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गुरुवार, फ़रवरी 15, 2007

'दो तिहाई आबादी को होगी पानी की किल्लत'


साभार : बीबीसी-हिन्दी

संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अगले बीस वर्षों में दुनिया की दो तिहाई आबादी को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ेगा.
संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन का कहना है कि दुनिया की आबादी जिस गति से बढ़ रही है, उससे दोगुनी दर से पानी की खपत बढ़ रही है.
यह चेतावनी संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन में जलस्रोत विकास और प्रबंधन विभाग की ज़िम्मेदारी संभाल रहे विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर जारी की गई है.
विभाग के प्रमुख पास्कल स्टेदुटो ने जलस्रोतों के संरक्षण के लिए स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करने की अपील की है.
अभी दुनिया में एक अरब से अधिक आबादी को रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त स्वच्छ पानी नहीं मिल पा रहा है.
साथ ही ढ़ाई अरब से अधिक लोगों को पर्याप्त साफ सफाई की सुविधा नहीं मिल रही है.
तालाबों, नदियों और भूमिगत जलस्रोतों से मिल रहे स्वच्छ पानी का दो तिहाई से अधिक हिस्सा खेती में ही इस्तेमाल हो रहा है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि दुनिया के कई हिस्सों में किसान उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे ज़्यादा से ज़्यादा पानी हथियाने की मुहिम भी शुरू हो गई है.
किसानों को सलाह दी गई है कि वे बारिश के पानी का इकठ्ठा रखने पर ज़ोर दें और सिंचाई के दौरान पानी की बर्बादी रोकें.

बुधवार, नवंबर 22, 2006

दोषसिद्ध रंगभेद

किन्हीं उपभोक्तावादी उत्पाद की निर्माता कम्पनी की मंशा यदि पूरी दुनिया के बाजार पर छा जाने की हो तब क्या वे रंगभेद का पालन कर सकती हैं ? सरसरी तौर पर सोचने पर लगेगा कि वे किसी भी समूह से भेद-भाव करने से बचने का प्रयास करेंगी . लेकिन ऐसा सोचना सच्चाई से परे है.
कोका - कोला कम्पनी के अटलान्टा , अमेरिका स्थित मुख्यालय के काले कर्मचारियों ने १९९९ में कम्पनी के ख़िलाफ़ रंग भेद का मुकदमा दाखिल किया . अपने दावे को साबित करने के लिए इन कर्मचारियों ने दमदार आंकडे और किस्से प्रस्तुत किए . मसलन १९९८ में अफ़्रीकी - अमेरिकी कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ४५,२१५ डॊलर थी जबकि गोरे कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ७२,०४५ डॊलर थी . हांलाकि अफ़्रीकी-अमेरिकी कर्मचारी कुल संख्या का १५ फ़ीसदी हैं पर्न्तु सर्वोच्च वेतनमान में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है . कोका - कोला कम्पनी में पदोन्नति के लिए मूल्यांकन में व्यवस्थापकों के व्यक्तिपरक विवेक की अत्यधिक गुंजाइश की छूट है , जिसके फलस्वरूप मूल्यांकन में रंगभेद प्रकट होता है . इस मूल्यांकन पद्धति के कारण ही ऊपर के वेतनमानों में काले लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है . कोका - कोला के अधिकारी कई महीनों तक इन आरोपों को नकारते रहे .
अप्रैल , २००० में तीस मौजूदा व पूर्व कर्मचारियों ने अपने मुकदमे के प्रचार तथा विवाद के न्यायपूर्ण निपटारे की मांग के साथ कम्पनी के अटलांटा स्थित मुख्यालय से एक बस पर सवार हो कर ‘ न्याय - यात्रा ‘ निकाली .यात्रा विलिमिंग्टन तक की थी जहां कम्पनी के शेयरधारकों की वार्षिक बैठक होने वाली थी . कोका - कोला कम्पनी ने अन्तत: १९ करोड ३० लाख डॊलर पर समझौता कर लिया . अमेरिकी रंगभेद - मुकदमों के इतिहास में यह सबसे बडी समझौता राशि है . समझौते के तहत पीडित कर्मचारियों को ११ करोड ३० लाख डॊलर , काले कर्मचारियों के वेतन बढाने के लिए ४ करोड ३५ लाख डॊलर , कम्पनी के नियुक्ति एवं पदोन्नति कार्यक्रम के मूल्यांकन व नियंत्रण के मद में ३ करोड ६० लाख डॊलर तथा वादी के कानूनी खर्च के मद में दो करोड डॊलर देने पडे .
दक्षिण अफ़्रीका में जब रंगभेद चरम पर था तथा उस पर दुनिया के सभी देशों ने ‘ व्यापारिक प्रतिबन्ध ‘ लगा दिए थे तब भी पेप्सीको व कोका - कोला द्वारा अपने पेय वहां भेजे जा रहे थे . बर्मा में लोकतंत्र बहाली आन्दोलन की नेता आंग सांग सू की द्वारा तानाशाही शासन का व्यावसायिक बहिष्कार करने की अपील के तहत कुछ संगठनों ने अभियान चलाया था . पेप्सीको द्वारा लम्बे समय तक बर्मा में व्यवसाय जारी रखने को मुद्दा बना कर उसके उत्पादों के बहिष्कार का अभियान भी इन संगठनों ने चलाया था . कम्पनी ने बदनामी से बचने के लिए अमेरिकी विदेश नीति का हवाला दे कर बर्मा से अन्ततोगत्वा कामकाज समेट लिया .
अन्तरराष्ट्रीय खाद्य मानकों में कचरा खाद्य खेमे की दख़ल : अगली प्रविष्टि

