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गुरुवार, मार्च 22, 2007

कम्युनिस्ट देश और उपभोक्तावाद : उपभोक्तावादी संस्कृति (११) : सच्चिदानन्द सिन्हा

पिछली प्रविष्टी से आगे

कम्युनिस्ट देश और उपभोक्तावाद

उपभोक्तावादी संस्कृति का कुछ ऐसा ही प्रभाव कम्युनिस्ट देशों पर भी पड़ रहा है । बोल्शेविक क्रान्ति के प्रारम्भिक दिनों में जब गृहयुद्ध चल रहा था , रूस में समता की एक जबरदस्त धारा थी जिसे 'युद्ध साम्यवाद' के नाम से सम्बोधित किया जाता था । धीरे - धीरे परिस्थितियों के दबाव में समता की धारा दब गयी । स्टालिन के वर्चस्व के बाद कम्युनिस्ट तानाशाही का जो रूप उभरा उसमें 'कम्युनिज्म' और 'फासिज्म' के बीच सामाजिक असलियत में कोई बुनियादी फर्क नहीं रहा । लेकिन कम्युनिस्ट व्यवस्था के भीतर बौद्धिक धरातल पर एक आलोचनात्मक दृष्टि जरूर थी जो इसे विरासत के रूप में मार्क्सवादी सिद्धान्त एवं क्रान्ति की घोषणाओं से मिली थी । जहाँ 'फासिज्म' में मूल्यों की कोई ऐसी मान्यता नहीं थी जिसके आधार पर उसकी सामाजिक असलियत को चुनौती दी जा सके , वहाँ रूस की सैद्धान्तिक मान्यताएं लोकतांत्रिक और समतावादी थीं । इसलिए रूस के शासकों को लगातार अपनी सामाजिक असलियत पर परदा डालना पड़ता था और यह कहना पड़ता था कि रूस की गैरबराबरी या तानाशाही की बात विरोधियों का प्रचार है । इस अन्तरविरोध के कारण बहुत से लोगों के दिमाग में यह धारणा थी कि रूसी समाज की बौद्धिकता में व्याप्त यह क्रान्तिकारी तत्त्व अन्ततोगत्वा वहाँ की सत्ता के लिए चुनौती बन जायेगा । लेकिन बाद में जब वहाँ की सामाजिक असलियत को झुठलाना सम्भव नहीं हुआ तब रूस के शासकों ने बहुत ही चतुराई से समाजवादी सिद्धान्तों को ही तोड़ना-मरोड़ना शुरु किया ।

अन्ततोगत्वा पूँजीवादी समाज की तरह उपभोक्तावादी मूल्यों को अपनाकर रूस का शासकवर्ग भी अपनी व्यवस्था और सिद्धान्तों के अन्तरविरोध से उबर गया है । अब रूस की जनता , खासतौर से मजदूर वर्ग के लोग , समता और बन्धुत्व की बात भूल गये हैं । क्रान्ति के बाद की पीढ़ी के लिए ये सब अपरिचित मान्यताएं हैं । वहाँ भी पश्चिम के नये देवता की पूजा आरम्भ हो गयी है और एक जबरदस्त चाह उन चीजों की पैदा हो गयी है जो पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति की प्रतीक हैं । इससे उत्पादन प्रक्रिया में धीरे-धीरे पूँजीवादी दक्षता की कसौटियाँ और उसी तरह के स्तरों में विभाजन को सैद्धान्तिक मान्यता प्राप्त हो गयी है । अकसर कम्युनिस्ट देशों का नारा अमेरिका के समकक्ष पहुँचने का रहा है । अमेरिका में प्रचलित उपभोग की वस्तुओं की लालसा कम्युनिस्ट देशों में भयंकर रूप से व्याप्त है । इस तरह अब कम्युनिस्ट और पूँजीवादी देशों के मूल्यों में अथवा उत्पादन एवं वितरण की व्यवस्था में कोई मूल भेद नहीं रहा - इस फरक को छोड़कर कि कारखानों के कानूनी अधिकारी एक व्यवस्था में सरकार है तो दूसरे में पूँजीपतियों के समूह हैं । इस कारण कम्युनिस्ट देशों में शासक वर्ग को एक संभावित चुनौती से फुरसत मिल गयी है और अगर वे अपने शासन को थोड़ा ढीला भी कर दें तब भी तत्काल उनकी सुविधाओं को किसी बड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा ।

