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बुधवार, मई 09, 2007

मौजूदा चुनाव के लोकतंत्र विरोधी संकेत

उत्तर प्रदेश का जनादेश स्पष्ट है । मुख्यधारा के किसी दल को बहुमत न देने के मामले में जनता भ्रमित नहीं है । १९९३ में सपा - बसपा गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद हुए सभी चुनावों के परिणामों से मौजूदा चुनाव अलग नहीं हुए हैं ।

प्रदेश के बड़े शहर होने के कारण आगरा , इलाहाबाद में २२ फ़ीसदी और बनारस में २९ - ३० फ़ीसदी मतदान की खबर मीडिया की मुख्यधारा में भी हल्की - फुल्की चर्चा का विषय जरूर बनी । चुनाव आयोग ने इस पर कहा ,

  1. गत चुनावों से १० - १५ फ़ीसदी ही कम वोट पड़ना चिन्ता की बात नहीं है ।
  2. चुनाव आयोग ने प्रवासी आबादी का जिक्र किया और कहा कि करीब ११ फ़ीसदी लोग अन्य सूबों में रोजगार या रोजी की तलाश में चले जाते हैं ।

नागालैण्ड और काश्मीर के सरहदी सूबों में कई चुनावों में बहिष्कार के आह्वान के बाद अत्यन्त कम मतदान होते थे । असम में केन्द्र की दमनकारी कांग्रेसी सरकार द्वारा नेल्ली जैसे नरसंहार के बाद कराए गए चुनाव का जनता ने बहिष्कार किया था । ६० वोट , १२२ वोट पाने वाले भी विधायक - मन्त्री बने थे और कांग्रेसी सुश्री अनवरा तैमूर मुख्यमंत्री बनी थीं ।जनता द्वारा इच्छित कम भागीदारी वाले इन चुनावों को लोकतंत्र की कमजोरी और कांग्रेस के फासीवादी रुझान का द्योतक माना गया था ।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत से चुनाव आयोग सिर्फ मतदाता परिचय पत्र के आधार पर मतदान कराने की बहादुरी से घोषणा कर रहा था ।अधिसूचना के बाद तक स्थानीय प्रशासन फोटो पहचान पत्र बनवाने में जुटा था । मतदान के बाद भी स्थानीय प्रशासन इस बार " २० फ़ीसदी हुए मतदान में ७३ या ८१ फ़ीसदी लोगों ने परिचय पत्र दिखा कर वोट दिए " जैसी घोषणा कर फूला नहीं समा रहा था ।

सन २००१ से भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए जा रहे फोटो पहचान पत्र संभाल कर रखने वाले जो लोग मतदाता सूची में नाम न होने के कारण मतदान से वंचित रहे उन पर स्थानीय प्रशासन और आयोग मौन है , अखबार और टे.वि. चैनल सरसरी तौर पर जिक्र कर कर्त्तव्य की इतिश्री मान ले रहे हैं तथा चुनावी दल पूरी तरह निश्चिन्त रहते हैं कि जिनके नाम हैं उन्हीं की चिन्ता की जाए ।

यह भी उल्लेखनीय है कि कि रोजगार की तलाश में पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से लोग मुम्बई -दिल्ली जाते हैं , शहरों से कम । जौनपुर और गाजीपुर जिलों की जनगणना रिपोर्ट से प्रवासन साफ झलकता है - इन जिलों में स्त्रियों की आबादी पुरुषों से अधिक है । चुनाव के यह महीने प्रवासियों के गाँव लौटने के भी महीने हैं ।

हिन्सा - मुक्त चुनाव कराने के लिए आयोग और प्रशासन की वाहवाही होना लाजमी है लेकिन मताधिकार से वंचित लाखों लोग जम्हूरियत के कमजोर होने की गवाही देते हैं ।

मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियों के अलावा सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया में ऐसा काफी कुछ था जो हमारे जैसे छोटे राजनैतिक दलों के खिलाफ़ था और भ्रष्टाचार और पूँजीपतियों से किए गए अकूत धन-राशि खर्च करने वाले बड़े दलों के हक में । जनता से संवाद के लिए आयोजित जन सभाओं के के लिए अनुमति देने की बाबत ऐसा ही कुछ हुआ । आयोग द्वारा बड़े दलों के बड़े नेताओं की सूची अपनी वेबसाईट पर डाल दी गयी थी । मुमकिन है कि इन दलों से यह सूची माँगी गयी हो । इस सूची में विश्वनाथ प्रताप - राज बब्बर का जनमोर्चा गौरतलब अपवाद था - मान्यताप्राप्त दल न होने के बावजूद इसके नेता भी सूची में थे । सूची में उल्लिखित नेताओं के सभा के लिए अनुमति दी जाती थी । अन्य दलों को दो चरणों के बीच की अवधि में ही सभा की अनुमति दी गयी । मसलन सातवें दौर ( ८ मई ) के चुनाव के लिए छठे दौर ( ३ मई ) के बाद यानी ३ से ६ मई तक ही सभाओं की इजाजत दी गयी। उसके पहले प्रशासन द्वारा यह कह दिया जाता था कि पुलिस बल की कमी के कारण अनुमति नहीं दी जा रही है ।

पोस्टर - बैनर - दिवाल लेखन पर रोक के कारण महीनों पहले से टेलिविजन , राष्ट्रीय पत्रिकाओं और अखबारों में भारी खर्च वाले विज्ञापन ही जनता को दृष्टिगोचर हुए । छोटे कस्बों के संवाददाताओं को स्पष्ट निर्देश था कि बिना विज्ञापन प्रेस विज्ञप्ति न लें , किसी प्रेस वार्ता में भाग न लें ।

चुनावी प्रक्रिया के बुनियादी अवयवों पर रोक का नतीजा लोकतंत्र को कमजोर करने वाले साधनों को सबल करता है । पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख माफिया गिरोहों के वास्तविक 'चुनाव खर्च' के तरीकों पर गौर करें । मुख्तार अन्सारी के कारिन्दे ज्यादा से ज्यादा शादियों में ' न्यौता देने ' और धन के अलावा अपने आका का सन्देश भी देते , ' जरूरत पड़ने पर और पैसा दिया जाएगा ' । बृजेश सिंह के भतीजे सुशील सिंह धानापुर के कई हार्वेस्टर कब्जे में ले कर मतदाताओं की मुफ़्त में कटनी करवा कर दिल जातना चाहा ।

चुनाव आयोग अथवा न्यायपालिका द्वारा चुनाव प्रक्रिया में कुछ तब्दीलियाँ की जाती रही हैं। सम्पत्ति और आपराधिक मामलों की बाबत शपथ पत्र देना इनमें प्रमुख है । इन पर आपत्ति करते हुए प्रतिवाद न किए जाने तक इन शपथ पत्रों में उल्लिखित तथ्यों की जाँच नहीं की जाती । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मुलायम सिंह यादव की सम्पत्ति की जाँच सी.बी.आई. द्वारा कराने का निर्देश एक कांग्रेसी की जनहित याचिका पर हुआ है , आयोग के कहने पर नहीं । यह उल्लेखनीय है कि डॉ. लोहिया की मृत्यु के समय उनके पास पार्टी के दौरों में काम आने वाली एक अटैची और किताबें बतौर निजी सम्पत्ति थीं । लोकसभा हेतु चुने के पहले तक लोहिया का निजी बैंक खाता भी नहीं था।

