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गुरुवार, जनवरी 11, 2007

विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास (६)

डॊलर -रुपये की लूट
अंतर्राष्ट्रीय विनिमय में अमरीका जैसे देश एक और तरीके से भारत जैसे देशों को लूट रहे हैं । वह है डॊलर और रुपए का विनिमय दर । बीस साल पहले एक डॊलर आठ-दस रुपये का था , आज वह ४८ रुपये का हो गया है। लेकिन क्रयशक्ति समता ( Purchasing Power Parity ) के हिसाब से देखें , अर्थात वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने की क्षमता से तुलना करें , तो एक डॊलर आज भी दस रुपये से ज्यादा का नहीं होना चाहिए । इस अत्यधिक गैरबराबर विनिमय दर का मतलब है कि हम अपने आयातों का पांच गुना ज्यादा भुगतान कर रहे हैं। यह जबरदस्त लूट और शोषण है ।
अब बात साफ हो जानी चाहिए । इस जबरदस्त लूट और शोषण को सुविधाजनक बनाने और बढ़ाने के लिए ही अमरीका व दुनिया के अन्य अमीर देश मुक्त व्यापार की हिमायत करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ाने की वकालत करते हैं । विश्व व्यापार संगठन भी इसीलिए बनाया गया है तथा मुक्त व्यापार के क्षेत्रीय समझौते भी इसीलिए किए जा रहे हैं । दरअसल वैश्वीकरण की यह व्यवस्था नव-औपनिवेशिक शोषण और साम्राज्यवादी लूट का ही नया रूप है,नया औजार है । जैसे विदेशी पूंजी से भारत के विकास की बात वास्तविकता से परे एक अन्धविश्वास है , वैसे ही मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय ढांचे में निर्यातों से देश के विकास को गति मिलेगी,यह भी एक और अन्धविश्वास है ।
इन्हीं आर्थिक अंधविश्वासों के चलते आज भारत की अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट में फंस गयी है । भले ही ऊपर बैठे शासक और अर्थशास्त्री ८ प्रतिशत विकास दर की खुशियाँ मनाते रहें , लेकिन देश की विशाल आबादी जबरदस्त बेरोजगारी,कंगाली,कुपोषण और अभावों से जूझ रही है । किसान , बुनकर , कारीगर और छोटे व्यापारी हजारों की संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं । पिछले पन्द्रह वर्षों में देश के पांच लाख छोटे-बड़े उद्योग बंद हो चुके हैं । जिस तरह का औद्योगिक विनाश ( de-industrialisation) डेढ़ सौ वर्ष पहले अंग्रेजों के राज में भारत में हुआ था , उसी तरह का औद्योगिक विनाश बड़े पैमाने पर एक बार फिर आजाद भारत में हो रहा है । तब खेती पर निर्भर आबादी बढ़ गयी थी , अब तथाकथित ‘ सेवाओं’ का हिस्सा बढ़ रहा है । लेकिन खेती , पशुपालन , उद्योग , खदानें , आदि में ही वास्तविक उत्पादन एवं आय सृजन होता है । एक सीमा के बाद सेवा क्षेत्र की वृद्धि भी इन पर निर्भर रहती है ।यदि खेती-उद्योग का विनाश होता है तो मात्र ’ सेवाओं ‘ के दम पर कोई भी अर्थव्यवस्था नहीं चल पाएगी । पूरा देश एक बार फिर बरबादी ,कंगाली और गुलामी की राह पर है ।
देश बचेगा , तो हम बचेंगे
जैसे पुत्रमोह में धृतराष्ट्र अन्धे हो गए थे और सच्चाई व न्याय को नहीं देख पा रहे थे तथा न ही अवश्यंभावी कलह तथा विनाश को देख पाये , वैसे ही आज के शासक भी वैश्वीकरण की चकाचौंध में देश के ऊपर आसन्न संकट को देख नहीं पा रहे हैं। यदि इसे नहीं रोका गया, तो पौराणिक ‘महाभारत’ से ज्यादा बड़ी विनाशलीला होगी । ऐसे भारत का भविष्य अंधकारमय है । और यदि भारत का कोई भविष्य नहीं होगा,तो बी.एस.एन.एल का भी कोई भविष्य नहीं होगा। आज बी.एस.एन.एल. के ऊपर जो संकट आ रहा है, वह वैश्वीकरण की विनाशकारी प्रक्रिया का हिस्सा है । बी.एस.एन.एल. का भविष्य अनिवार्य रूप से देश के भविष्य से जुड़ा है ।
ऐसी हालत में , हम सबको मिलकर देश को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा । लेकिन यह लड़ाई बी.एस.एन.एल. के कर्मचारी अकेले नहीं लड़ पाएंगे। इसके लिए उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य कर्मचारियों , किसानों, मजदूरों , बुनकरों,मछुआरों , आदिवासियों ,दलितों आदि के साथ एकता बनाना पड़ेगा। मरा आपसे अनुरोध है कि पगार तथा बोनस की लड़ाई छोड़ें।वे तो छोटी बातें हैं। इस बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हो जाएं । तभी देश बचेगा और तभी बी.एस.एन.एल भी बचेगा ।
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( नेशनल फेडरेशन ओफ़ टेलिकोम एम्प्लाईज़,बी.एस.एन.एल औरंगाबाद जिला शाखा,महाराष्ट्र द्वारा विदेशी पूंजी और बी.एस.एन.एल. का भविष्य पर आयोजित परिसंवाद में सुनील,राष्ट्रीय महामन्त्री,समाजवादी जनपरिषद का भाषण, दिनांक १० फरवरी २००६ )