सोमवार, नवंबर 20, 2006

स्कूलों में शीतल पेय

बच्चों के स्वास्थ्य पर शीतल पेयों के प्रभाव के सन्दर्भ में अमेरिकी बाल-रोग अकादमी का नीति वक्तव्य के प्रमुख अंश :
” अधिक मात्रा में शीतल पेय पीने से उत्पन्न स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए स्कूल बोर्डों को एहतियात के तौर पर इनकी बिक्री पर रोक लगानी चाहिए.बच्चों की रोजाना खुराक में ये पेय अतिरिक्त चीनी का मुक्य स्रोत हैं . इन पेयों के १२ आउन्स के एक टिन अथवा मशीन से परोसी गयी इतनी ही मात्रा में १० चम्मच चीनी का प्रभाव रहता है . ५६ से ८५ प्रतिशत स्कूली बच्चे हर रोज कम से कम एक बार यह पेय अवश्य पीते हैं . शीतल पेय पीने की मात्रा बढने के साथ - साथ दूध पीने की मात्रा घटती जाती है . इन चीनीयुक्त शीतल पेयों के पीने से मोटापा बढने का सीधा सम्बन्ध है.मोटापा आज-कल अमेरिकी बच्चों की प्रमुख समस्या है . अन्य बीमारियों में दांतों में गड्ढे पडना तथा दंत वल्क का क्षरण प्रमुख हैं . स्कूल स्थित दुकानों , कैन्टीनों व खेल - कूद आदि के मौकों पर यह उत्पाद सर्वव्यापी हो जाते हैं . स्कूलों की आय का पर्याप्त प्रमाण इन पेयों की बिक्री से आता है परन्तु इनके विकल्प के तौर पर पानी , फलों के रस तथा कम-वसा युक्त दूध बिक्री हेतु मुहैया कराया जा सकता है ताकि आमदनी भी होती रहे.”
इस नीति में इस बात का संकल्प भी है कि बाल-रोग चिकित्सक स्कूलों से इन मीठे शीतल पेयों के खात्मे के लिए प्रयत्न करेंगे . इसके लिए यह जरूरी होगा कि वे स्कूल के प्रशासनिक अधिकारियों , अपने मरीजों व अभिवावकों को शीतल पेय पीने के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षित करें .
इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि स्कूली-बच्चों तथा किशोरों पर शीतल पेयों के दुष्प्रभावों की बाबत अपनी बिगडी छवि में सुधार के लिए इन कम्पनियों ने ‘अमेरिकी बाल दन्त चिकित्सा अकादमी ‘ नामक संगठन को १० लाख डॊलर का अनुदान दे दिया तथा ‘राष्ट्रीय शिक्षक अभिवावक सम्घ’ की भी अनुदान दाता बन गयीं . बाल सरोकारों वाले ऐसे सम्मानित समूहों के साथ तालमेल बैठाने के बावजूद स्कूलों में शीतल पेयों के विरुद्ध अभियान जो पकड रहा है . कैलीफोर्निया राज्य ने एक कानून बना कर स्कूलों में कचरा खाद्य और शीतल पेयों पर लगा दी है . बीस अन्य राज्यों द्वारा ऐसी रोक लगाने पर विचार विमर्श शुरु हो चुका है.फिलादेल्फिया के स्कूल डिस्ट्रिक्ट के तहत २,१४,०० विध्यार्थी आते हैं.यहां की बोर्ड ने फैसला किया है कि इन स्कूलों में १ जुलाई २००४ से इन पेयों की जगह अब फलों के रस , पानी तथा दूध की बिक्री होगी .
[कोला कम्पनी द्वारा श्रमिकों की हत्या और उत्पीडन : अगली प्रविष्टि ]

