होती है ।जब भारत में डंकल प्रस्ताव और विश्वव्यापार संगठन में पर बहस चल रही थी तो लचर दिमागवाले बुद्धिजीवी क्या कहते थे ? वे कहते थे कि देखो , चीन भी विश्वव्यापार संगठन में जाने की कोशिश कर रहा है । तो हम पीछे क्यों रहें ?ऐसा सोचने वालों का देश पीछे रहेगा ।चीन का विदेशी व्यापार भारत से अधिक मजबूत है ।चीन ने अभी तक विश्वव्यापार संगठन में प्रवेश नहीं किया , क्योंकि वह अपनी शर्त पर शामिल होना चाहता है । उसकी शर्त मानना अमरीका को मुश्किल पड़ रहा है ।इस बात को लेकर भारत के समाचारपत्र चीन की तारीफ क्यों नहीं करते हैं ?

पाकिस्तान और चीन में से कौन बड़ा दुश्मन है - यह एक गौण प्रश्न है । संभवत: हमारी उलझन दोनों से एक जैसी है । हमारा मुख्य संघर्ष साम्राज्यवादी शक्तियों से है , क्योंकि उनका हमला हमारे राष्ट्रवाद और स्वाभिमान पर है । हमारी राष्ट्र भावना को कमजोर करने के लिए वे सांस्कृतिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं ।अगर साम्राज्यवादी शक्तियों से हम संघर्ष कर पाएंगे , तो पाकिस्तान और चीन से संबंध भी सुधर सकेगा ।

भारत की विदेश नीति हमेशा कमजोर रही है ।फिर भी कुछ समय तक साम्राज्यवादी शक्तियों का प्रतिरोध हमारी विदेशनीति का एक पहलू रहा ।निर्गुट सम्मेलन को इसी के लिए संचालित किया जाता रहा । लेकिन निर्गुट सम्मेलन में अपनि भूमिका अदा करने के लिए भारत का नेतृत्व सोवियत रूस पर निर्भर हो गया और जब सोवियत रूस का पतन हुआ,तब निर्गुट सम्मेलन भी प्रभावहीन हो गया । उसके स्थान पर कोई नया अंतर्राष्ट्रीय ढ़ाँचा बनाया नहीं गया है । तब से साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध भारत की कोई रणनीति नहीं रह गयी है । सार्क देशों को मिलाकर हो , या एशिया ,अफ़्रीका और लातिनी अमरीका के कई देशों

को लेकर हो- एक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का ढ़ाँचा बनना ही चाहिए । इस संबंध में चीन की दूर दृष्टि में भी कमी है । केवल अपने देश की विशालता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के बल पर चीन लम्बे समय तक साम्राज्यवादियों का प्रतिरोध नहीं कर सकेगा ।एक अंतर्राष्ट्रीय ढ़ाँचा बनाने के लिए चीन पहल करेगा तो पड़ोसियों से भी उसका संपर्क ज्यादा नरम और भाईचारा वाला होगा । मलेशिया के मोहम्मद महातीर भी साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रतिकार के लिए सचेत और मुखर रहते हैं ।उन्हें भी चाहिए कि एक नये अंतर्राष्ट्रीय ढाँचे की पहल करें ।(जारी,अगला: जगतीकरण क्या है? )