शनिवार, जनवरी 06, 2007

विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास(४)

« विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास (३)
विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास(४)
निजीकरण-उदारीकरण के घोटाले
निजीकरण के पीछे एक और दलील थी कि सरकारी काम में काफी भ्रष्टाचार है । लेकिन जिस तरीके से निजीकरण और उदारीकरण हो रहा है , उसने तो भ्रष्टाचार की सारी मर्यादाएं तोड़ दी हैं ।पिछले कुछ सालों में इतने घोटाले हुए हैं और इतने बड़े घोटाले हुए हैं कि ‘घोटाला’ शब्द के मायने बदल गये हैं। पहले दो-चार लाख रुपए का गबन होता था तो अखबारों के मुखपृष्ट पर बड़ी खबर बनता था । लेकिन अब करोड़ों ही नहीं , अरबों-खरबों रुपयों के घोटाले होते हैं। इन घोटालों में विदेशी कंपनियाँ बढ़-चढ़ कर भाग लेती हैं। इस देश को लूटने में वे पूरी तरह शामिल हैं ।
उदारीकरण-वैश्वीकरण के इस दौर का पहला बड़ा घोटाला शेयर घोटाला था , जिसमें हर्षद मेहता-हितेन दलाल-भूपेन दलाल जैसों का हाथ था । लगभग १०,००० करोड़ रुपए के इस घोटाले की जाँच संयुक्त संसदीय समिति ने की थी । इस समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि घोटाले में सबसे अग्रणी चार विदेशी बैंक थे - स्टेनचार्ट बैंक , ए एन्ड ज़ेड ग्रिन्ड्लेज़ बैंक , सिटी बैंक और बैंक ओफ़ अमेरिका । इनके खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की सिफ़ारिश इस समिति ने की थी । लेकिन भारत सरकार ने कुछ विशेष नहीं किया । न उनके लाइसेन्स रद्द किए , न उन पर जुर्माना किया , न उनको भारत छोड़ने को कहा। बल्कि विदेशी बैंकों को और ज्यादा प्रवेश व छूट दी । हमारे देश में , हमारी भूमि पर आकर , विदेशी बैंक घोटाले करें तथा करवाएं और उन पर कार्रवाई न हो - यह सिर्फ हमारे देश में ही सम्भव है। वैश्वीकरण ने हमारे स्वाभीमान को तथा देशहित को कितना गिराया है तथा गुलामी को कितना मजबूत किया है , उसका यह एक और उदाहरण है ।
देश की अस्मिता ,गरिमा तथा हितों के खिलाफ ऐसा ही एक घोटाला मारिशस रूट से हुआ । भारत और मारिशस के बीच एक संधि है , जिसमें एक दूसरे की कंपनियों पर दोहरा करारोपण नहीं करने का समझौता हुआ है । इसका अनुचित लाभ उठाने के लिए , भारत के शेयर बाजार में पूंजी लगाने वाली कई विदेशी कंपनियों ने अपना फर्जी रजिस्ट्रेशन मारिशस में करवा लिया तथा अरबों रुपयों का पूंजी लाभ कर की चोरी द्वारा कमाया।कुछ वर्ष पहले भारत सरकार के आयकर विभाग के कुछ ईमानदार अफसरों ने इन कंपनियों की जाँच शुरु की तो हडकंप मच गया । विदेशी कंपनियों ने धमकी दी कि यदि उनके खिलाफ जाँच नहीं रोकी गयी तो वे अपनी पूंजी वापस ले जाएंगे । शेयर बाजार का सूचकांक नीचे जाने लगा। तब वित्त मन्त्रालय ने हस्तक्षेप किया और आयकर अधिकारियों को आदेश दिया गया कि वे यह जाँच बन्द कर दें ।स्पष्ट है कि भारत सरकार पूरी तरह विदेशी पूंजी और विदेशी कंपनियों की बंधक बन गई है तथा कर चोरी और घोटालों को भी अनदेखा करते हुए उन्हें खुश रखना चाहती है।
सेन्टूर हो्टल बिक्री , माडर्न फूड इंडस्ट्रीज की बिक्री,बाल्को की बिक्री जैसे कई मामले हैं,जिनमें घोटालों की गूँज उठी है । महाराष्ट्र में अमरीकी कंपनी एनरोन के बिजली कारखाने के लिए बिना निविदा के जो समझौता हुआ,उसका घोटाला तो काफ़ी चर्चित रहा है । मध्यप्रदेश में सड़कों के निजीकरण का उदाहरण भी काफ़ी मौजू है । म.प्र. सरकार ने ने बी.ओ.टी. (Bulid-Operate-Transfer) योजना के तहत १५ सड़कों का ठेका निजी कंपनियों को देने का फैसला किया। एशियाई विकास बैंक के कर्ज से बनी इस योजना मेम प्रत्येक सड़क के लिए ५० से ६० प्रतिशत अनुदान सरकार ने दिया ।मान लीजिए,एक सड़क की लागत १०० करोड़ आंकी गई है और उसमें ५५ करोड़ का अनुदान है। लेकिन निश्चित रूप से सड़क की वास्तविक लागत बहुत कम होगी,तथा १०० करोड़ की लागत बढ़ा-चढ़ा कर बताई होगी । यदि वास्तविक लागत ८० करोड़ रु. है,तो उस कंपनी को मात्र २५ करोड़ रुपए ही अपने पास से लगाने होगा ।लेकिन टोल टैक्स की वसूली तो वह पूरी करेगी । याने पैसा सरकार का , कमाई कंपनियों की- निजीकरण का मतलब यही है । म.प्र. की सड़कों कि इस बन्दरबाँट में भी विदेशी कंपनियां पीछे नही रही हैं ।इसी तरह टेलीफोन का ढांचा गांव - गांव तक पहुंचाने का काम सरकारी विभाग ने किया और उस पर काफी सार्वजनिक पैसे का विशाल निवेश हुआ । लेकिन जब टेलीफोन से कमाई का समय आया, यो निजी देशी-विदेशी कंपनियाँ मैदान में आ गयीं ।
[अगली प्रविष्टी- देश हित से ऊपर विदेशी पूंजी ]

