गुरुवार, मार्च 29, 2007
शुक्रवार, मार्च 23, 2007
नन्दीग्राम की शहादत से उठे बुनियादी सवाल
[इन्डोनेशिया के सालेम ग्रुप द्वारा नन्दीग्राम में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने की योजना का क्षेत्रीय किसान और बटाईदार विरोध कर रहे हैं।नन्दीग्राम का विधान-सभा में प्रतिनिधित्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का है।बंगाल में पंचायती राज में दलीय आधार पर चुनाव लड़ा जाता है और नन्दीग्राम के प्रखण्ड स्तर के प्रतिनिधियों में(वार्ड सदस्य,ग्राम-प्रधान,ब्लॉक समिति व जिला परिषद सदस्य) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का ही बोलबाला है।किसानों द्वारा विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाये जाने के विरोध में जो संघर्ष समिति बनी है उस में माकपा समर्थक किसान और बटाईदार अच्छी तादाद में हैं ।बुद्धदेब दासगुप्त कहते हैं कि वे आने वाली पूँजी का रंग नहीं देखेंगे। यह दान की बछिया वाला भाव उन्होंने तब प्रकट किया जब यह ध्यान दिलाया गया कि सालेम कम्पनी के हाथ इन्डोनेशिया में कम्युनिस्टों के कत्ल के ख़ून से रंगे हैं। सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने के प्रस्तावों पर सांसदों में जितनी एकता हो जाती है उतनी एकजुटता के साथ विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून संसद में मंजूर हुआ था ।ऐसे में नदीग्राम में बहे किसानो-मजदूरों के खून से जो बुनियादी सवाल उठने चाहिए उन्हें यहाँ दिया जा रहा है ।शहीद किसानों के संघर्ष की बुनियाद में जो मसायल हैं,उन्हें नजरांदाज करना अन्याय होगा।समाजवादी जनपरिषद के १६-१८ मार्च को बरगढ़ , उड़ीसा में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में पारित आर्थिक प्रस्ताव के नीचे लिखे अंश इन सवालों को उठाते हैं ।]
सरकार की देशविरोधी , जनविरोधी , दिवालिया नीतियों का सबसे बड़ा उदाहरण पिछले समय विशेष आर्थिक क्षेत्रों के रूप में सामने आया है । अभी तक सरकार २६७ विशेष आर्थिक क्षेत्रों को मंजूरी दे चुकी है । इन क्षेत्रों को विकसित करने वाली कम्पनियों और इनके अन्दर लगने वाली इकाइयों को लगभग सारे करों व शुल्कों से छूट होगी । इन्हें कम्पनियों के लिए करमुक्त स्वर्ग कहा जा सकता है । इसलिए देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित करने की होड़ व लूट मची है ।ज्यादातर विशेष आर्थिक क्षेत्र महानगरों के आसपास पहले से विकसित इलाकों में ही लग रहे हैं । राज्य सरकारें इसमें पूरा सहयोग कर रही हैं और सस्ती दरों पर जमीन अधिग्रहीत करके कम्पनियों को दे रही हैं । जमीन-जायदाद और निर्माण का धन्धा करने वाली बहुत-सी कम्पनियाँ भी इसमें कूद पड़ी हैं । जमीन के विशाल घोटाले भी इस खेल में हो रहे हैं ।
निर्यात और विदेशी पूँजीनिवेश बढ़ाने के नाम पर शुरु किए गए इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों से देश का विकास और औद्योगीकरण नहीं होगा , बल्कि औद्योगिक विनाश होगा । विशेष आर्थिक क्षेत्रों के बाहर की औद्योगिक इकाइयों को करों में छूट नहीं होने से वे प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पायेंगी और या तो बन्द हो जायेंगी या विशेष आर्थिक क्षेत्रों में स्थानान्तरित हो जायेंगी । नतीजा यह होगा कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तो प्रगति और समृद्धि दिखायी देगी , लेकिन बाकी विशाल देश में मक्खियाँ उड़ेंगी । क्षेत्रीय असंतुलन तेजी से और बढ़ेगा। पहले पिछड़े इलाकों में उद्योगों को रियायतें , मदद व प्रोत्साहन देने की सरकार की नीति होती थी। अब ठीक उल्टी दिशा में सरकार जा रही है ।
विशेष आर्थिक क्षेत्रों, कई हिस्सों में बड़े कारखानों और नई खदानों से एक बड़ा सवाल देश में खड़ा हो गया है, वह है जमीन का सवाल। बहुत तेजी से खेती , चरागाह तथा जंगल की भूमि इन कम्पनियों को जा रही है , विस्थापन की बाढ़ आ गयी है तथा कई जगह विरोध में प्रबल आन्दोलन भी खड़े हो गये हैं । सवाल सिर्फ किसानों को पर्याप्त मुआवजे एवं पुनर्वास का नहीं है वह तो होना ही चाहिए । सवाल यह भी नहीं कि ये क्षेत्र एवं कारखाने , उपजाऊ या दो-फसली भूमि पर नही बनाए जाएँ , क्योंकि तब पिछड़े पठारी व आदिवासी इलाकों में विस्थापन सही मान लिए जाएंगे । सवाल यह है कि जो जमीन इस देश में करोड़ों ग्रामीण परिवारों की एकमात्र सम्पत्ति और सहारा है , वह बहुत तेजी से देशी-विदेशी कम्पनियों और बड़े पूँजीपतियों के पास जा रही है । इस मामले में भी देश को पीछे ले जाया जा रहा है। जमींदारी उन्मूलन और भूमि हदबन्दी कानून इस देश के आजादी आन्दोलन की महत्वपूर्ण विरासत थी । अब एक नए किस्म की जमींदारी देश में कायम हो रही है । रिलायन्स(या अम्बानी) आज इस देश में बहुमूल्य जमीन का सबसे बड़ा मालिक व जमींदार बन गया है ।