रविवार, नवंबर 19, 2006

पानी की जंग : गोलबन्दिय़ां

तीसरी दुनिया के देशों में पानी के निजीकरण की कोशिशों को जनता के तीव्र प्रतिरोध का सामना करना पड रहा है.इन तीन बडी कम्पनियों ने आपस में तालमेल बनाया है तथा निजीकरण की पक्षधर नीति के निर्धारण हेतु विश्व बैंक और अमीर देशों की आर्थिक मदद से इन कम्पनियों ने कई गठबंधन बना रखे हैं.हर तीन साल पर आयोजित होने वाले विश्व जल मंच (वर्ल्ड वॊटर फोरम) के आयोजन में इन संगठनों की मुख्य भूमिका होती है . व्यापार जगत और सरकारों के नीति निर्धारकों के इस जमावडे में भी आन्दोलनकारियों ने विरोध की आवाजें बुलन्द की हैं.पिछले साल मार्च महीने में जापान के क्योटो शहर में दुनिया भर के जन-आन्दोलनों के प्रतिनिधियों ने माइक कब्जे में ले कर निजीकरण के दुष्परिणामों की दास्तान सुनाई.मेक्सिको के कान्कुन शहर का एक आन्दोलनकारी अपने हाथ में काला और बदबूदार पानी से भरा गिलास ले कर मंच पर चढ गया.उसने बताया कि यह पानी वह अपने घर की टोटी से भर कर लाया है और उस नगर निगम का की जल - आपूर्ति सुवेज कम्पनी द्वारा होती है.उसने आयोजकों से निवेदन किया कि सुवेज के मुख्य कार्यपालक अधिकारी को मंच पर निमंत्रित कर वह गन्दा व बदबूदार पानी पीने को कहा जाए.
पानी व्यवसाय की यह बडी कम्पनियां अब रणनीति बदल रही हैं तथा उत्तरी अमेरिका व यूरोप के ज्यादा सुरक्षित बाजार में निवेश कर रही हैं.संयुक्त राज्य अमेरिका की जल आपूर्ति की सेवा का पचासी प्रतिशत अभी भी सार्वजनिक क्षेत्र में है. इन तीन बडी कम्पनियों ने आगामी दस सालों में अमरीका की सत्तर फ़ीसदी जल-आपूर्ति-सेवा पर कब्जा करने का लक्ष्य रखा है.अमरीका के छोटे कस्बों और समुदायों के बीच जल आपूर्ति करने वाली कई कम्पनियों को इन तीन बडी कम्पनियों ने खरीद लिया है.
छोटी-छोटी कम्पनियों के विलय से बनी विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनी जब नगर निगमों की जल -आपूर्ति अपने हाथों में लेती है तब ऐसा लगता है कि यह सिर्फ़ स्थानीय समस्या है.परन्तु इन्हीं कार्पोरेट खिलाडियों द्वारा दुनिया भर में लोगों के साथ करतूतें की जा रही है उसके मद्दे नजर जनता को भी आपस में सम्पर्क बढाना चाहिए तथा समन्वय बनाना चाहिए ताकि हम एक-दूसरे के अनुभवों से सीख ले सकें तथा सीधे हमले की शुरुआत कर सकें.
हमारी स्थानीय कार्रवाइयां तीन जागतिक उसूलों से संचालित होनी चाहिए.पहला उसूल है कि जल संरक्षण की आवश्यकता व पानी की कमी को हल्के में नहीं लिया जा सकता . पानी कहीं प्रचुर है तो कहीं इसका घोर अभाव है इसलिए जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी.पानी एक मौलिक मानवाधिकार है ,यह दूसरा उसूल है.जीने के लिए पानी जरूरी है.सभी लोगों को समानरूप से पानी मिलना चाहिए उसकी कीमत चुकाने की औकात से नहीं . तीसरा सिद्धान्त जल- लोकतंत्र का है.अपने सबसे मूल्यवान संसाधन की जिम्मेदारी हम सरकार में बैठे नौकरशाहों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कत्तई नहीं सौंप सकते हैं . इन लोगों की नीयत भले ही अच्छी हो अथवा बुरी. हमें इस बुनियादी उसूल को बचाना होगा,उसके लिए संघर्ष करना होगा तथा अपनी उचित भूमिका निभाते हुए जल-लोकतंत्र की मांग करनी होगी.