शुक्रवार, जनवरी 05, 2007

भारत भूमि पर विदेशी टापू (शेष भाग)

गतांक से आगे :
आन्ध्रप्रदेश में काकिनाडा में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं तेलशोधक कारखाने के लिए १०,००० एकड़ खेती की उपजाऊ भूमि ली जा रही है , जिसे छोड़ने के लिए किसान तैयार नहीं है। हरियाणा में रिलायन्स का विशेष आर्थिक क्षेत्र भी विवादों से घिर गया है। हरियाणा सरकार ने गुड़गाँव के पास लगभग १००० करोड़ रु. की १७०० एकड़ भूमि मुकेश अंबानी को मात्र ३६० करोड़ रु. में दे दी है। इसी प्रकार , पंजाब में अमृतसर के पास डी.एल.एफ़. कम्पनी के विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए भी सस्ती दरों पर भूमि अर्जित करने के कारण काफी विरोध हो रहा है। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री स्वंय इसमें कम्पनी के पक्ष में जोर लगा रहें है तथा वहाँ जा चुके हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के मामलों में जमीन के बड़े-बड़े घोटाले होने की पूरी सम्भावना है। वैश्वीकरण के कई घोटालों में यह एक नया योगदान है। प्रचलित बाजार दरों से काफी कम दरों पर, राज्य सरकारें इन कम्पनियों के हवाले जमीन कर रही है तथा किसानों से बहुत कम दरों पर जमीनें जबरदस्ती ली जा रहीं है। पहले ही बड़े बाँधों,खदानों,कारखानों,फ़ायरिंग रेंजों,राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारणों से बड़े पैमाने पर गाँवों को उजाड़ा जा रहा है। विशेष आर्थिक क्षेत्र इस विस्थापन की श्रृंखला में एक नई कड़ी बन गए हैं। भारतीय खेती व गाँवों पर वैश्वीकरण का यह एक और हमला है।
विशेष आर्थिक क्षेत्रों का प्रशासन भी इनका विकास करने वाली कम्पनियों के हाथ में होगा। केन्द्र सरकार की तरफ से सिर्फ एक विकास आयुक्त होगा। सम्भवतः कोई ग्राम पंचायत या नगरपालिका जैसी स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ भी नहीं होगी। ये देश के अंदर एक अलग देश होंगे और यहाँ देशी-विदेशी कम्पनियों की ही चलेगी। यह एक विचित्र स्थिति होगी और १९४७ के बाद, गोवा व पांडिचेरी की आजादी के बाद, भारत भूमि पर पहली बार देश की सम्प्रभुता से स्वतंत्र क्षेत्र बनेंगे।
इस बात की पूरी सम्भावना है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र काफी बड़े भ्रष्टाचारों और घोटालों के केन्द्र बनेंगे। विकास आयुक्त से लेकर अन्य अफ़सर केन्द्र सरकार के होंगे। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में स्थापित होने वाली इकाइयों और इसमें ढाँचा-निर्माण करने वाली कंपनियों को अनुमति व लाइसेन्स देने की एवज में उनकी जम कर कमाई होगी। आखिर करोड़ों - अरबों रुपए की कर -रियायतों के बदले में कुछ कमीशन उन्हें देने में देशी- विदेशी कंपनियों को कोई दिक्कत नहीं होगी।
यदि संप्रभुता, भ्रष्टाचार, विस्थापन और अन्य विवादों को छोटी - मोटी समस्या तथा विरोधियों का प्रचार कहकर नकार दिया जाए, तो भी भारत के विकास और प्रगति में इन ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ की भूमिका काफी संदिग्ध है। स्वयं उदारीकरण - वैश्वीकरण के समर्थक अर्थशास्त्री भी भारत सरकार की इस योजना पर उंगली उठा रहें हैं। पहली बात तो यह है कि ज्यादा संभावना इस बात की है कि इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों में मिलने वाली जबरदस्त कर- छूटों व अन्य सुविधाओं के कारण, नए उद्योग लगने के बजाय देश के अन्य क्षेत्रों से उद्योग यहाँ स्थानान्तरित हो जायेंगे । विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तो पूंजी निवेश, उत्पादन, निर्यात और रोजगार के आंकड़े बढ़ते हुए दिखेंगे, किंतु देश के अन्य विशाल भूभाग में उद्योग बंद होते जाएंगे और मंदी व बेरोजगारी फैलती जाएगी। कुल मिलाकर नतीजा शून्य से ज्यादा नहीं होगा।