सवाल यह भी है कि बड़े पैमाने पर जमीन को खेती से हटा लिए जाने पर हमारे कृषि उत्पादन और खाद्य-सुरक्षा का क्या होगा ? यह भी तथ्य सामने आ रहा है कि आधुनिक औद्योगीकरण और आधुनिक सभ्यता की प्राकृतिक संसाधनों की भूख जबरदस्त है, जिससे नए-नए संकट खड़े हो रहे हैं । जल-जंगल-खनिज का इतना बड़ा शोषण , दोहन एवं विनाश इस आधुनिक विकास में निहित है , यह अनुभव और अहसास आज बहुत स्पष्ट रूप से हो रहा है ।
कलिंगनगर , दादरी , सिंगुर और नन्दीग्राम के संघर्षों और विवादों ने यह जाहिर कर दिया है कि देश की सारी प्रमुख पार्टियों और सरकारों की नीतियाँ और सोच एक ही हैं, एवं तथाकथित वामपंथ ने भी आज पूरी तरह पलटी खा ली है । जो कम्युनिस्ट कल तक हर मामले में कारण-अकारण टाटा-बिड़ला को गाली देते थे , उन्हीं की सरकार आज टाटा के साथ गले में हाथ डालकर खड़ी है और किसानों-मजदूरों-बटाईदारों पर लाठी-गोली चला रही है । लेकिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने एक सवाल खड़ा किया है, जिसका जवाब आज के भारत को खोजना होगा । उन्होंने तथा माकपा ने कहा है कि सिर्फ खेती से सबको रोजगार नहीं दिया जा सकता और उन्नति नहीं हो सकती है । उन्होंने यह भी कहा है कि किसान जब तक किसान रहेगा , खुशहाल नहीं होगा । उन्होंने ने पूछा है कि क्या किसान का बेटा किसान ही रहेगा ? उन्हों यह भी पूछा है कि सिंगुर-नन्दीग्राम का विरोध करने वाले क्या बंगाल का औद्योगीकरण और विकास नहीं चाहते ? इस सवाल का जवाब ममता बनर्जी और नक्सलियों को भी देना होगा । इस सवाल का जवाब साम्यवादी और पूँजीवादी दोनों विचारधाराओं में नहीं है । यह जवाब गाँधी-लोहिया के दर्शन में ही मिलेगा । यह सही है कि सिर्फ खेती में सबको रोजगार नहीं मिल सकता । लेकिन खेती करने वाला किसान खुशहाल क्यों नहीं हो सकता । गाँव-खेती के शोषण का अन्त क्यों नहीं हो सकता । खेती देश की अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख और केन्द्रीय गतिविधि हो सकती है , लेकिन देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को , ग्रामीण आबादी के भी बड़े हिस्से को , विकेन्द्रित छोटे-ग्रामीण उद्योगों लगाना होगा । इस तरह का औद्योगीकरण ही भारत जैसे देशों के लिए विकास का एकमात्र रास्ता है ।
कई प्रकार के प्रतिकूल प्रभाव और विकृतियाँ सामने आने के बावजूद भारत सरकार वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की आत्मघाती नीतियों पर आगे बढ़ती जा रही है । अर्थव्यवस्था के सारे दरवाजे विदेशी पूँजी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खोलने के निर्णय लिए गए हैं । खुदरा व्यापार में पहले ही कई देशी कम्पनियाँ कूद चुकी हैं और शहरों में बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल आ रहे हैं । वॉल मार्ट जैसी विदेशी कम्पनियों को पूरी छूट मिलने पर यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ेगी । खुदरा व्यापार भारत के बेरोजगारों की आखिरी शरणस्थली है । इस अन्तिम शरणस्थली पर हमला शुरु हो गया है।
स्पष्ट है कि तथाकथित वैश्वीकरण और आधुनिक विकास की नीति फिर से इस देश को गुलाम और बरबाद करने तथा लूटने की नीति है । इस देश को वापस उपनिवेश बनाया जा रहा है औए ढ़ाई सौ साल पहले ले जाया जा रहा है । ऐसी हालत में , इसका पूरी ताकत से विरोध करना देश के हर सचेत और देशभक्त नागरिक का कर्तव्य है। साम्राज्यवाद के विरुद्ध १८५७ के पहले विद्रोह के डेढ़ सौ वर्ष पूरा होने के मौके पर समाजवादी जनपरिषद इसी का आह्वान करती है ।
प्रस्तुतकर्ता
अफ़लातून
पर
3:57 pm
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शुक्रवार, जनवरी 05, 2007
भारत भूमि पर विदेशी टापू (शेष भाग)
गतांक से आगे :
आन्ध्रप्रदेश में काकिनाडा में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं तेलशोधक कारखाने के लिए १०,००० एकड़ खेती की उपजाऊ भूमि ली जा रही है , जिसे छोड़ने के लिए किसान तैयार नहीं है। हरियाणा में रिलायन्स का विशेष आर्थिक क्षेत्र भी विवादों से घिर गया है। हरियाणा सरकार ने गुड़गाँव के पास लगभग १००० करोड़ रु. की १७०० एकड़ भूमि मुकेश अंबानी को मात्र ३६० करोड़ रु. में दे दी है। इसी प्रकार , पंजाब में अमृतसर के पास डी.एल.एफ़. कम्पनी के विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए भी सस्ती दरों पर भूमि अर्जित करने के कारण काफी विरोध हो रहा है। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री स्वंय इसमें कम्पनी के पक्ष में जोर लगा रहें है तथा वहाँ जा चुके हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के मामलों में जमीन के बड़े-बड़े घोटाले होने की पूरी सम्भावना है। वैश्वीकरण के कई घोटालों में यह एक नया योगदान है। प्रचलित बाजार दरों से काफी कम दरों पर, राज्य सरकारें इन कम्पनियों के हवाले जमीन कर रही है तथा किसानों से बहुत कम दरों पर जमीनें जबरदस्ती ली जा रहीं है। पहले ही बड़े बाँधों,खदानों,कारखानों,फ़ायरिंग रेंजों,राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारणों से बड़े पैमाने पर गाँवों को उजाड़ा जा रहा है। विशेष आर्थिक क्षेत्र इस विस्थापन की श्रृंखला में एक नई कड़ी बन गए हैं। भारतीय खेती व गाँवों पर वैश्वीकरण का यह एक और हमला है।