आपराधिक मुकदमों की बाबत जमा किए शपथ पत्रों की बाबत आयोग की गम्भीरता का उदाहरण लीजिए । वाराणसी के लोकसभा प्रतिनिधि राजेश मिश्रा ने नामांकन के वक्त बाहलफ़ कहा था कि उन पर कोई मुकदमें लम्बित नहीं हैं । उम्मेदवारों के शपथ-पत्र स्कैन कराके आयोग अपनी वेबसाइट पर देता है , इसे देखा जा सकता है । राजेश मिश्रा पर उस समय कम से कम बारह ऐसे मुकदमें लम्बित थे जो मुझ पर भी थे । इन अपराधों में हत्या के प्रयास , एक्स्प्लोसिव एक्ट , क्रिमिनल एमेन्डमेंट एक्ट और आगजनी की धारायें प्रमुख थीं। इन गंभीर अपराधों में हम '८६ - '८७ में लिप्त थे । आज तक इन मामलों की एक भी तारीख पर हम अदालत में नहीं गये और न ही इस वजह से हुसैन की तरह हमारी कुर्की का कभी आदेश हुआ । इसका जिक्र सिर्फ़ इसलिए कर रहा हूँ कि यह स्प्ष्ट हो जाए कि आयोग हलफनामों में दिये तथ्यों की जाँच नहीं करता । भारतीय दण्ड संहिता में राजनैतिक/आपराधिक यह दो भाग नहीं किए गए हैं - सभी मामले अपराध की कोटि में आते हैं । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा १४४ को तोड़ने पर भा.द.सं की धारा १८८ लगायी जाती है - शायद इसे 'राजनैतिक' माना जा सकता है । आन्दोलनों को दबाने के लिए शासन द्वारा फर्जी मुकदमे दायर किए जाते हैं तथा इनमें भा.द.सं की गम्भीर धारायें ही इस्तेमाल की जाती हैं ।

यह कुछ प्रसंग हैं जिनकी शिनाख्त लोकतंत्र के कमजोर होने के लक्षण के रूप में हम करते हैं ।

सोमवार, मई 07, 2007

सलमान खुर्शीद और चुनाव आयोग का मनमानापन , विभेद

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मुख्य निर्वाचन आयुक्त ,

भारत का निर्वाचन आयोग ,

नई दिल्ली .

महाशय ,

२२५ वाराणसी कैन्टोनमेन्ट विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची से हजारों वैध मतदाताओं के नाम गायब होने के सन्दर्भ में मैंने उप चुनाव आयुक्त,मुख्य निर्वाचन अधिकारी तथा जिला निर्वाचन अधिकारी को मतदान की पूर्व ज्ञापन दिए थे । गत लोक सभा निर्वाचन में वाराणसी जिले की मतदाता सूचियों में व्यापक गड़बड़ियों तथा हजारों मतदाता के आयोग द्वारा जारी परिचय पत्र धारक होने के बावजूद मतदाता सूची में नाम न होने के बारे में आयोग से कई शिकायतें दर्ज करायी गयी थीं ।

लोकसभा निर्वाचन के बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम डाकियों और डाकघर द्वारा कराया गया था । डाकियों द्वारा पतों की पुष्टि प्रमाणित किए जाने के बाद पोस्टमास्टर द्वारा प्रारूप ६ अग्रसारित किए गए थे । यह उल्लेखनीय है कि प्रारूप ६ मं परिवार के उन व्यक्तियों का हवाला भी दिया गया था जिनका सूची में नाम था । मतदाता पुनरीक्षण के इस दौर की पोस्टमास्टर द्वारा हस्ताक्षरित पावतियाँ मौजूद होने के बावजूद अद्यतन मतदाता सूची से हजारों नाम गायब थे । फलस्वरूप हजारों नागरिक मताधिकार से वंचित हो गए ।आयोग का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया गया था कि वाराणसी के स्थानीय दैनिकों में भारी संख्या में भरे हुए प्रारूप ६ जला दिए जाने की खबर छपी थी ।

आज के अखबारों में उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी के हवाले से सूचित किया गया है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी पाए जाने के कारण कायमगंज वि.स. क्षेत्र के ४५ मतदान केन्द्रों में मतदाता सूची की गड़बड़ी को ध्यान में रख कर पुनर्मतदान का आदेश हुआ है।उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा यह बताया गया है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष श्री सलमान खुर्शीद तथा उनकी पत्नी श्रीमती लुइस खुर्शीद के नाम भी मतदाता सूची से गायब थे तथा इन मतदान केन्द्रों में भी पुनर्मतदान होगा ।