उल्टे नुकसान यह होगा कि करों व शुल्कों में भारी रियायतों से भारत सरकार व राज्य सरकारों की आय कम हो जाएगी और वे अपने कर - राजस्व के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से से वंचित हो जाएगी। अनुमान लगाया गया है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों के कारण सिर्फ भारत सरकार को अगले चार वर्षों में लगभग ९३,००० करोड़ रुपए के कर-राजस्व का नुकसान होगा । एक तरफ तो भारत सरकार पैसे की तंगी का रोना रोती है और अपना घटा व अनुदान कम करने के लिए गरीबों व आम जनता के लिए राशन , बिजली , पानी , खाद , शिक्षा , इलाज आदि को मंहगा करती जा रही है, दूसरी तरफ़ इन कंपनियों को दिल खोल कर करों व शुल्कों से छूट दे रही है । देश की जनता को वंचित करके कंपनियों को लाभ पहुँचाने का काम इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के जरिए होगा ।
इस मामले में , इसके पहले के ‘ निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों ‘ का क्या अनुभव रहा , यह भी देखना चाहिए । वर्ष १९९८ की रिपोर्ट में भारत के महाअंकेक्षक एवं लेखा परीक्षक ने टिप्पणी की थी कि ” ४७०० करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा कमाने के लिए ७५०० करोड़ रुपए के आयात शुल्क की हानि हुई तथा ऐसा लगता है कि सरकार ने कोई नफ़ा-नुकसान का विश्लेषण ही नहीं किया। ” हो सकता है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों का अनुभव भी इससे ज्यादा अलग न हो ।
दरअसल , चीन ने दो दशक पहले जब इस तरह के विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाये थे , तो वहाँ स्थिति काफी अलग थी । एक, चीन के अन्दर काफी समय तक विदेशी कंपनियों को इजाजत नहीं थी तथा चीन की अपनी देशी निजी कंपनियाँ भी नहीं पनपीं थीं । इसलिए इन क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को चीन में घुसने का एक मौका मिला , वे बड़ी संख्या में आईं और इन क्षेत्रों से चीन को निर्यात बढ़ाने में मदद मिली । जबकि भारत में तो सारे दरवाजे पहले ही खुले हैं तथा भारत के देशी कंपनियां भी काफी विकसित हैं । दूसरा फर्क यह है कि बीस वर्ष पहले सब जगह आयात और निर्यात शुल्क काफी ऊँचे थे तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों के माध्यम से कंपनियों को ऊँचे शुल्कों की इन दीवारों को भेदने की सुविधा मिलती थी । लेकिन १९९५ में विश्वव्यापार संगठन बनने के बाद से ये शुल्क लगातार कम होते गए हैं और अब शून्य से लेकर दस-पन्द्रह प्रतिशत के बीच में रह गए हैं । इसलिए उत्पादन व निर्यात के लिए कम सीमा-शुल्कों वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने का औचित्य बहुत कम रह गया है । हम चीन के विकास मॊडल की नकल तो करने की कोशिश कर रहे हैम,लेकिन नकल में भी अपनी अकल कम लगा रहे हैं ।
यह भी हो सकता है कि निर्यात के लिए करों में छूट और सुविधाओं को विश्वव्यापार संगठन में कोई देश चुनौती दे या स्वयं अपने देश में उन वस्तुओं पर संतुलित करने वाले शुल्क लगा दे। ऐसी हालत में निर्यात संवर्धन के उद्देश्य को पूरा करने पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा ।
भारत पिछले कई वर्षों से अपना निर्यात बढाने की कोशिश कर रहा है । निर्यात बढने से ही देश का विकास होगा ,यह पाठ विश्वबैंक,अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्वव्यापार संगठन से ले कर वैश्वीकरण समर्थक सभी अर्थशास्त्री पढाते रहे हैं । इसके लिए चीन , दक्षिण कोरिया , मक्सिको व लाटिनी अमेरिका के अन्य देशों का उदाहरण दिया जाता रहा है। निर्यात बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा विदेशी कंपनियों को देश में बुलाना होगा तथा देशी-विदेशी कंपनियों को नियमों और करों में छूट व अनुदान देने होंगे - इस नीति पर भारत सरकार चलती रही है । ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र’ इस शृंखला में सबसे ताजा पैकेज है । किन्तु इन सब कोशिशों के बावजूद भारत को अभी तक इस मोर्चे पर सफलता नहीं मिली है । भारत के निर्यात तो बहुत नहीं बढ़ पाए , आयात उससे ज्यादा बढ़ते गए। पि्छले काफी समय से भारत के विदेश व्यापर में लगातार विशाल घाटा चला आ रहा है ।