विशेष आर्थिक क्षेत्रों का प्रशासन भी इनका विकास करने वाली कम्पनियों के हाथ में होगा। केन्द्र सरकार की तरफ से सिर्फ एक विकास आयुक्त होगा। सम्भवतः कोई ग्राम पंचायत या नगरपालिका जैसी स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ भी नहीं होगी। ये देश के अंदर एक अलग देश होंगे और यहाँ देशी-विदेशी कम्पनियों की ही चलेगी। यह एक विचित्र स्थिति होगी और १९४७ के बाद, गोवा व पांडिचेरी की आजादी के बाद, भारत भूमि पर पहली बार देश की सम्प्रभुता से स्वतंत्र क्षेत्र बनेंगे।
इस बात की पूरी सम्भावना है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र काफी बड़े भ्रष्टाचारों और घोटालों के केन्द्र बनेंगे। विकास आयुक्त से लेकर अन्य अफ़सर केन्द्र सरकार के होंगे। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में स्थापित होने वाली इकाइयों और इसमें ढाँचा-निर्माण करने वाली कंपनियों को अनुमति व लाइसेन्स देने की एवज में उनकी जम कर कमाई होगी। आखिर करोड़ों - अरबों रुपए की कर -रियायतों के बदले में कुछ कमीशन उन्हें देने में देशी- विदेशी कंपनियों को कोई दिक्कत नहीं होगी।
यदि संप्रभुता, भ्रष्टाचार, विस्थापन और अन्य विवादों को छोटी - मोटी समस्या तथा विरोधियों का प्रचार कहकर नकार दिया जाए, तो भी भारत के विकास और प्रगति में इन ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ की भूमिका काफी संदिग्ध है। स्वयं उदारीकरण - वैश्वीकरण के समर्थक अर्थशास्त्री भी भारत सरकार की इस योजना पर उंगली उठा रहें हैं। पहली बात तो यह है कि ज्यादा संभावना इस बात की है कि इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों में मिलने वाली जबरदस्त कर- छूटों व अन्य सुविधाओं के कारण, नए उद्योग लगने के बजाय देश के अन्य क्षेत्रों से उद्योग यहाँ स्थानान्तरित हो जायेंगे । विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तो पूंजी निवेश, उत्पादन, निर्यात और रोजगार के आंकड़े बढ़ते हुए दिखेंगे, किंतु देश के अन्य विशाल भूभाग में उद्योग बंद होते जाएंगे और मंदी व बेरोजगारी फैलती जाएगी। कुल मिलाकर नतीजा शून्य से ज्यादा नहीं होगा।
उल्टे नुकसान यह होगा कि करों व शुल्कों में भारी रियायतों से भारत सरकार व राज्य सरकारों की आय कम हो जाएगी और वे अपने कर - राजस्व के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से से वंचित हो जाएगी। अनुमान लगाया गया है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों के कारण सिर्फ भारत सरकार को अगले चार वर्षों में लगभग ९३,००० करोड़ रुपए के कर-राजस्व का नुकसान होगा । एक तरफ तो भारत सरकार पैसे की तंगी का रोना रोती है और अपना घटा व अनुदान कम करने के लिए गरीबों व आम जनता के लिए राशन , बिजली , पानी , खाद , शिक्षा , इलाज आदि को मंहगा करती जा रही है, दूसरी तरफ़ इन कंपनियों को दिल खोल कर करों व शुल्कों से छूट दे रही है । देश की जनता को वंचित करके कंपनियों को लाभ पहुँचाने का काम इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के जरिए होगा ।
इस मामले में , इसके पहले के ‘ निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों ‘ का क्या अनुभव रहा , यह भी देखना चाहिए । वर्ष १९९८ की रिपोर्ट में भारत के महाअंकेक्षक एवं लेखा परीक्षक ने टिप्पणी की थी कि ” ४७०० करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा कमाने के लिए ७५०० करोड़ रुपए के आयात शुल्क की हानि हुई तथा ऐसा लगता है कि सरकार ने कोई नफ़ा-नुकसान का विश्लेषण ही नहीं किया। ” हो सकता है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों का अनुभव भी इससे ज्यादा अलग न हो ।
दरअसल , चीन ने दो दशक पहले जब इस तरह के विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाये थे , तो वहाँ स्थिति काफी अलग थी । एक, चीन के अन्दर काफी समय तक विदेशी कंपनियों को इजाजत नहीं थी तथा चीन की अपनी देशी निजी कंपनियाँ भी नहीं पनपीं थीं । इसलिए इन क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को चीन में घुसने का एक मौका मिला , वे बड़ी संख्या में आईं और इन क्षेत्रों से चीन को निर्यात बढ़ाने में मदद मिली । जबकि भारत में तो सारे दरवाजे पहले ही खुले हैं तथा भारत के देशी कंपनियां भी काफी विकसित हैं । दूसरा फर्क यह है कि बीस वर्ष पहले सब जगह आयात और निर्यात शुल्क काफी ऊँचे थे तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों के माध्यम से कंपनियों को ऊँचे शुल्कों की इन दीवारों को भेदने की सुविधा मिलती थी । लेकिन १९९५ में विश्वव्यापार संगठन बनने के बाद से ये शुल्क लगातार कम होते गए हैं और अब शून्य से लेकर दस-पन्द्रह प्रतिशत के बीच में रह गए हैं । इसलिए उत्पादन व निर्यात के लिए कम सीमा-शुल्कों वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने का औचित्य बहुत कम रह गया है । हम चीन के विकास मॊडल की नकल तो करने की कोशिश कर रहे हैम,लेकिन नकल में भी अपनी अकल कम लगा रहे हैं ।