शुक्रवार, नवंबर 17, 2006

पानी की जंग ( गतांक से आगे )

विश्वव्यापार संगठन के सेवाओं के व्यापार से सम्बन्धित नियम भी जल आपूर्ति के निजीकरण को बढावा देंगे.इन नियमों के तहत सभी देशों पर न सिर्फ़ सार्वजनिक जल-प्रणालियों से सरकारी नियंत्रण हटाने और निजीकरण करने का दबाव होगा अपितु किसी शहर की जल वितरण प्रणाली यदि किसी विदेशी कम्पनी के हाथों चली जाती है तो उसे वापस जनता के नियंत्रण में लेना विश्वव्यापार संगठन द्वारा भारी जुर्माना न्योतना होगा.
पानी के निजीकरण की मुहिम की रहनुमाई यूरोप शित तीन विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कर रही हैं - विवेन्डी (फ़्रान्स ) , सुवेज (फ़्रान्स) , आर.डब्ल्यू.ई (जर्मनी).वर्ष २००१ में पानी से प्राप्त इनकी आमदनी क्रमश: ११.९० अरब , ८.८४ अरब तथा २.८ अरब डॊलर थी.इन तीनों कम्पनियों ने दुनिया भर के पानी व्यापार पर हावी होने के लिए छोटी - छोटी प्रतिद्वन्द्वी कम्पनियों को खरीद लिया है.शुरु में तीसरी दुनिया के पानी के संकट का तारनहार बनने की आस में तथा प्रयास में इन कम्पनियोंने सार्वजनिक जल वितरण व्यवस्था पर कब्जा जमाने की दूरगामी रणनीति बनाई.परन्तु तीसरी दुनिया के देशों में इनकी कोशिशों को मुंह के बल गिरना पडा और उनके इस अभियान की गाडी पटरी से उतर गयी.
ब्वेनॊस एरिस (अर्जेन्टीना की राजधानी) का प्रकरण विशेष रूप से सबक देने वाला था.तीसरी दुनिया में पानी के निजीकरण की यह महत्वपूर्ण योजना थी.सुवेज ने अपनी आनुषंगिक कम्पनी अगुआस अर्जेन्टीनास के द्वारा इस शहर की जल-आपूर्ति तथा सीवर व्यवस्था को अधिगृहीत किया.पुरानी पड चुकी वितरण व्यवस्था के नवीनीकरण हेतु सार्वजनिक क्षेत्र में धन का अभाव रहता है तथा निजी कम्पनियांकमी को पूरा कर सकती हैं-निजीकरण के पक्ष में यह तर्क आम तौर पर दिया जाता है.इस मामले में सुवेज कम्पनी के निजीकरण के प्रयोग हेतु आवश्यक एक अरब डोलर की ९७ फ़ीसदी पूंजी के हिस्से की पूर्ति विश्व बैक,अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष व अन्य छोटे बैंकों ने की.जल-आपूर्ति व सीवर व्यवस्था में मामूली बढोतरी के बावजूद सुवेज कम्पनी दोनों कार्यों में निर्धारित लक्ष्य प्राप्त नही कर सकी.यह गौरतलब है कि ९० के दशक के बीच के वर्षों में कम्पनी ने सालाना २५ फ़ीसदी मुनाफ़ा भी कमा लिया.हाल ही में सुवेज ने अर्जेन्टीना छोडने की घोषणा कर दी है.कम्पनी ने कहा है कि उस देश के मुद्रा संकट के कारण उसे कम मुनाफ़ा मिल रहा है.निजीकरण की योजनाएं जोहानस्बर्ग और मनीला में भी लडखडाई हैं.गंगा नदी से निकली गंग नहर से नई दिल्ली के सोनिया विहार में जल-आपूर्ति की योजना भी इसी सुवेज के हवाले है.सर्वाधिक प्रसिद्ध मामला दक्षिण अमेरिकी देश बोलिविया के एक बडे शहर कोचाबाम्बा का है.१९९९ में बेकटेल कम्पनी द्वारा इस शहर की जल -आपूर्ति की बागडोर संभालने के बाद पानी का रेट इतना बढ गया कि कई लोगों को अपनी आमदनी का बीस फ़ीसदी पानी के लिए खर्च करना पडा.नागरिकोख द्वारा इस फ़ैसले का तीव्र प्रतिकार हुआ.पुलिस दमन में छ; लोगों की मृत्यु हुई.अन्तत: सरकार ने बेकटेल कम्पनी से हुए करार को खारिज कर दिया और कहा कि यदि वह उस देश में टिकी रही तो उसकी सुरक्षा की गारण्टी लेने में सरकार असमर्थ होगी.