निर्यात-आधारित विकास की इस पूरी संकल्पना पर ही सवाल उठाने का समय आ गया है । सही माएने में देखा जाए, तो यह एक मृग-मरीचिका है और दुनिया के गरीब देशों को लूटने का एक और खेल है । जब दुनिया के सारे गरीब देश निर्यात बढ़ाने की कोशिश करते हैं,तो जाहिर है कि सबका निर्यात एक साथ नहीं बढ़ सकता । कुछ देशों के निर्यात कम होंगे, तो दूसरे देशों के निर्यात बढ़ेंगे । लेकिन निर्यात बढाने की इस होड़ में वे अपने सामानों और सेवाओं को सस्ता करते जाते हैं । अपने देश की बहुसंख्यक गरीब आबादी की जरूरतों की उपेक्षा भी करते हैं । अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में माल सस्ता होने पर अमीर देशों व उनके नागरिकों व उनके नागरिकों कोफायदा होता है , जिनके पास क्रय शक्ति है ,या यूँ कहें कि जिनके पास डॊलर है । इस प्रकार ‘निर्यातोन्मुखी विकास’ के इस खेल में अमेरिका-यूरोप-जापान की सेवा में पूरी दुनिया के संसाधन लग जाते हैं और उनके लिए चीजें और सेवाएं सस्ती होती चली जाती हैं । यह शोषण का एक जरिया है । साथ ही निर्यात बढ़ाने के लिए विदेशी कंपनियां ही माहिर हैं , इस तर्क के चलते अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सर्वत्र घुसपैठ हो रही है और उनका वर्चस्व पूरी दुनिया पर पायम होता चला जा रहा है । उनके मुनाफ़े व रायल्टी , गरीब दुनिया के शोषण का एक जरिया है । ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ तो विशेष तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अड्डे बनेंगे ।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ हों , निर्यात आधारित विकास की बात हो , विदेशी पूंजी आकर्षित करने की होड़ हो या वैश्वीकरण का गुणगान हो , चीन की मिसाल बार-बार दी जाती है । चीन आधुनिक भारत के लिए एक मॊडल है ,जिसका वह अनुकरण करना चाहता है । वह मनमोहन सिंह और बुद्धदेव भट्टाचार्य दोनों के लिए मॊडल है।चीन की विकास दर लगातार कई वर्षों से नौ-दस प्रतिशत के आस-पास चल रही है । चीन भारत से तीन-चार गुना ज्यादा विदेशी पूंजी अकर्षित कर रहा है । चीन का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है और चीनी वस्तुएं अमरीका से ले कर भारत तक के बाजार में छा गयी हैं । यह सब तो खूब प्रचार होता है । लेकिन चीन की जनता का क्या हाल है ? इस मॊडल के चीन के अन्दर की क्या वस्तुस्थिति है ?
जो जानकारी मिल रही है , उससे पता चलता है कि चीन का विकास और औद्योगीकरण मुख्यरूप से हांग्कांग से लगे चीन के पूर्वी तटीय इलाकों तक सीमित है । चीन के गाँवों में और चीन के विशाल मुख्य भूमि में गरीबी , बेरोजगारी व गैरबराबरी बहुत तेजी से बढ़ रही है तथा बड़े पैमाने पर विस्थापन और पलायन हो रहा है । भारत की तरह बड़ी संख्या में आत्महत्याएं भी हो रही हैं । कारखानों और खदानों में काम करने की दशाएं बहुत खराब हैं ।दुनिया में खनन और औद्योगिक दुर्घटनाओं स्बसे ऊँची दर चीन में है । भारत से भी ज्यादा दुर्घटनाएं वहाँ हो रही हैं । संपत्ति व आय के वितरण में भी गैरबराबरी चीन में भारत से ज्यादा हो चुकी है । पूरे चीन में जबरदस्त जन-असंतोष खदबदा रहा है , जिसे केन्द्रीय सत्ता की तानाशाही के चलते दबाकर रखा गया है । वर्ष २००५ में पूरे चीन में ८७,००० विरोध प्रदर्शन हुए , यह आंकड़ा स्वयं चीन सरकार की सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय का है । क्या यही हमारा मॊडल है ?
शायद , वैश्वीकरण की नई व्यवस्था में गरीब देशों का कोई ‘विकास’ हो सकता है,तो वह इसी तरह का होगा । थोड़े लोगों और थोड़े इलाकों में बहुत गतिविधियाँ , स्मृद्धि और शान-शौकत दिखाई देगी । लेकिन बाकी विशाल इलाके की विशाल आबादी कंगाली , जाहिली , बेरोजगारी ,विस्थापन व पलायन की पीड़ा भोगने को अभिशप्त होगी । आधुनिक पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता की यह खूबी की यह खूबी है कि इसमें सबका विकास नहीं हो सकता । लेकिन बाकी लोगों की कीमत पर कुछ लोग व कुछ इलाके विकास व समृद्धि की अभूतपूर्व उचाइयां हासिल कर सकते हैं । इस पूंजीवाद ने पहले दुनिया में बडे-बडे उपनिवेश बनाये थे । फिर उपनिवेश आजाद होने पर नव-औपनवेशिक तरीकों से उनका शोषण जारी रखा । नव-औपनिवेशिक लूट के साथ -साथ देशों के अन्दर भी उपनिवेश बनने की प्रक्रिया निरंतर चल रही है । इससे देश के अंदर भी गैरबराबरी व शोषण तेजी से बढ़ेगा ,जो अन्तर्राष्ट्रीय सम्राज्यवादी शोषण का पूरक होगा और मददगार होगा। ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ भी इस आंतरिक उपनिवेश और बाहरी उपनिवेश वाली द्वन्द्वात्मक व्यवस्था का एक नया औजार है। यही इसका असली रूप और इसकी असली भूमिका है ।