यह भी हो सकता है कि निर्यात के लिए करों में छूट और सुविधाओं को विश्वव्यापार संगठन में कोई देश चुनौती दे या स्वयं अपने देश में उन वस्तुओं पर संतुलित करने वाले शुल्क लगा दे। ऐसी हालत में निर्यात संवर्धन के उद्देश्य को पूरा करने पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा ।
भारत पिछले कई वर्षों से अपना निर्यात बढाने की कोशिश कर रहा है । निर्यात बढने से ही देश का विकास होगा ,यह पाठ विश्वबैंक,अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्वव्यापार संगठन से ले कर वैश्वीकरण समर्थक सभी अर्थशास्त्री पढाते रहे हैं । इसके लिए चीन , दक्षिण कोरिया , मक्सिको व लाटिनी अमेरिका के अन्य देशों का उदाहरण दिया जाता रहा है। निर्यात बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा विदेशी कंपनियों को देश में बुलाना होगा तथा देशी-विदेशी कंपनियों को नियमों और करों में छूट व अनुदान देने होंगे - इस नीति पर भारत सरकार चलती रही है । ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र’ इस शृंखला में सबसे ताजा पैकेज है । किन्तु इन सब कोशिशों के बावजूद भारत को अभी तक इस मोर्चे पर सफलता नहीं मिली है । भारत के निर्यात तो बहुत नहीं बढ़ पाए , आयात उससे ज्यादा बढ़ते गए। पि्छले काफी समय से भारत के विदेश व्यापर में लगातार विशाल घाटा चला आ रहा है ।
निर्यात-आधारित विकास की इस पूरी संकल्पना पर ही सवाल उठाने का समय आ गया है । सही माएने में देखा जाए, तो यह एक मृग-मरीचिका है और दुनिया के गरीब देशों को लूटने का एक और खेल है । जब दुनिया के सारे गरीब देश निर्यात बढ़ाने की कोशिश करते हैं,तो जाहिर है कि सबका निर्यात एक साथ नहीं बढ़ सकता । कुछ देशों के निर्यात कम होंगे, तो दूसरे देशों के निर्यात बढ़ेंगे । लेकिन निर्यात बढाने की इस होड़ में वे अपने सामानों और सेवाओं को सस्ता करते जाते हैं । अपने देश की बहुसंख्यक गरीब आबादी की जरूरतों की उपेक्षा भी करते हैं । अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में माल सस्ता होने पर अमीर देशों व उनके नागरिकों व उनके नागरिकों कोफायदा होता है , जिनके पास क्रय शक्ति है ,या यूँ कहें कि जिनके पास डॊलर है । इस प्रकार ‘निर्यातोन्मुखी विकास’ के इस खेल में अमेरिका-यूरोप-जापान की सेवा में पूरी दुनिया के संसाधन लग जाते हैं और उनके लिए चीजें और सेवाएं सस्ती होती चली जाती हैं । यह शोषण का एक जरिया है । साथ ही निर्यात बढ़ाने के लिए विदेशी कंपनियां ही माहिर हैं , इस तर्क के चलते अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सर्वत्र घुसपैठ हो रही है और उनका वर्चस्व पूरी दुनिया पर पायम होता चला जा रहा है । उनके मुनाफ़े व रायल्टी , गरीब दुनिया के शोषण का एक जरिया है । ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ तो विशेष तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अड्डे बनेंगे ।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ हों , निर्यात आधारित विकास की बात हो , विदेशी पूंजी आकर्षित करने की होड़ हो या वैश्वीकरण का गुणगान हो , चीन की मिसाल बार-बार दी जाती है । चीन आधुनिक भारत के लिए एक मॊडल है ,जिसका वह अनुकरण करना चाहता है । वह मनमोहन सिंह और बुद्धदेव भट्टाचार्य दोनों के लिए मॊडल है।चीन की विकास दर लगातार कई वर्षों से नौ-दस प्रतिशत के आस-पास चल रही है । चीन भारत से तीन-चार गुना ज्यादा विदेशी पूंजी अकर्षित कर रहा है । चीन का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है और चीनी वस्तुएं अमरीका से ले कर भारत तक के बाजार में छा गयी हैं । यह सब तो खूब प्रचार होता है । लेकिन चीन की जनता का क्या हाल है ? इस मॊडल के चीन के अन्दर की क्या वस्तुस्थिति है ?
जो जानकारी मिल रही है , उससे पता चलता है कि चीन का विकास और औद्योगीकरण मुख्यरूप से हांग्कांग से लगे चीन के पूर्वी तटीय इलाकों तक सीमित है । चीन के गाँवों में और चीन के विशाल मुख्य भूमि में गरीबी , बेरोजगारी व गैरबराबरी बहुत तेजी से बढ़ रही है तथा बड़े पैमाने पर विस्थापन और पलायन हो रहा है । भारत की तरह बड़ी संख्या में आत्महत्याएं भी हो रही हैं । कारखानों और खदानों में काम करने की दशाएं बहुत खराब हैं ।दुनिया में खनन और औद्योगिक दुर्घटनाओं स्बसे ऊँची दर चीन में है । भारत से भी ज्यादा दुर्घटनाएं वहाँ हो रही हैं । संपत्ति व आय के वितरण में भी गैरबराबरी चीन में भारत से ज्यादा हो चुकी है । पूरे चीन में जबरदस्त जन-असंतोष खदबदा रहा है , जिसे केन्द्रीय सत्ता की तानाशाही के चलते दबाकर रखा गया है । वर्ष २००५ में पूरे चीन में ८७,००० विरोध प्रदर्शन हुए , यह आंकड़ा स्वयं चीन सरकार की सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय का है । क्या यही हमारा मॊडल है ?