मैं भारत के निर्वाचन आयोग में पंजीकृत गैर मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल समाजवादी जनपरिषद का प्रदेश अध्यक्ष हूँ मेरे हस्ताक्षरों से अधिकृत दल के उम्मीदवार गोरखपुर जिले के धुरियापार तथा कौड़ीराम विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं ।

२२५ वाराणसी कैन्टोन्मेन्ट विधासभा क्षेत्र की मतदाता सूची से मेरा, मेरी पत्नी डॉ. स्वाति तथा हजारों मतदाताओं के नाम ,आयोग द्वारा जारी मतदाता परिचय पत्र और जमा किए प्रारूप ६ की हस्ताक्षरित पावती रसीदें होने के बावजूद गायब हैं तथा ३ मई को हुए चुनाव में इस प्रशासनिक तृटि के कारण हम मताधिकार का प्रयोग करने से मरहूम हो गए ।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर आयोग से यह माँग है कि :

  1. २२५ वाराणसी कैन्टोनमेन्ट की मतदाता सूची की गड़बड़ियों,प्रारूप ६ गायब किये/जलाये जाने तथा परिचय पत्र धारक मतदाताओं के नाम सूची में न आने की जाँच हो तथा जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाय ।
  2. त्रृटिपूर्ण मतदाता सूची के आधार पर हुए मतदान को रद्द कर पुनर्मतदान काराया जाए।

ऐसा न किया जाना आयोग द्वारा मनमाने और विभेदपूर्ण कार्रवाई होगी तथा उस स्थिति में न्याय प्राप्ति के अन्य संवैधानिक रास्ते चुनने के लिए हम स्वतंत्र होंगे ।

भवदीय ,

अफ़लातून.

--
Aflatoon अफ़लातून ,State President,Samajwadi Janparishad(U.P.),( फोन 0542 - 2575063)
5,Readers Flats,Jodhpur Colony,
Banaras Hindu University,
Varanasi,Uttar Pradesh,INDIA 221005
Visit http://samajwadi.blogspot.com
http://kashivishvavidyalay.wordpress.com
URL: http://kashipursolidarity.tripod.com/
http://shaishav.wordpress.com
http://samatavadi.wordpress.com.

सोमवार, अप्रैल 23, 2007

सीख वाले खेल और गैर - जवाबदेह चुनाव आयोग

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खेल - खेल में

संजय मंगला गोपाल । संजय ने अपने नाम से अपने माता - पिता का नाम जोड़ा है । आम तौर पर नाम के साथ जातिसूचक 'सरनेम' (गुजराती में एक इसके लिए शब्द है-'अटक') जुड़ा रहता है। महाराष्ट्र में समता आन्दोलन और छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े कई तरुणों ने अपने माता-पिता के नाम जोड़ना, सरनेम की जगह बरसों से शुरु किया है। भारतीय समाज में जाति की सूचना सिर्फ़ इतने से न मिले, यह नामुमकिन है।सन १९८५ में बाबा साहब अम्बेडकर की जयन्ती में मेरा भाषण सुनने के बाद एक छात्र मुझसे मिला और बोला,'आपका भाषण तो अच्छा रहा लेकिन आपकी जाति क्या है?' मैंने उसे कहा कि मैं जाति में यकीन नहीं रखता।उसने पलट कर कहा , ' कोई जाति होगी जो आप में यकीन रखती होगी,उसीका नाम बता दीजिये '। मैं निरुत्तर हो गया ।