बुधवार, जनवरी 03, 2007

विदेशी पूंजी से विकास का अंधविश्वास : ले. सुनील

लगभग सात वर्ष पहले की बात है । दूरसंचार क्षेत्र में निजी कंपनियों को लाइसेन्स दिये हुए कुछ वर्ष हो चुके थे । किन्तु इन कंपनियों ने सरकार को लाइसेन्स शुल्क का नियमित भुगतान नहीं किया था और उनके ऊपर अरबों रुपया बकाया हो गया था । जब उनको नोटिस दिए जाने लगे , तो इन कंपनियों ने फरियाद की कि उनका धन्धा ठीक नहीं चल रहा है , उनका शुल्क कम किया जाये और बकाया शुल्क माफ किया जाये । तब भारत सरकार के दूरसंचार मन्त्री श्री जगमोहन , एक सख्त आदमी थे । उन्होंने निजी टेलीफोन कंपनियों की बात मानने से इन्कार कर दिया और बकाया शुल्क जमा नहीं करने पर लाइसेन्स रद्द करने की चेतावनी दी । उन्होंने कहा कि आपका धन्धा नहीं चल रहा है तो बन्द कर दो । लेकिन सरकार को पैसा तो देना पड़ेगा । तब ये कंपनियाँ मिलकर प्रधानमन्त्री कार्यालय में गयीं और वहाँ फरियाद की । प्रधानमन्त्री कार्यालय ने भी उनकी तरफदारी की , किंतु जगमोहन टस से मस नहीं हुए । नतीजा यह हुआ कि जगमोहन को दूरसंचार मन्त्रालय से हटा दिया गया , प्रमोद महाजन को दूरसंचार मन्त्री बनाया गया और निजी कंपनियों की लाइसेन्स शर्तों को बदलकर करीब ५००० करोड़ रुपये की राहत उनको दे दी गई । एक ईमानदार मन्त्री और निजी कंपनियों के बीच संघर्ष में जीत कंपनियों की हुई । इस खेल में कितना कमीशन किसको मिला होगा , इसका अंदाज आप लगा सकते हैं । निजीकरण , उदारीकरण , भूमंडलीकरण के नाम पर यही खेल पिछले डेढ़ दशक से चल रहा है ।
दूसरी ओर , ठीक इसी समय देश के कई हिस्सों में किसानों की आत्महत्याएं भी शुरू हो गयी थीं । खेती एक गहरे संकट में फंस चुकी थी , जिसके लिए स्वयं भूमंडलीकरण की नीतियाँ जिम्मेदार थीं । विश्व बैंक के निर्देश पर खाद , बीज , पानी , डीजल , बिजली आदि की कीमतें लगातार बढ़ाई जा रही हैं । विश्व व्यापार संगठन की नई खुली व्यवस्था के तहत खुले आयात के कारण किसानों की उपज के दाम या तो गिर रहे हैं या पर्याप्त नहीं बढ़ रहे हैं । किसानों पर भारी कर्जा हो गया है । देशी - विदेशी टेलीफोन कंपनियों को ५००० करोड़ रुपये की राहत देने वाली सरकार को यह ख्याल नहीं आया कि किसानों का करजा माफ कर दें या खाद - डीजल - बिजली सस्ता कर दें या समर्थन - मूल्य पर्याप्त बढ़ा दें । यदि कंपनियों का धन्धा नहीं चल रहा था , तो किसान की खेती में भी तो भारी घाटा हो रहा है ! लेकिन किसानों को , गरीबों को या आम जनता को राहत देना अब सर्कार के एज्ण्डे में नहीं है । [ अगली प्रविष्टि - ‘ विदेशियों का हुक्म सिर आँखों पर ‘ ]