शायद , वैश्वीकरण की नई व्यवस्था में गरीब देशों का कोई ‘विकास’ हो सकता है,तो वह इसी तरह का होगा । थोड़े लोगों और थोड़े इलाकों में बहुत गतिविधियाँ , स्मृद्धि और शान-शौकत दिखाई देगी । लेकिन बाकी विशाल इलाके की विशाल आबादी कंगाली , जाहिली , बेरोजगारी ,विस्थापन व पलायन की पीड़ा भोगने को अभिशप्त होगी । आधुनिक पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता की यह खूबी की यह खूबी है कि इसमें सबका विकास नहीं हो सकता । लेकिन बाकी लोगों की कीमत पर कुछ लोग व कुछ इलाके विकास व समृद्धि की अभूतपूर्व उचाइयां हासिल कर सकते हैं । इस पूंजीवाद ने पहले दुनिया में बडे-बडे उपनिवेश बनाये थे । फिर उपनिवेश आजाद होने पर नव-औपनवेशिक तरीकों से उनका शोषण जारी रखा । नव-औपनिवेशिक लूट के साथ -साथ देशों के अन्दर भी उपनिवेश बनने की प्रक्रिया निरंतर चल रही है । इससे देश के अंदर भी गैरबराबरी व शोषण तेजी से बढ़ेगा ,जो अन्तर्राष्ट्रीय सम्राज्यवादी शोषण का पूरक होगा और मददगार होगा। ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ भी इस आंतरिक उपनिवेश और बाहरी उपनिवेश वाली द्वन्द्वात्मक व्यवस्था का एक नया औजार है। यही इसका असली रूप और इसकी असली भूमिका है ।
प्रस्तुतकर्ता
अफ़लातून
पर
2:52 pm
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लेबल: corporatisation, fdi, globalisation, sez
शनिवार, दिसंबर 30, 2006
भारत भूमि पर विदेशी टापू : ले. सुनील
भारत भूमि पर विदेशी टापू : ले. सुनील
अचानक इस देश में ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ ( Special Economic Zones ) की बाढ़ आ गयी है। हरियाणा व पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल तक और गुजरात से ले कर हिमाचल प्रदेश तक नए - नए ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के प्रस्ताव स्वीकृत होने और बनने की खबरें आ रही हैं। अभी तक कुल १६४ प्रस्ताव केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत किए जा चुके हैं। भारत के विकास , समृद्धि व प्रगति के नए सोपान और सबूत के रूप में इन्हें पेश किया जा रहा है। आखिर यह है क्या चीज ?
देश के निर्यात को बढ़ाने के लिए बनाए जा रहे इन क्षेत्रों की कल्पना चीन से आई है। यह चीन की राह का अनुकरण है। पहले भारत ने ‘ निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र ‘ बनाए थे। फिर पिछले दस वर्षों से सुविधाएं और रियायतें बढ़ाते हुए इन्हें ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ का नाम दिया गया। लेकिन इनमें तेजी तब आयी , जब पिछले वर्ष २००५ में देश की संसद में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लिए विधिवत एक कानून बना दिया गया तथा ९ फरवरी २००६ को वाणिज्य मंत्रालय ने इसकी अधिसूचना जारी कर दी।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ में स्थापित होने वाले निर्यात - आधारित उद्योगों को देश के करों और कानूनों से अनेक तरह की छूटें , सुविधाएं और मदद दी जाती है। इनकी परिभाषा ही यह है कि वे व्यापार करों व शुल्कों की दृष्टि से ‘ विदेशी क्षेत्र ‘ माने जाएंगे। भारत के नियम , कानून व कर वहाँ लागू नहीं होंगे। वे एक प्रकार से भारत सरकार की संप्रभुता से स्वतंत्र , स्वयम संप्रभू इलाके होंगे। यह माना जा रहा है कि अनेक विदेशी कंपनियाँ इन क्षेत्रों की ओर आकर्षित होंगी और उनके आने से भारत का निर्यात तेजी से बढ़ेगा। विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में भारत पिछड़ता जा रहा है। चीन भारत से बहुत आगे है। इन क्षेत्रों के बनने से वह कमी भी दूर हो जाएगी। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में करों में रियायतों की सूची लम्बी है। ये रियायतें इन क्षेत्रों में स्थापित होने वाले उद्योगों तथा क्षेत्र का विकास करने वाली कंपनियां , दोनों के लिए होगी। वस्तुओं और सेवाओं , दोनों को प्रदान करने वाली इकाइयों को छूट मिलेगी। आयकर में छूट पन्द्रह वर्ष के लिए होगी , जिसमें पाँच वर्ष तो शत - प्रतिशत छूट होगी और अगले पाँच वर्ष भी ५० प्रतिशत छूट होगी। विदेशों से मंगाए जाने वाले कच्चे माल या उपकरणों पर कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा। देश के अन्दर से खरीदी गई चीजों पर उत्पाद शुल्क नहीं लगेगा और केन्द्रीय बिक्री कर की राशि वापस कर दी जाएगी। लाभांश वितरण कर , न्यूनतम वैकल्पिक कर , पूंजीगत लाभ कर , ब्याज पर कर , बिक्री कर , वैट आदि में भी छूट दी गई है। इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों में सेवा कर भी माफ़ रहेगा। जिन उद्योगों में अभी विदेशी पूंजी निवेश पर सीमा है , जैसे बीमा , दूरसंचार या निर्माण , उनमें १०० प्रतिशत विदेशी शेयरधारिता की अनुमति भी दी जाएगी। लाइसेन्स आदि की झंझटों व प्रतिबन्धों से भी मुक्ति रहेगी। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में सस्ते कर्ज की सुविधा मिलेगी , सारी अनुमतियाँ एक जगह देने की एकल - खिड़की व्यवस्था बनाई जाएगी और विभिन्न प्रकार की निगरानी के लिए भी एक ही एजेन्सी होगी। बदले में बस एक ही शर्त रहेगी कि विशेष आर्थिक क्षेत्र की इकाइयों को कुल मिलाकर शुद्ध विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला होना चाहिए। वे सब आयात भी कर सकती हैं , किंतु उनके निर्यात , आयात से ज्यादा होने चाहिए। राज्य सरकार के करों व शुल्कों से विशेष आर्थिक क्षेत्रों की इकाइयों को मुक्त करने के लिए हरियाणा सरकार ने तो केन्द्रीय कानून की तर्ज पर ‘ हरियाणा विशेष क्षेत्र अधिनियम , २००५ ‘ भी पास कर लिया है।