लेकिन उपभोक्तावादी मूल्यों को अपनाकर कम्युनिस्ट व्यवस्थाएँ एक दूसरे तरह के संकट में फंस गयी हैं । रूस और पूर्वी यूरोप के अन्य देश जो रूसी अधिकार क्षेत्र में कम्युनिस्ट व्यवस्था चला रहे हैं , अभी भी तकनीकी दृष्टि से पश्चिम के उपभोक्तावादी समाज से काफी पीछे हैं , खासकर उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन क्षेत्र में । एक बार उपभोक्तावादी सिद्धान्त को मान लेने के बाद , एक बार यह मान लेने के बाद कि कम्युनिस्ट वयवस्था का मूल उद्देश्य लोगों को वे वस्तुएँ उपलब्ध कराना है जो अमेरिका या पश्चिम के अन्य विकसित देशों में लोगों को उपलब्ध हैं , व्यवस्था की यह मजबूरी बन जाती है कि लोगों को वे वस्तुएँ उपलब्ध कराये , या कम से कम उन लोगों को कराये जो शासन के आधार हैं । इन देशों के नागरिक भी अब इसी कसौटी पर शासन को कसने लगे हैं । इस मजबूरी के कारण पिछले दशकों में रूस और पूर्वी यूरोप के कम्युनिस्ट शासन न सिर्फ पश्चिम से बड़ी मात्रा में मशीन और तकनीक अपने उपभोक्ता उद्योगों के के आधुनिकीकरण के लिए आयात कर रहे हैं , बल्कि बड़ी मात्रा में अन्य उपभोग की वस्तुएँ भी खरीद रहे हैं । चूँकि इन देशों का उद्योग अभी भी अपेक्षाकृत पिछड़ा हुआ है, इसलिए ये लोग औद्योगिक सामान का निर्यात पश्चिम के देशों को नहीं कर सकते । इससे इन देशों में पश्चिम से खरीदे गए सामान का मूल्य चुकाने के सवाल को लेकर भारी आर्थिक संकट पैदा हो गया है । चूँकि रूस के पास खनिजों का विशाल भंडार है , वह तो सोना , तेल गैस तथा अन्य खनिजों का निर्यात कर अपने आयातों के बदले मुद्रा का भुगतान कर लेता है ( अभी साइबेरिया से गैस की आपूर्ति के लिए पश्चिमी यूरोप तक पाइप बैठाने का काम इसी उद्देश्य से हो रहा है ) , लेकिन पूर्वी यूरोप के अन्य देशों की अर्थ-व्यवस्था गहरे संकट में है । इनमें लगभग सभी देशों पर पश्चिमी देशों का कर्ज बढ़ता जा रहा है जिसे चुकाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है । अकेले पोलैण्ड पर पश्चिमी देशों का कर्ज लगभग ३० अरब डॉलर हो गया है ।

एक बार उपभोक्तावादी मूल्य कबूल करके जीवन की बहुत सी अनुपयोगी वस्तुओं का अभ्यस्त होने के बाद उनसे छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है । यह एक ऐसा पेंच है कि इसमें एक बार फंस जाने पर कम्युनिस्ट देशों के नेताओं के लिए , उबरने का एक मात्र रास्ता पूँजीवादी मूल्यों को अधिकाधिक कबूल करते जाना है । इससे निकलने का दूसरा तरीका है समता के मूल्यों को कबूल करना जो एक ही झटके में तामझाम की तमाम जरूरतों को निरर्थक बना देते हैं । लेकिन इसको कबूल करना उनके लिए अपने सत्ता के आधार को नष्ट कर देना है । यह संकट न सिर्फ कम्युनिस्ट शासकों का है बल्कि पूँजीवादी और गैरबराबरी पर टिकी हर व्यवस्था के शासकों का है । इसलिए वे समता का सिद्धान्त नहीं कबूल कर सकते , यह जानते हुए भी कि इसका विकल्प वर्त्तमान उत्पादन पद्धति को और भी संवेदनशून्य बनाना है , और भी तेज रफ्तार से उसी दिशा में ले चलना है , जहाँ प्राकृतिक साधनों के क्षय , प्रदूषण या सीमित प्राकृतिक साधनों पर अधिकार के लिए छीनाझपटी में युद्ध से मानव समाज का विनाश अवश्यंभावी दिखाई देता है ।