शनिवार, दिसंबर 30, 2006

भारत भूमि पर विदेशी टापू : ले. सुनील

भारत भूमि पर विदेशी टापू : ले. सुनील

अचानक इस देश में ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ ( Special Economic Zones ) की बाढ़ आ गयी है। हरियाणा व पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल तक और गुजरात से ले कर हिमाचल प्रदेश तक नए - नए ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के प्रस्ताव स्वीकृत होने और बनने की खबरें आ रही हैं। अभी तक कुल १६४ प्रस्ताव केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत किए जा चुके हैं। भारत के विकास , समृद्धि व प्रगति के नए सोपान और सबूत के रूप में इन्हें पेश किया जा रहा है। आखिर यह है क्या चीज ?
देश के निर्यात को बढ़ाने के लिए बनाए जा रहे इन क्षेत्रों की कल्पना चीन से आई है। यह चीन की राह का अनुकरण है। पहले भारत ने ‘ निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र ‘ बनाए थे। फिर पिछले दस वर्षों से सुविधाएं और रियायतें बढ़ाते हुए इन्हें ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ का नाम दिया गया। लेकिन इनमें तेजी तब आयी , जब पिछले वर्ष २००५ में देश की संसद में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लिए विधिवत एक कानून बना दिया गया तथा ९ फरवरी २००६ को वाणिज्य मंत्रालय ने इसकी अधिसूचना जारी कर दी।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ में स्थापित होने वाले निर्यात - आधारित उद्योगों को देश के करों और कानूनों से अनेक तरह की छूटें , सुविधाएं और मदद दी जाती है। इनकी परिभाषा ही यह है कि वे व्यापार करों व शुल्कों की दृष्टि से ‘ विदेशी क्षेत्र ‘ माने जाएंगे। भारत के नियम , कानून व कर वहाँ लागू नहीं होंगे। वे एक प्रकार से भारत सरकार की संप्रभुता से स्वतंत्र , स्वयम संप्रभू इलाके होंगे। यह माना जा रहा है कि अनेक विदेशी कंपनियाँ इन क्षेत्रों की ओर आकर्षित होंगी और उनके आने से भारत का निर्यात तेजी से बढ़ेगा। विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में भारत पिछड़ता जा रहा है। चीन भारत से बहुत आगे है। इन क्षेत्रों के बनने से वह कमी भी दूर हो जाएगी। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में करों में रियायतों की सूची लम्बी है। ये रियायतें इन क्षेत्रों में स्थापित होने वाले उद्योगों तथा क्षेत्र का विकास करने वाली कंपनियां , दोनों के लिए होगी। वस्तुओं और सेवाओं , दोनों को प्रदान करने वाली इकाइयों को छूट मिलेगी। आयकर में छूट पन्द्रह वर्ष के लिए होगी , जिसमें पाँच वर्ष तो शत - प्रतिशत छूट होगी और अगले पाँच वर्ष भी ५० प्रतिशत छूट होगी। विदेशों से मंगाए जाने वाले कच्चे माल या उपकरणों पर कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा। देश के अन्दर से खरीदी गई चीजों पर उत्पाद शुल्क नहीं लगेगा और केन्द्रीय बिक्री कर की राशि वापस कर दी जाएगी। लाभांश वितरण कर , न्यूनतम वैकल्पिक कर , पूंजीगत लाभ कर , ब्याज पर कर , बिक्री कर , वैट आदि में भी छूट दी गई है। इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों में सेवा कर भी माफ़ रहेगा। जिन उद्योगों में अभी विदेशी पूंजी निवेश पर सीमा है , जैसे बीमा , दूरसंचार या निर्माण , उनमें १०० प्रतिशत विदेशी शेयरधारिता की अनुमति भी दी जाएगी। लाइसेन्स आदि की झंझटों व प्रतिबन्धों से भी मुक्ति रहेगी। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में सस्ते कर्ज की सुविधा मिलेगी , सारी अनुमतियाँ एक जगह देने की एकल - खिड़की व्यवस्था बनाई जाएगी और विभिन्न प्रकार की निगरानी के लिए भी एक ही एजेन्सी होगी। बदले में बस एक ही शर्त रहेगी कि विशेष आर्थिक क्षेत्र की इकाइयों को कुल मिलाकर शुद्ध विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला होना चाहिए। वे सब आयात भी कर सकती हैं , किंतु उनके निर्यात , आयात से ज्यादा होने चाहिए। राज्य सरकार के करों व शुल्कों से विशेष आर्थिक क्षेत्रों की इकाइयों को मुक्त करने के लिए हरियाणा सरकार ने तो केन्द्रीय कानून की तर्ज पर ‘ हरियाणा विशेष क्षेत्र अधिनियम , २००५ ‘ भी पास कर लिया है।
करों व नियमों में ये छूटें न केवल विशेष आर्थिक क्षेत्रों के उद्योगों को होगी , बल्कि सेवाओं और व्यापार में भी मिलेगी। जैसे सूचना तकनालॊजी में। जो विदेशी बैंक अपनी शाखा वहाँ खोलेंगे , उनके मुनाफे पर टैक्स नहीं लगेगा। कोई कंपनी वहाँ बिजली कारखाना खोलेगी , तो उसे भी कर नही देना पड़ेगा। जो कंपनियाँ या फन्ड्स वहाँ स्थित नहीं हैं , किन्तु जिन्होंने वहाँ पूंजी लगाई है , उनके ब्याज व मुनाफ़े पर भी कर नहीं लगेगा। कुल मिलाकर ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ एक तरह के ‘ कर - स्वर्ग ‘ होंगे , जहाँ सरकार के करों और प्रतिबन्धों से पूरी आजादी होगी।