करों व नियमों में ये छूटें न केवल विशेष आर्थिक क्षेत्रों के उद्योगों को होगी , बल्कि सेवाओं और व्यापार में भी मिलेगी। जैसे सूचना तकनालॊजी में। जो विदेशी बैंक अपनी शाखा वहाँ खोलेंगे , उनके मुनाफे पर टैक्स नहीं लगेगा। कोई कंपनी वहाँ बिजली कारखाना खोलेगी , तो उसे भी कर नही देना पड़ेगा। जो कंपनियाँ या फन्ड्स वहाँ स्थित नहीं हैं , किन्तु जिन्होंने वहाँ पूंजी लगाई है , उनके ब्याज व मुनाफ़े पर भी कर नहीं लगेगा। कुल मिलाकर ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ एक तरह के ‘ कर - स्वर्ग ‘ होंगे , जहाँ सरकार के करों और प्रतिबन्धों से पूरी आजादी होगी।
भारत के कम से कम दो दर्जन कानून विशेष आर्थिक क्षेत्रों में लागू नहीं होंगे। वहाँ के विवादों और मुकदमों के फैसला करने वाली अदालतें भी अलग होंगी। यद्यपि भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश के श्रम , बैंकिंग और शेयर बाजार के कानून वहाँ लागू होंगे , किन्तु देर - सबेर वहाँ श्रम कानूनों में छूट दी जाएगी, यह तय है। चीन के विशेष आर्थिक क्षेत्रों में आने का यह एक प्रमुख आकर्षण था कि चीन के श्रम कानून वहाँ लागू नहीं होते थे। ये कंपनियाँ चाहे जब मजदूरों को लगा व निकाल सकें , ठेका मजदूर या चाहे जिस रूप में मजदूरों को लगा सकें और चाहे जो मजदूरी दें - ये आजादी विशेष आर्थिक क्षेत्र में उनको हो इसकी वकालत भारत में भी की जा रही है . गुजरात और महाराष्ट्र की सरकारों ने तो आसान श्रम कानूनों की योजना बनाई भी है। खबर है कि छ; राज्य सरकारों ने केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के पास प्रस्ताव भेजा है कि इन क्षेत्रों में ‘ सरल ‘ श्रम कानूनों की अनुमति दी जाए। भारत के आर्थिक नक्शे पर चमकते हुए ये क्षेत्र मजदूरों के सबसे बुरे शोषण के क्षेत्र भी हो सकते हैं। इसी प्रकार , पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण - रोकथाम के नियमों को भी इन क्षेत्रों में ताक पर रखा जा सकता है।इस प्रकार से अब देश दो भागों में बंट जाएगा। एक ‘घरेलू शुल्क क्षेत्र ‘ जहाँ देश के कानून लागू होंगे ,दो ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ जो देश के कानूनों , नियमों व लोकतांत्रिक प्रशासन से परे व ऊपर होंगे .
ये विशेष आर्थिक क्षेत्र १० हेक्टेयर से ले कर हजारों हेक्टेयर के हो सकते हैं। कोई ऊपरी सीमा नहीं है और रिलायन्स के कुछ विशेष आर्थिक क्षेत्र तो १५ हजार हेक्टेयर तक के विशाल भूभाग में बन रहे हैं। ये विशेष आर्थिक क्षेत्र किसी एक वस्तु या सेवा पर केन्द्रित भी हो सकते हैं और अनेक वस्तुओं या सेवाओं के भी हो सकते हैं। भारत सरकार द्वारा तय नियमों के मुताबिक अनेक वस्तुओं के उद्योगों वाले ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ का न्यूनतम क्षेत्रफल १००० हेक्टेयर होना चाहिए। एक वस्तु या सेवा के क्षेत्र ( जैसे हीरा - जवाहरात या जैव - तक्नालाजी या सूचना तकनालाजी ) न्यूनतम १० हेक्टेयर तक भी हो सकते हैं।
भारत सरकार ने यह भी छूट दी है कि इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के कुल क्षेत्रफल में उद्योगों की इकाइयों का क्षेत्रफल ३५ प्रतिशत से ज्यादा करने की बाध्यता नहीं होगी। दूसरे शब्दों में ६५ प्रतिशत तक जमीन पर आवासीय कालोनी , रेस्तराँ , मल्टीप्लेक्स , मनोरंजन केन्द्र , शापिंग माल , गोल्फ़ कोर्स , हवाई अड्डा , स्कूल , अस्पताल आदि बनाये जा सकते हैं। कहने को तो ये सुविधाएं ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ के अन्दर के उद्योगों व इकाइयों में कार्यरत मजदूरों व कर्मचारियों के लिए होगी , किन्तु क्षेत्र के बाहर के लोगों को भी इनका इस्तेमाल करने से रोकने का कोई तरीका तो नही होगा। इसका मतलब यह भी है कि निर्यात संवर्धन की आड़ में कई अन्य धन्धे भी यहाँ पनप सकते हैं। महानगरों के पास सस्ती जमीन , करों में छूट और बाहर से सीमेन्ट , इस्पात , लिफ्ट , बिजली उपकरण आदि चीजें निशुल्क आयात करने की सुविधा के कारण कई जमीन - जायदाद का धन्धा करने वालि निर्मान कंपनियों के लिए भी ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ का आकर्षण बढ़ गया है। राहेजा , यूनिटेक , डीएलेफ़ , युनिवर्सल आदि ऐसी ही कंपनियां हैं जो ‘ विशेष आर्थि क्षेत्र बनाने तथा विकसित करने के लिए आगे आ गयी हैं।