पुनश्च :

यह लेख १९८२-८३ में लिखा गया था । पिछले दशक के घटनाक्रम ने सोवियत युनियन और पूर्वी यूरोप में उस प्रक्रिया को , जो ऊपर वर्णित है अपनी परिणति पर पहुँचा दिया है । उपभोक्तावाद के दबाव में अपने उद्योगों को एक खास तरह की सक्षमता प्रदान करने के लिए सोवियत युनियन और इसके प्रभाव वाले पूर्वी देशों ने समाजवादी अतीत के बचे खुचे अवशेषों को भी तिलांजलि दे दी है । उद्योगों के सार्वजनिक स्वामित्व के सिद्धान्त और सभी लोगों को रोजगार देने की सरकारी जवाबदेही को खतम कर दिया गया है । विदेशी कम्पनियों को पूरी छूट इन देशों में उद्योग लगाने और मुनाफा बाहर ले जाने की , दे दी गयी है । पूरी तरह उन्मुक्त बाजार की तरफ व्यवस्था को ले जाने के प्रयास जारी हैं । सत्तर वर्ष से स्थापित व्यवस्था पाँच वर्ष के भीतर धराशायी हो गयी । लेकिन उन्मुक्त बाजार व्यवस्था अपनाने पर भी अपने आर्थिक संकट से उबरने के बजाय ये देश दिनोंदिन नये संकटों से घिरते जा रहे हैं। समाज का विघटन हो रहा है और माफियातंत्र विकसित हो रहा है । ( समाप्त )

पूरी पुस्तिका की कड़ियाँ :

उपभोक्तावादी संस्कृति :गुलाम मानसिकता की अफ़ीम : सच्चिदानन्द सिन्हा

उपभोक्तावादी संस्कृति (२) : सच्चिदानन्द सिन्हा

उपभोक्तावादी संस्कृति (३) : कृत्रिमता ही जीवन

उपभोक्तावादी संस्कृति (४) : उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास : सच्चिदानन्द सिन्हा

उपभोक्तावादी संस्कृति(५):औद्योगिक मानसिकता, खोखलेलेपन का संसार :सच्चिदानन्द सिन्हा

वस्तुओं को जमा करने की लत,समता और बंधुत्व का लोप : उपभोक्तावादी संस्कृति (६) :

आदमी का अकेलापन , एकाकी सुख : उपभोक्तावादी संस्कृति (७) : सच्चिदानन्द सिन्हा

पूँजीवाद के संकट को टालने का औजार : उपभोक्तावादी संस्कृति (८) : सच्चिदान्द सिन्हा

समाजवादी कल्पना पर कुठाराघात : उपभोक्तावादी संस्कृति (९) : सच्चिदानन्द सिन्हा

भारत और उपभोक्तावादी संस्कृति : उपभोक्तावादी संस्कृति (१०) : सच्चिदानन्द सिन्हा

कम्युनिस्ट देश और उपभोक्तावाद

मंगलवार, मार्च 20, 2007

भारत और उपभोक्तावादी संस्कृति : उपभोक्तावादी संस्कृति (१०) : सच्चिदानन्द सिन्हा

गत प्रविष्टी से आगे :