बहरहाल तरुणों और किशोरों के लिए आयोजित ' समता संस्कार शिबिरों ' में संजय कुछ खेलों के जरिये प्रशिक्षण देते हैं । जाति प्रथा को समझने और उसके उन्मूलन पर प्रशिक्षण हेतु जो खेल होता है उसमें ५-७ की छोटी टोलियों में लड़के- लड़कियों को बाँट दिया जाता है। छोटी टोलियों में बोलने का संकोच कम होता है और कई टोलियों से कई विचार आयें इसकी सम्भावना भी अधिक रहती है ।सभी टोलियों को कुछ प्रश्न दे दिये जाते हैं जिन पर टोली का हर सदस्य अपने जवाब देता है । टोली में हुई चर्चा के नोट्स लेने का काम एक साथी करता है । टोलियों से आये निष्कर्षों की चर्चा सभी शिबिरार्थियों के बीच होती है । जाति-प्रथा उन्मूलन वाले खेल में ऐसे सवाल होते हैं :-

  1. अपनी जाति की जानकारी और अहसास आपको पहले-पहल कब और कैसे हुआ ?
  2. अन्य जातियों ( ऊपर की तथा नीचे की ) के साथ आपकी जाति के सम्बन्ध , व्यवहार के बारे में बताइये ।
  3. क्या जाति विहीन समाज की स्थापना स्थापना सम्भव है ? क्यों और कैसे ?

सभी टोलियों की रपट प्रस्तुत होते वक्त जाति-प्रथा के बारे में एक छवि उभर कर आ जाती है। जाति का प्रथम अहसास किसी को अपने से काफी उम्र वाले व्यक्ति द्वारा ,'बाबा प्रणाम' सुन कर हुआ था तो किसी को जाति-सूचक गाली सुनकर ।

मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश के वयस्कों के बीच इस खेल में पहली बार भाग लिया था । महाराष्ट्र के फुले-अम्बेडकर और समाजवादियों के सामाजिक आन्दोलन में ऐसे खेल नये नहीं हैं । उत्तर प्रदेश के समाजवादी आन्दोलन के बुजुर्ग साथियों के लिए भी यह नया अनुभव था।दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश के समाजवादी 'अंग्रेजी हटाओ-भारतीय भाषा लाओ' और अलाभकर खेती पर लगान न लगाने के आन्दोलनों से जुड़े रहे हैं लेकिन जाति-प्रथा उन्मूलन और स्त्री-पुरुष समता आदि के संस्कार के लिए ऐसे कार्यक्रमों का अभाव रहा है। शायद जिस रूप में हम शोषक होते हैं,वहाँ हम शोषण नहीं देखना चाहते। महाराष्ट्र में अन्तरजातीय विवाह करने वाले जोडों के सार्वजनिक सम्मान भी आयोजित होते हैं।

ऐसे ही नर-नारी समता और साझा संस्कृति को समझने के लिए होने वाले खेल भी 'समता संस्कार शिबिरों' में काफी लोकप्रिय होते है। दूसरे धर्म के बारे में क्या जानते हैं? इस सवाल के जवाब में प्राय: सभी की स्थिति धुरविरोधी के चिट्ठे पर अविनाश द्वारा बतायी गयी अपनी हालत(islaam ko nahi jaanta) जैसी होती है ।

गैर जवाबदेह चुनाव आयोग

संजय के एक अन्य खेल में पहला सवाल राज्य-व्यवस्था के बारे में होता है। संक्षिप्त चर्चा के बाद ही इस नतीजे पर लोग पहुँचते है कि अन्य व्यवस्थाओं से मौजूदा लोकतंत्र बेहतर है। बहुदलीय लोकतंत्र की अहमियत समझ लेने के बाद राजनीति की अहमियत समझना आसान हो जाता है ।

आज चुनाव व्यवस्था की एक गम्भीर कमी की ओर ध्यान खींच रहा हूँ । चुनाव-संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी भारत के निर्वाचन आयोग की है और स्थानीय प्रशासन की मदद से आयोग इसे सम्पन्न करता है । आयोग के द्वारा राजनैतिक दलों पर अंकुश रखने ,नकेल कसने और सख्ती की खबरें चुनाव के दिनों में सुर्खियों में रहती हैं । कई चुनाव आयुक्त तो राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिए गए बयानों से आकर्षण का केन्द्र भी बन जाते हैं । उसी उत्साह में टी.एन. शेषन सिर्फ शिव सेना के समर्थन से राष्ट्रपति का चुनाव लड़ गये थे ।