इसी प्रकार , विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून में विनिर्माण की परिभाषा इतनी व्यापक रखी गयी है कि उसमें रेफ्रिजरेशन ( प्रशीतन ) , रंगाई , कटाई , मरम्मत करना , पुननिर्माण , पुन: इंजीनियरिंग आदि को भी विनिर्माण मान लिया गया है। इसका मतलब है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र में वास्तविक उत्पादन न हो कर कहीं और हो , सिर्फ वहाँ एक मामूली गतिविधि की इकाई डालकर तमाम कर-छूटों का लाभ उठाया जा सकता है।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ बनाने के लिए कोई भी सरकारी या निजी कंपनी आवेदन कर सकती है। राज्य सरकार से सहमति लेने के बाद केन्द्र सरकार को आवेदन किया जा सकता है। इन आवेदनों पर शीघ्र फैसला लेने के लिए , इसे काफ़ी प्राथमिकता देते हुए भारत सरकार ने रक्षा मन्त्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता मे मन्त्रियों की एक समिति बना दी है , जिसे ‘ मन्त्रियों का अधिकार प्राप्त समूह ‘ नाम दिया गया है। इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के लिए जमीन हासिल करने का काम वैसे तो इन्हें विकसित करने वाली कंपनियों को स्वयं खुले बाजार में करना चाहिए। लेकिन इन्हें सुविधा देने की होड़ में लगी राज्य सरकारें स्वयं भूमि अधिग्रहित करके सस्ती दरों पर इन्हें दे रही हैं। बाजार की प्रचलित दरों से काफी कम दरों पर जमीन मिलने से इन कंपनियों की पौ-बारह हो गयी है।
खूब कमाई , करों से मुक्ति , सस्ती जमीन आदि कारणों से ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ बनाने के लिए अचानक दौड़ व होड़ मच गयी है। विशेष आर्थिक क्षेत्र का कानून बनने से पहले भारत में पन्द्रह विशेष आर्थिक क्षेत्र काम कर रहे थे - कांडला , सूरत , मुम्बई , कोच्चि , नोएडा , विशाखापत्तनम , इन्दौर , जयपुर , फाल्स , मनिकंचन , साल्ट लेक , और चेन्नई में तीन। अब लगभग १६४ नए प्रस्ताव केन्द्र सरकार स्वीकृत कर चुकी है। इनमें ‘ तेल व प्राकृतिक गैस आयोग ‘ तथा ‘ गुजरात औद्योगिक विकास विगम ‘ के प्रस्तावों को छोड़ कर बकी सब निजी कंपनियों के प्रस्ताव हैं। देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की रिलायंस कम्पनी इनमें सबसे आगे है जिसके द्वारा नवी मुम्बई , हैदराबाद , गुड़गाँव (हरियाणा) और जामनगर (गुजरात) में विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं। कलकत्ता के पास बनाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार से भी उसकी वार्ता चल रही है। एस्सार , भारत फोर्ज , अदारी , विप्रो , सत्यम , बायोकोन , बजाज , नोकिया , केदिला , डा. रेड्डी आदि उद्योग जगत के अनेक बड़े नाम विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने में लग गए हैं। दिल्ली से नजदीकी के कारण हरियाणा व पंजाब में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लगभग ५० प्रस्ताव आ चुके हैं। मात्र गुड़गाँव के पास १२ विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के प्रस्ताव हैम , जिनमें आठ को स्वीकृति मिल चुकी है। गुजरात में १९ विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लगभग ५० प्रस्ताव विचाराधीन हैं। यह दावा किया जा रहा है कि जो १४८ प्रस्ताव पहले स्वीकृत हुए हैं , वे कुल ४०,००० हेक्टेयर (अर्थात एक लाख एकड़) क्षेत्र में फैले हुए होंगे और उनमें १,००,००० करोड़ रुपए का पूंजी निवेश होगा तथा उससे लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ के नाम पर ये उम्मीदें , दावे और खुशफ़हमियाँ काफ़ी सन्देहास्पद हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि निर्यात - संवर्धन के नाम पर बनाए जा रहे इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किसानों और गाँवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है तथा उन्हें उजाड़ा जा रहा है। मुम्बई के पास नवी मुम्बई से लगा ३५००० एकड़ का रिलायन्स का ‘ महामुम्बई विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ तो इतना विशाल है कि यह मुम्बई महानगर के एक तिहाई क्षेत्रफल के बराबर है। इनमें ४५ गाँवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है। एक बार पहले ८० के दशक में ‘नवी मुम्बई’ बनाने के लिए वहाँ विस्थापन हो चुका है। यह दूसरा विस्थापन है। इससे अनेक किसान ,मछुआरे , नमक - मजदूर और अन्य गाँववासी बरबाद हो जाएंगे। उनकी जमीन की कीमत लगभग २० से ४० लाख रुपये प्रति एकड़ है , किन्तु महाराष्ट्र सरकार सवा लाख से लेकर १० लाख रु. एकड़ की दर से उनकी जमीन ले कर रिलायन्स को देने की कोशिश में लगी है। यह कहा जा रहा है कि यह दुनिया क सबसे बड़ा ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ होगा। किन्तु उस क्षेत्र के लोगों के लिए तो यह सबसे बड़ा संकट बन गया है। इस प्रोजेक्ट का विरोध करने के लिए उन्होंने ‘ महामुम्बई शेतकरी संघर्ष समिति ‘ का गठन कर लिया है और विरोध में आन्दोलन शुरु कर दिया है। [ जारी ]
प्रस्तुतकर्ता
अफ़लातून
पर
9:11 am
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लेबल: corporatisation, fdi, globalisation, sez
बुधवार, दिसंबर 20, 2006
कुछ और विशेष क्षेत्र : ले. राजकिशोर ( सामयिक वार्ता में )
कुछ और विशेष क्षेत्र : ले. राजकिशोर ( सामयिक वार्ता में )
सामयिक वार्ता/नवंबर,२००६ से लिया गया .