भारत और उपभोक्तावादी संस्कृति

विकसित पूँजीवादी देशों में , जैसा कि ऊपर कहा गया है , उपभोक्तावादी संस्कृति उत्पादन प्रक्रिया को बिना पूँजीवादी मूल्यों और ढाँचे को तोड़े चालू रखने और विकसित करने में सहायक होती है । लेकिन तीसरी दुनिया के देशों में इस संस्कृति का असर इसके ठीक विपरीत होता है । भारत जैसे तीसरी दुनिया के के देशों में जहाँ साम्राज्यवादी सम्पर्क से परम्परागत उत्पादन का ढाँचा टूट गया है और लोगों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिए उत्पादन के तेज विकास की जरूरत है , वहाँ उपभोक्तावाद के असर से विकास की सम्भावनाएँ कुंठित हो गयी हैं । पश्चिमी देशों के सम्पर्क से इन देशों में एक नया अभिजात वर्ग पैदा हो गया है जिसने इस उपभोक्तावादी संस्कृति को अपना लिया है । इस वर्ग में भी उन वस्तुओं की भूख जग गयी है जो पश्चिम के विकसित समाज में मध्यम वर्ग और कुशल मजदूरों के एक हिस्से को उपलब्ध होने लगीं हैं । इन वस्तुओं की उपलब्धि में उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में भी बढ़ोतरी हो जाती है । अत: इस अभिजात वर्ग में और इसकी देखा-देखी इससे नीचे के मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग में भी स्कूटर , टी.वी. , फ्रीज और विभिन्न तरह के सामान और प्रसाधनों को प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा जग गयी है । हमारे अपने देश में इसके दो सामाजिक परिणाम हुए हैं । पहला , चूँकि यही वर्ग देश की राजनीति में शीर्ष स्थानों पर है , देश के सीमित साधनों का उपयोग धड़ल्ले से लोगों की आम आवश्यकता की वस्तुओं का निर्माण करने के बजाय वैसे उद्योगों और सुविधाओं के विकास के लिए हो रहा है जिससे इस वर्ग की उपभोक्तावादी आकाँक्षाओं की पूर्ति हो सके । चूँकि उत्पादन का यह क्षेत्र अतिविकसित तकनीकी का और पूँजी प्रधान है , इन उद्योगों के विकास में विदेशों पर निर्भरता बढ़ती है । मशीन , तकनीक और गैरजरूरी वस्तुओं के आयात पर हमारे सीमित विदेशी मुद्राकोष का क्षय होता है , और हमारा सबसे विशाल आर्थिक साधन जिसके उपभोग से देश का तेज विकास सम्भव था - यानी हमारी श्रमशक्ति बेकार पड़ी रह जाती है । जिन क्षेत्रों में देश का विशाल जन समुदाय उत्पादन में योगदान दे सकता है उनकी अवहेलना के कारण आम लोगों की जीवनस्तर का या तो विकास नहीं हो पाता या वह नीचे गिरता है ।

दूसरा , चूँकि उपभोक्तावाद व्यापक गरीबी के बीच खर्चीली वस्तुओं की भूख जगाता है , उससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है । चूँकि अभिजातवर्ग में वस्तुओं का उपार्जन ही प्रतिष्ठा का आधार है , चाहे इन वस्तुओं को कैसे भी उपार्जित किया जाय , भ्रष्टाचार को खुली छूट मिल जाती है । कम आय वाले अधिकारी अपने अधिकारों का दुरपयोग कर जल्दी से जल्दी धनी बन जाना चाहते हैं ताकि अनावश्यक सामान इकट्ठा कर सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकें । इसी का एक वीभत्स परिणाम दहेज को लेकर हो रहे औरतों पर अत्याचार भी हैं । बड़ी संख्या में मधयमवर्ग के नौजवान और उनके माता - पिता , जो अपनी आय के बल पर शान बढ़ानेवाली वस्तुओं को नहीं खरीद सकते , दहेज के माध्यम से इस लालसा को मिटाने का सुयोग देखते हैं । इन वस्तुओं का भूत उनके सिर पर ऐसा सवार होता है कि उनमें राक्षसी प्रवृत्ति जग जाती है और वे बेसहारा बहुओं पर तरह - तरह का अत्याचार करने या उनकी हत्या करने तक से नहीं हिचकते । बहुओं की बढ़ रही हत्याएं इस संस्कृति का सीधा परिणाम हैं । डाके जैसे अपराधों के पीछे कुछ ऐसी ही भावना काम करती है । राजनीतिक भ्रष्टाचार का तो यह मूल कारण है । राजनीतिक लोगों के हाथ में अधिकार तो बहुत होते हैं , लेकिन जायज ढंग से धन उपार्जन की गुंजाइश कम होती है । लेकिन चूँकि उनकी प्रतिष्ठा उनके रहन-सहन के स्तर पर निर्भर करती है , उनके लिए अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर धन इकठा करने का लोभ संवरण करना मुश्किल हो जाता है ।