पानी की जंग , ले.- मॊड बार्लो , टोनी क्लार्क

[लेखक परिचय :
मॊड बार्लो - कैनेडा के सबसे बडे जनसंगठन ‘काउन्सिल ओफ़ कैनेडियन्स’ की अध्यक्षा.वैनकूवर ,टोरेन्टो तथा हेलिफैक्स शहरों में पानी के निजीकरण के विरुद्ध यह संगठन सक्रिय है.पानी के निगमीकरण पर टोनी क्लार्क के साथ लिखी गयी चर्चित पुस्तक ‘ब्लू गोल्ड’ की लेखिका.
टोनी क्लार्क - लोकतांत्रिक समाज परिवर्तन के संघर्ष्हेतु जन आन्दोलनों प्रशिक्षित करने वाली संस्था पोलारिस इन्स्टीट्यूट के निदेशक.वैश्वीकरण विरोधी आन्दोलन के नेता. ]
स्कूल में हमें पढाया जाता है कि पृथ्वी का जल-चक्र एक बन्द प्रणाली है . अर्थात वर्षा और वाष्पीकरण द्वारा सतत रूप बदलता पानी पृथ्वी के वातावरण में जस का तस बना हुआ है. न सिर्फ़ पृथ्वी के निर्माण के समय हमारे ग्रह पर जितना पानी था वह बरकरार है अपितु यह यह पानी वह ही है. जब कभी आप बरसात में टहल रहे हों तब कुछ रुककर कल्पना कीजिए - बूंदें जो आप पर गिर रही हैं कभी डिनासार के खून के साथ बहती होंगी अथवा हजारों बरस पहले के बच्चों के आंसुओं में शामिल रही होंगी.
पानी की कुल मात्रा बरकरार रहेगी फिर भी यह मुमकिन है कि इन्सान उसे भविष्य में अपने और पृथ्वी के उपयोग के लायक न छोडे.पीने के पानी के संकट की कई वजह हैं.पानी की खपत हर बीसवें साल में प्रति व्यक्ति दुगुनी हो जा रही है तथा आबादी बढने की तेज रफ़्तार से यह दुगुनी है. अमीर औद्योगिक देशों की तकनीकी तथा आधुनिक स्वच्छता प्रणाली ने जरूरत से कहीं ज्यादा पानी के उपयोग को बढावा दिया है.व्यक्तिगत स्तर पर पानी के उपयोग की इस बढोतरी के बावजूद घर - गृहस्थी तथा नगरपालिकाओं में मात्र दस फ़ीसदी पानी की खपत होती है.
दुनिया के कुल ताजे पानी की आपूर्ति का २० से २५ प्रतिशत उद्योगों द्वारा इस्तेमाल होता है.उद्योगों की मांग भी लगातार बढ रही है.सर्वाधिक तेजी से बढ रहे कई उद्योग पानी की सघन खपत करते हैं.मसलन सिर्फ़ अमरीकी कम्प्यूटर उद्योग द्वारा सालाना ३९६ अरब लीटर पानी का उपयोग किया जाएगा.
सर्वाधिक पानी की खपत सिंचाई में होती है.मानव द्वारा प्रयुक्त कुल पानी का ६५ से ७० फ़ीसदी हिस्सा सिंचाई का है.औद्योगिक खेती (कम्पनियों द्वारा खेती) में निरन्तर अधिकाधिक पानी की खपत के तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं.कम्पनियों द्वारा सघन सिंचाई वाली खेती के लिए सरकारों तथा करदाताओं द्वारा भारी अनुदान भी दिया जाता है . अनुदान आदि मिलने के कारण ही कम सिंचाई के तौर-तरीके के प्रति इन कम्पनियों को कोई आकर्षण नही नही होता.