व्यंग्य
मुझे लगता है , भारत सरकार हमेशा अधूरा काम करती है . उसने राजनीतिक आजादी दी , पर आर्थिक आजादी देना भूल गयी .दलितों और पिछड़ों को आरक्षण दिया , पर पिछड़े वर्गों को इससे वंचित रखा . हिन्दी को राजभाषा बनाया , पर अंग्रेजी को छुआ तक नहीं . विशेष आर्थिक क्षेत्र , जहाँ पूँजीपतियों के हित में सभी कानूनों को स्थगित कर दिया जाएगा , बना कर सरकार अधूरे काम करने की अपनी परंपरा को ही निभा रही है . बाद में उसे अनेक विशेष क्षेत्र बनाने होंगे , इसका उसे खयाल तक नही है . देशप्रेमी होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि मैं उन विशेष क्षेत्रों को अभी से रखांकित कर दूं , जिनका निर्माण करने की जरूरत है .
विशेष राजनीतिक क्षेत्र : राजनीतिक दलों और उनके नेताओं का आचरण देख कर लग रहा है कि देश का वातावरण उनकी भावनाऒं के अनुकूल या काफी नहीं रह गया है . कहीं पुलिस आड़े आ जाती है , कहीं सीबीआई जाँच करने लगती है . कभी लोक सभा से इस्तीफा देना पड़ जाता है , कभी विधान सभा से . ऐसे में कोई राजनीति क्या करेगा ? अत: राजनीतिग्यों के लिए जगह - जगह विशेष क्षेत्र बनाने चाहिए . इन क्षेत्रों में देश का कानून लागू नहीं होगा - आर्म्स एक्ट भी नहीं . यहाँ न थाने होंगे , न न्यायालय . वोट देने - लेने का तो सवाल ही नही उठता . जो सबसे मजबूत होगा , उसी का राज चलेगा . उसी को इस क्षेत्र का जन प्रतिनिधि माना जा सकेगा और वह जब चाहे , संसद में आ-जा सकेगा .
विशेष सांस्कृतिक क्षेत्र : संस्कृति के क्षेत्र में बहुत अराजकता दिखाई दे रही है . कोई सबको गेरुए वस्त्र पहनाना चाहता है , कोई कम से कम कपड़े पहन कर भारत के वस्त्र उद्योग को नष्ट कर रहा है,तो कोई रोज कम से कम एक बलात्कार से कम पर राजी नहीं है . जाहिर है कि इन सभी को विशेष सांस्कृतिक क्षेत्रों की जरूरत है . इन क्षेत्रों में लोगों को अपनी सांस्कृतिक रुचि के अनुसार जीने की पूरी छूट होगी वे चाहें तो दिन भर सड़कों पर घूमते हुए गाएँ - बजाएँ या शराब पी कर धुत रहें . कामुक चित्रों , संगीत , साहित्य , देह प्रदर्शन - किसी भी चीज पर रोक नहीं होगी . यहाँ तक कि नग्न हो कर विचरण करने का भी बुरा नहीं माना जाएगा . लोग चाहें तो ऐसे प्रयोग भी कर सकते हैं जिनके बारे में अभी तक सोचा भी नही गया है . विदेशी पर्यटक यहाँ खूब आएँगे , क्योंकि
यहाँ उन्हें वे आजादियाँ हासिल होंगी जो उनके अपने देश में भी उपलब्ध नहीं हैं . इससे हमारा जीडीपी ०.३४ प्रतिशत बढ़ेगा .
विशेष धार्मिक क्षेत्र : विशेष धार्मिक क्षेत्र का सृजन कर हम देश की अनेक धार्मिक समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं . कुछ हिंदुओं को शिकायत है कि भारत की व्यवस्था वेद - शास्त्र के प्रावधानों के मुताबिक नहीं चल रही है . सिखों और इसाइयों की अपनी - अपनी समस्याएँ हैं.इन शिकायतों के निवारण का एक ही तरीका है - विशेष धार्मिक क्षेत्रों की स्थापना . प्रत्येक धर्म के अनुयाइयों को अपना विशेष धार्मिक क्षेत्र बनाने की आजादी होगी . यहाँ का समाज धर्माचार्यों के निर्देशों के अनुसार चलेगा . मसलन हिन्दू क्षेत्र में मनुस्मृति क्षेत्र में चोरी करनेवाले का हाथ काट लिया जाएगा . दोनों क्षेत्रों में स्त्रियों को परदे में रहना होगा . सिख चाहे जितनी नंगी तलवार ले कर चल सकते हैं . इत्यादि - इत्यादि .
विशेष लाल - क्षेत्र : आदि काल से फलते - फूलते आए यौन व्यवसाय पर जब से सरकार ने रोक लगाई है , यौनकर्मियों के साथ - साथ रसिक नागरिकों का सुखपूर्वक जीना दूभर हो गया है . उनका कहना है कि लादा हुआ संयम संयम नही है . यौनकर्मियों का कहना है कि हमारे शरीर पर हमारा ही अधिकार न हो . यह कैसा न्याय विधान है ? कानूनी रोक के कारण बिजनेस तो मंदा नहीं पड़ा है . पर पुलिस वालों और स्थानीय गुण्डों को उनका हिस्सा देना पड़ता है .देश में जगह - जगह विशेष लाल क्षेत्र बना देने से नागरिकों और नागरिकाओं , दोनों का भला होगा . इस क्षेत्र में शारीरिक क्रीड़ा की विभिन्न भंगिमाओं के लिऎ खुली छूट होगी . रात चाहे कितनी गयी हो , किसी नागरिक से यह नहीं पूछा जाएगा कि वह कहाँ से आ रहा है या कहाँ जा रहा है . नागरिकाओं को उनके कंज्यूमर - फ़्रेंडलीनेस के लिए परेशान नही किया जाएगा .
प्रस्तुतकर्ता
अफ़लातून
पर
6:26 pm
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