इस तरह समाज में जिसके पास धन और पद है और भ्रष्टाचार के अवसर हैं , उनके और आम लोगों के जीवन स्तरों के बीच खाई बढ़ती जाती है । इससे भी शासक और शासितों के बीच का संवाद सूत्र टूटता है । सत्ताधारी लोग आम लोगों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनहीन हो जाते हैं और उत्पादन की दिशा अधिकाधिक अभिजातवर्ग की आवश्यकताओं से निर्धारित होने लगती है । इधर आम जरूरतों की वस्तुओं के अभाव में लोगों का असन्तोष उमड़ता एवं उथल - पुथल की अधिनायकवादी तरीकों से जन-आन्दोलन से निपटना चाहता है। तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों में राजनीति का ऐसा ही अधार बन रहा है , जिसमें सम्पन्न अल्पसंख्यक लोग छल और आतंक के द्वारा आम लोगों के हित के खिलाफ शासन चलाते हैं ।

भारत के गाँवों में जो थोड़ा बहुत स्थानीय आर्थिक आधार था उसको भी इस संस्कृति ने नष्ट किया है । भारतीय गाँवों की परम्परागत अर्थ-व्यवस्था काफी हद तक स्वावलम्बी थी और गाँव की सामूहिक सेवाओं जैसे सिंचाई के साधन , यातायात या जरूरतमन्दों की सहायता आदि की व्यवस्था गाँव के लोग खुद कर लेते थे । यह व्यवस्था जड़ और जर्जर हो गयी थी।और ग्रामीण समाज में काफी गैरबराबरी भी थी , फिर भी सामूहिकता का एक भाव था ।हाल तक गाँवों में पैसेवालों की प्रतिष्ठा इस बात से होती थी कि वे सार्वजनिक कामों जैसे कुँआ , तालाब आदि खुदवाने , सड़क मरम्मत करवाने , स्कूल और औषधालय आदि खुलवाने पर धन खरच करें । इस पर काफी खरच होता था और आजादी के पहले इस तरह की सेवा-व्यवस्था प्राय: ग्रामीण लोगों के ऐसे अनुदान से ही होती थी । यह सम्भव इस लिए होता था क्योंकि गाँव के अन्दर धनी लोगों की भी निजी आवश्यकताएँ बहुत कम थीं और वे अपने धन का व्यय प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए ऐसे कामों पर करते थे । इसी कारण पश्चिमी अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों की हमेशा यह शिकायत रहती थी कि भारतीय गाँवों के उपभोग का स्तर बहुत नीचा है जो उद्योगों के विकास के लिए एक बड़ी बाधा है । इन लोगों की दृष्टि में औध्योगिक विकास की प्रथम शर्त थी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार और विनिमय में शामिल हो जाना ।

उपभोक्तावादी संस्कृति ने गाँवों की अर्थव्यवस्था के इस पहलू को समाप्त कर दिया है । अब धीरे - धीरे गाँवों में भी सम्पन्न लोग उन वस्तुओं के पीछे पागल हो रहे हैं जो उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं । चूँकि गांव के सम्पन्न लोगों की सम्पन्नता भी सीमित होती है अब उनका सारा अतिरिक्त धन जो पहले सामाजिक कार्यों में खरच होता था वह निजी तामझाम पर खरच होने लगा है और लोग गाँव के छोटे से छोटे सामूहिक सेवा कार्य के लिए सरकारी सूत्रों पर आश्रित होने लगे हैं । इसके अलावा जो भी थोड़ा गाँवों के भीतर से उनके विकास के लिए प्राप्त हो सकता था , अब उद्योगपतियों की तिजोरियों में जा रहा है। इससे गाँवों की गरीबी दरिद्रता में बदलती जा रही है ।