राजनीति के भ्रष्टाचार से आक्रान्त जनता चुनाव आयोग की खामियों पर गौर नहीं करती । अलबत्ता इन कमियों का शिकार जरूर हो जाती है । भारतीय प्रशासन-तंत्र में जवाबदेही का घोर अभाव है और चुनाव आयोग इससे परे नहीं है । ब्रिटिश शासन में यह जरूरी था कि उपनिवेशों की प्रजा छोटे से छोटे सरकारी मुलाजिम का साबका पड़ने पर अपने मौलिक अधिकारों को भूल कर दबा हुआ-सा रहे । क्या आजादी मिलने के ६० वर्षों के बाद एक लेखपाल(पटवारी) या सिपाही के समक्ष आम किसान दब कर नहीं रहता ?

मतदाता सूची में भारी गड़बडियों का अन्दाज पिछले लोकसभा चुनाव में एक एक क्षेत्र में हजारों लोगों के नाम गायब होने के बाद लग गया था। कई लोग जिनके पास भारत के चुनाव आयोग द्वारा जारी फोटो पहचान पत्र था लेकिन सूची में नाम न होने की वजह से मताधिकार से वे वंचित रहे । अखबार और टे.वि. चैनलों पर इन लाचार लोगों के चेहरे दिखा दिये जाते हैं , बस । लोकसभा चुनाव के बाद कई समूहों ने आयोग से इसकी शिकायत भी की थी। आयोग के निर्देश पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों के बदले डाकियों के से करवाया गया ताकि पतों की पुष्टि आसानी से हो जाये। मौजूदा चुनाव अधिसूचना जारी होने के दो दिन पहले तक वाराणसी में पहचान पत्र हेतु फोटो खींचने का काम चलता रहा( बनारस में ११ अप्रैल तक) लेकिन हजारों लोग जिन्होंने डाकियों को नाम जोड़ने या सुधारने के लिए फार्म६ दिये थे और पोस्ट-मास्टरों के दस्तखत और मुहर सहित उसकी पावती संभाल कर रखी थी उनके नाम फिर गायब थे । मतदान से वे फिर वंचित रहेंगे। बड़े दल इसे मुद्दा नहीं बनायेंगे चूंकि जिनके नाम हैं उनसे भी चुनाव तो सम्पन्न होगा ही। प्रशासन तंत्र पर चुनाव आयोग इस भारी त्रुटि के लिए कोई कदम नहीं उठायेगी।

कई साल पहले हजारों की संख्या में फोटो पहचान पत्र गंगा किनारे फेंके पड़े मिले थे। इस बार यह निर्देश था कि फोटो पहचान पत्र देते वक्त मतदाता के दस्तखत लिये जाएं तो स्थानीय अखबारों में खबर थी की बड़ी संख्या में प्रारूप ६ जला दिये गये हैं ।

मेरे पास ऐसे मतदाताओं के प्रारूप ६ की पावतियाँ और पहचान पत्र हैं जिनके नाम पुन: सूची से गायब हैं। आयोग के उपायुक्त को अधिसूचना जारी होने के पहले लिखा भी है लेकिन स्थानीय प्रशासन की इस गैरजिम्मेदारी पर आयोग की ओर से किसी कदम की उम्मीद मुझे नहीं है। अधिसूचना जारी होने के बाद अदालत भी हस्तक्षेप नहीं करती है। लोकतंत्र को कमजोर करने में नौकरशाही की भूमिका और आयोग की उनसे मिलीभगत की इस मिसाल के कारण एक-एक विधान-सभा क्षेत्र में हजारों लोग मताधिकार से वंचित रहेंगे। आप की सलाह आमंत्रित है ।