जनसंख्या वृद्धि तथा पानी की प्रति व्यक्ति खपत में वृद्धि के साथ - साथ भूतल जल-प्रणालियों के भीषण प्रदूषण के कारण शेष बचे स्वच्छ और ताजे पानी की आपूर्ति पर भारी दबाव बढ जाता है.दुनिया भर में जंगलोंका विनाश , कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों से प्रदूषण तथा ग्लोबल वार्मिंग के सम्मिलित प्रभाव से पृथ्वी की नाजुक जल प्रणाली पर हमला हो रहा है.
दुनिया में ताजे पानी की कमी हो गयी है.वर्ष २०२५ में विश्व की आबादी आज से से २.६ अरब अधिक हो जाएगी.इस आबादी के दो-तिहाई लोगों के समक्ष पानी का गंभीर संकट होगा तथा एक तिहाई के समक्ष पूर्ण अभाव की स्थिति होगी.तब पानी की उपलब्धता से ५६ फ़ीसदी ज्यादा की मांग होगी.
दिनोंदिन बढती मांग और संकुचित हो रही आपूर्ति के कारण बडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की रुचि इस क्षेत्र में जागृत हुई है जो पानी से मुनाफ़ा कमाना चाहती हैं.विश्व-बैंक द्वारा पानी-उद्योग को एक खरब डॊलर के उद्योग के रूप में माना जा रहा है तथा बढावा दिया जा रहा है.विश्व बैंक द्वारा सरकारों पर दबाव है कि वे जल-आपूर्ति की सार्वजनिक व्यवस्था निजी हाथों में सौंप दें.पानी इक्कीसवीं सदी का ‘नीला सोना’ बन गया है.
उदारीकरण ,निजीकरण,विनिवेश आदि दुनिया के आर्थिक दर्शन पर हावी हैं.यह नीतियां ‘वाशिंगटन सहमति’ के नाम से जानी जाती हैं. पानी का निजीकरण इन नीतियों से मेल खाता है.यह दर्शन सरकारों को सामाजिक कार्यक्रमों की जिम्मेदारी तथा संसाधनों के प्रबन्धन से मुंह मोड लेने की सलाह देता है ताकि निजी क्षेत्र उनका स्थान ले लें.इस मामले में यह ‘सबके लिए पानी’ की प्राचीन सोच पर सीधा हमला है.
पानी के व्यवसाय से जुडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथ में सबसे जरूरी औजार विश्व व्यापार समझौते मुहैय्या कराते हैं.विश्व व्यापार संगठन और नाफ्टा (उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार सन्धि) जैसे बहुराष्ट्रीय प्रबन्ध निकाय पानी को व्यापार की वस्तु के रूप में परिभाषित करते हैं.नतीजन जो नियम पेट्रोल और प्राकृतिक गैस के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को संचालित करते हैं वे पानी पर भी लागू हो गये हैं.इन अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के तहत कोई भी देश पानी के निर्यात पर यदि प्रतिबन्ध लगाता है अथवा उसे सीमित करता है तो वह देश विश्वव्यापार संगठन की नाराजगी और निन्दा का भागी होगा . पानी के आयात से इन्कार किया जाना भी प्रतिबन्धित होगा.नाफ्टा सन्धि की एक धारा के तहत यदि कोई देश अपने प्राकृतिक संसाधनों का निर्यात शुरु करता है तो वह उस पर तब तक रोक नहीं लगा सकता जब तक वह संसाधन समाप्त न हो जाए.[ जारी ]