अगली कड़ी ( अन्तिम) : कम्युनिस्ट देश और उपभोक्तावाद

बुधवार, मार्च 14, 2007

समाजवादी कल्पना पर कुठाराघात : उपभोक्तावादी संस्कृति (९) : सच्चिदानन्द सिन्हा

इस उपभोक्तावादी दबाव ने मानव भविष्य की समाजवादी कल्पना की जड़ ही खतम कर दी है। मार्क्स तथा अन्य समाजवादियों की यह अवधारणा थी कि भविष्य में समाज में उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा उठ जायेगा कि मानव आवश्यकता की वस्तुएँ उसी तरह उपलब्ध हो सकेंगी जैसे आज हवा या पानी उपलब्ध है । इससे आवश्यक वस्तुओं के अभाव से होनेवाली छीना-झपटी खतम हो जायेगी , और नया आदमी अपना अधिकांश समय मानवीय-बोध के विशिष्ट क्षेत्रों , जैसे कला तथा दर्शन के विकास में लगायेगा । कई लोगों ने यह कल्पना की थी कि जैसे प्राचीन युनान के कुछ नगर-राज्यों में गुलाम सारे शारीरिक श्रम का काम करते थे और नागरिक राजनीति , कला , दर्शन आदि विषयों में अपना समय लगाते थे उसी तरह भविष्य में मशीनें वैसे सारे काम जो आदमी को अरुचिकर लगते हैं , करने लगेंगी और आदमी का सारा समय बौद्धिक विकास में लगेगा । यह बहुत ही मोहक कल्पना थी । लेकिन इस कल्पना के पीछे यह मान्यता जरूर थी कि आदमी की जरूरतें सीमित हैं और एक समतामूलक समाज में मशीनों की मदद से थोड़े श्रम से इन जरूरतों की पूर्ति सब लोगों के लिए हो सकेगी । लेकिन उपभोक्तावाद ने आदमी की जरूरतों को एक ऐसा मोड़ दिया है कि वे उत्तरोत्तर बढ़ती हुई असीमित होती जा रही है और बौद्धिक चिन्तन के बजाय मनुष्य की सारी चिन्ता , सारा श्रम और सारे साधन इन नयी जरूरतों की पूर्ति के लिए अनन्तकाल तक लगे रहेंगे , हालांकि प्राकृतिक साधनों के क्षय , प्रदूषण आदि से अपनी वर्तमान गति से आदमी की यह यात्रा अल्पकाल में ही समाप्त हो जायेगी ।
इस विकास एक प्रभाव यह पड़ा है कि विकसित पश्चिमी देशों में धीरे-धीरे यह अवधारणा बढ़ रही है कि मानव-बोध के वे सारे क्षेत्र जिनमें कल्पना का सम्बन्ध किसी प्रयोग से नहीं बन पाता, कला का सम्बन्ध किसी निजी या सामूहिक सजावट या उत्तेजना से नहीं बन पाता वे सब अप्रासंगिक हैं । एक उपभोक्तावादी समाज हर वस्तु को उपभोग की कसौटी पर कसता है । ऐसा चिन्तन जो प्रयोग के दायरे में नहीं आता कभी उपभोग के दायरे में भी नहीं आ सकता भले ही सम्प्रेषित होकर वह दूसरे मानव मस्तिष्क में नया बोध या सपनों का एक सिलसिला उत्प्रेरित करे । लेकिन उपभोक्तावादी समाज सपनों या कल्पना से बचना चाहता है , उसके लिए कल्पना की सीमा वे ठोस वस्तुएं हैं जिन्हे वह छू सकता है , खरीद सकता है और जिनसे अपने घरों को सजा सकता है । इस तरह उपभोक्तावादी संस्कृति धीरे - धीरे मानव - बोध की उस विशिष्टता को नष्ट कर देती है जो मनुष्यों को अन्य जीवों से अलग करती है - यानी ठोस वस्तुओं से ऊपर उठ कर कल्पना , अनुमान , प्रतीक आदि के स्तरों पर जीने की विशिष्टता । इस तरह यह उपभोक्तावादी संस्कृति एक तरफ थोक मशीनी उत्पादन के जरिये वस्तुओं से सृजन का तत्त्व निकाल देती है तो दूसरी ओर मानव - बोध से कल्पना की सम्भावना को ।
लेकिन कोई भी मानव - भविष्य की समाजवादी या गैरसमाजवादी युटोपिया ( कल्पना-आदर्श) का उद्देश्य मनुष्य को उस स्थिति से मुक्त करने का रहा है जिसमें उसके व्यक्तित्व का चतुर्दिक विकास अवरुद्ध होता है । यही कारण है कि समाजवादी आन्दोलन के पीछे वही मानवता काम करती है जो किसी बड़े धार्मिक उत्थान के पीछे होती है । इसीसे हजारों लोगों को अपने उद्देश्यों के लिए अपने आप को बलि कर देने की प्रेरणा मिलती रही है । इसी कारण अपने शुद्ध अर्थ में समाजवाद की राजनीति अन्य तरह की राजनीति से अलग रही है । मोटे तौर से राजनीति का केन्द्र बिन्दु सम्पत्ति का एक या दूसरी तरह से बँटवारा रहा है । राजनीति के मुद्दे होते हैं - कौन सम्पत्ति का हकदार होगा , किस व्यक्ति या समूह को किस भूमि या भू-भाग पर अधिकार मिलेगा , किसकी क्या आमदनी होगी ? और इन्हीं से जुड़ा यह सवाल कि किस व्यक्ति या समूह की क्या सामाजिक राजनीतिक हैसियत होगी । जब मार्क्स ने यही बात कही थी तो उस समय यह कुछ चौंकानेवाली बात लगी थी । लेकिन आज सभी लोग इस सच्चाई को मानने लगे हैं । इस कारण उन लोगों के सामने जिन्होंने नये तरह के समाज के निर्माण की कल्पना की थी , नक्शा ऐसे ‘आर्थिक मनुष्यों’ का समाज बनाने का नहीं था । इस निरन्तर चलने वाली सम्पत्ति के बँटवारे की ऊहापोह को लेकर कोई मनीषी क्यों अपना पूरा जीवन लगाता ? समाजवाद की कल्पना के पीछे असली भावना आदमी के जीवन को सम्पत्ति और उसके उन प्रतीकों से मुक्त करना था जो उसे गुलाम बनाते हैं तथा उसके समुदायभाव को नष्ट करते हैं । इससे एक पूर्ण उन्मुक्त मानव की कल्पना जुड़ी थी । उपभोक्तावाद असंख्य नयी कड़ियाँ जोड़ कर मनुष्य पर सम्पत्ति की जकड़न को मजबूत करता है और इसलिए हमारे युग में समाजवाद के सीधे प्रतिरोधी के रूप में उभरता है ।

पूँजीवाद के संकट को टालने का औजार : उपभोक्तावादी संस्कृति (८) : सच्चिदान्द सिन्हा

पूँजीवाद के संकट को टालने का औजार
पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली से उपजी यह उपभोक्तावादी संस्कृति पूँजीवाद के संकट को टालने का भी सबसे कारगर औजार है । ऊपर इस बात की चर्चा की गयी है कि कैसे यह संस्कृति मजदूर वर्ग की वर्ग - चेतना और समाज - परिवर्तन की आकांक्षा को नष्ट करती है लेकिन इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसकी भूमिका पूँजीवादी उत्पादन को चालू रखने में है । वैज्ञानिक सूक्ष्मता के बिना भी मोटे तौर पर हम पूँजीवादी उत्पादन के आधार और उसकी समस्याओं को नीचे दिये गये ढंग से समझ सकते हैं जिसके पीछे मार्क्स तथा उसके समकालीन कुछ अन्य अर्थशास्त्रियों का चिन्तन है ।
पूँजीवादी उत्पादन में पूँजीपतियों के मुनाफे का आधार मजदूरों के श्रम का शोषण होता है। उदाहरण के लिए अगर मजदूर किसी पूँजीपति के यहाँ ८ घण्टे काम करता है तो उसके एवज में वह अपने पूरे श्रम का मूल्य नहीं पाता । उसे ५ - ६ घंटे या और कम या अधिक समय के काम करने की ही मजदूरी मिलेगी । दो या तीन घंटे के श्रम से पैदा हुई वस्तु को ही जिसके बदले मजदूर को मजदूरी नहीं मिलती बेचकर मालिक यह अतिरिक्त मूल्य पाता है जो उसने मजदूरों की पूरी ८ घंटे मजदूरी में से काट लिया होता है । यही अतिरिक्त मूल्य जमा हो कर , क्योंकि ऐसा मूल्य उसे सैंकड़ो या हजारों मजदूरों से वर्षों तक प्राप्त होता रहता है , उसकी पूँजी का स्रोत बनता है । लेकिन यहाँ उत्पादित माल की खपत के लिए बाजार की समस्या पैदा हो जाती है । मजदूर ने तो ८ घंटे के काम के बराबर वस्तुओं का निर्माण किया है लेकिन अगर उसे ६ घंटे के काम की ही मजदूरी मिली तो वह ६ घंटे के काम के बराबर की ही वस्तुएं खरीद सकेगा । फिर सवाल उठता है कि जो बाकी २ घण्टे की मजदूरी से उत्पादित वस्तुएं होंगी उन्हें कौन खरीदेगा ? पूँजीपति खरीद सकते हैं । लेकिन हम सभी पूँजीपतियों को समेट कर एक काल्पनिक पूँजीपति के रूप में देखते हैं, तो पाते हैं कि चूँकि उसकी पूँजी का स्रोत वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त मुनाफा है , अत: जब तक वस्तुओं की बिक्री नहीं होती पूँजीपति के हाथ में भी खरीदने के लिए पैसा नहीं होगा ( यहाँ मान लिया गया है कि पूँजीवादी समाज में आमदनी के दो ही मूल स्रोत हैं , मजदूरों की मजदूरी और पूँजीपतियों का मुनाफा,बाकी सभी लोगों की आमदनी या तो पूँजीपतियों के मुनाफे से आती है य मजदूरों की मजदूरी से)। अगर पैसा हो भी तो पूँजीपति अपने तमाम मुनाफे के बराबर वस्तुओं को नहीं खरीद सकते क्योंकि उनकी संख्या सीमित है । अत: वे कितना भी खर्च उपभोग पर क्यों न करें , वे उत्पादित अतिरिक्त मूल्य के बराबर उपभोग पर खर्च नहीं कर सकते । इसका एक बड़ा अंश वे जरूरी उत्पादन वस्तुओं जैसे मशीन आदि के खरीदने पर खरच कर सकते हैं ।लेकिन अगर उपभोग की वस्तुओं की खपत रुकी रही तो उत्पादन पर लगी नयी पूँजी से जो नये उपभोग की वस्तुएं बनेंगी उनसे यह संकट और भी गहरा होगा क्योंकि जब तक मशीन से बनी वस्तुओं की खपत नहीं होती नयी मशीन बैठाना निरर्थक होगा , क्योंकि उत्पादित माल के लिए पहले ही से बाजार में मंदी है ।
कुछ हद तक सरकार पूँजीपतियों को इस संकट से बचाती है। वह नोट छाप कर पैसों का जुगाड़ कर देती है और इसमें कुछ सेवा-क्षेत्रों में खरच करते हैं पर वह विशेषकर युद्ध के सामान की खरीद करती है जिसकी उपयोगिता नहीं होती लेकिन सुरक्षा के नाम पर जिसके उत्पादन की कोई सीमा भी नहीं , क्योंकि नित्य नये हथियार ईजाद होते रहते हैं और पुराने रद्दी हो कर बेकार होते जाते हैं । इसके अलावा वस्तुओं को गैर-पूँजीवादी क्षेत्रों में बेचने का प्रयास होता है । फिर स्वयं पूँजीपतियों के यहाँ काम करनेवाले मजदूरों या सेवा कार्य में लगे मजदूरों के भविष्य की आय ‘हायर परचेज’ योजना के अन्दर वस्तुओं की बिक्री के लिए समेट ली जाती है । लेकिन चूँकि पूँजी के विकास के लिए यह दबाव निरन्तर बना रहता है कि उत्पादन का फैलाव होता रहे , क्योंकि बिना उत्पादन और इससे प्राप्त मुनाफे के पूँजीवाद का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है अत: इस बात का निरन्तर प्रयास होता है कि लोगों में उत्तरोरत्तर उपभोग वृत्ति को तेज किया जाये जिससे ग्राहकों का अभाव न हो । इस तरह उपभोक्तावादी संस्कृति उपभोग वृत्ति को निरन्तर उकसा कर पूँजीवादी उत्पादन को जीवित रखती है ।
अगली कड़ी : समाजवादी कल्पना पर कुठाराघात