भारत के कम से कम दो दर्जन कानून विशेष आर्थिक क्षेत्रों में लागू नहीं होंगे। वहाँ के विवादों और मुकदमों के फैसला करने वाली अदालतें भी अलग होंगी। यद्यपि भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश के श्रम , बैंकिंग और शेयर बाजार के कानून वहाँ लागू होंगे , किन्तु देर - सबेर वहाँ श्रम कानूनों में छूट दी जाएगी, यह तय है। चीन के विशेष आर्थिक क्षेत्रों में आने का यह एक प्रमुख आकर्षण था कि चीन के श्रम कानून वहाँ लागू नहीं होते थे। ये कंपनियाँ चाहे जब मजदूरों को लगा व निकाल सकें , ठेका मजदूर या चाहे जिस रूप में मजदूरों को लगा सकें और चाहे जो मजदूरी दें - ये आजादी विशेष आर्थिक क्षेत्र में उनको हो इसकी वकालत भारत में भी की जा रही है . गुजरात और महाराष्ट्र की सरकारों ने तो आसान श्रम कानूनों की योजना बनाई भी है। खबर है कि छ; राज्य सरकारों ने केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के पास प्रस्ताव भेजा है कि इन क्षेत्रों में ‘ सरल ‘ श्रम कानूनों की अनुमति दी जाए। भारत के आर्थिक नक्शे पर चमकते हुए ये क्षेत्र मजदूरों के सबसे बुरे शोषण के क्षेत्र भी हो सकते हैं। इसी प्रकार , पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण - रोकथाम के नियमों को भी इन क्षेत्रों में ताक पर रखा जा सकता है।इस प्रकार से अब देश दो भागों में बंट जाएगा। एक ‘घरेलू शुल्क क्षेत्र ‘ जहाँ देश के कानून लागू होंगे ,दो ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ जो देश के कानूनों , नियमों व लोकतांत्रिक प्रशासन से परे व ऊपर होंगे .
ये विशेष आर्थिक क्षेत्र १० हेक्टेयर से ले कर हजारों हेक्टेयर के हो सकते हैं। कोई ऊपरी सीमा नहीं है और रिलायन्स के कुछ विशेष आर्थिक क्षेत्र तो १५ हजार हेक्टेयर तक के विशाल भूभाग में बन रहे हैं। ये विशेष आर्थिक क्षेत्र किसी एक वस्तु या सेवा पर केन्द्रित भी हो सकते हैं और अनेक वस्तुओं या सेवाओं के भी हो सकते हैं। भारत सरकार द्वारा तय नियमों के मुताबिक अनेक वस्तुओं के उद्योगों वाले ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ का न्यूनतम क्षेत्रफल १००० हेक्टेयर होना चाहिए। एक वस्तु या सेवा के क्षेत्र ( जैसे हीरा - जवाहरात या जैव - तक्नालाजी या सूचना तकनालाजी ) न्यूनतम १० हेक्टेयर तक भी हो सकते हैं।
भारत सरकार ने यह भी छूट दी है कि इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के कुल क्षेत्रफल में उद्योगों की इकाइयों का क्षेत्रफल ३५ प्रतिशत से ज्यादा करने की बाध्यता नहीं होगी। दूसरे शब्दों में ६५ प्रतिशत तक जमीन पर आवासीय कालोनी , रेस्तराँ , मल्टीप्लेक्स , मनोरंजन केन्द्र , शापिंग माल , गोल्फ़ कोर्स , हवाई अड्डा , स्कूल , अस्पताल आदि बनाये जा सकते हैं। कहने को तो ये सुविधाएं ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ के अन्दर के उद्योगों व इकाइयों में कार्यरत मजदूरों व कर्मचारियों के लिए होगी , किन्तु क्षेत्र के बाहर के लोगों को भी इनका इस्तेमाल करने से रोकने का कोई तरीका तो नही होगा। इसका मतलब यह भी है कि निर्यात संवर्धन की आड़ में कई अन्य धन्धे भी यहाँ पनप सकते हैं। महानगरों के पास सस्ती जमीन , करों में छूट और बाहर से सीमेन्ट , इस्पात , लिफ्ट , बिजली उपकरण आदि चीजें निशुल्क आयात करने की सुविधा के कारण कई जमीन - जायदाद का धन्धा करने वालि निर्मान कंपनियों के लिए भी ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ का आकर्षण बढ़ गया है। राहेजा , यूनिटेक , डीएलेफ़ , युनिवर्सल आदि ऐसी ही कंपनियां हैं जो ‘ विशेष आर्थि क्षेत्र बनाने तथा विकसित करने के लिए आगे आ गयी हैं।
इसी प्रकार , विशेष आर्थिक क्षेत्र कानून में विनिर्माण की परिभाषा इतनी व्यापक रखी गयी है कि उसमें रेफ्रिजरेशन ( प्रशीतन ) , रंगाई , कटाई , मरम्मत करना , पुननिर्माण , पुन: इंजीनियरिंग आदि को भी विनिर्माण मान लिया गया है। इसका मतलब है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र में वास्तविक उत्पादन न हो कर कहीं और हो , सिर्फ वहाँ एक मामूली गतिविधि की इकाई डालकर तमाम कर-छूटों का लाभ उठाया जा सकता है।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ बनाने के लिए कोई भी सरकारी या निजी कंपनी आवेदन कर सकती है। राज्य सरकार से सहमति लेने के बाद केन्द्र सरकार को आवेदन किया जा सकता है। इन आवेदनों पर शीघ्र फैसला लेने के लिए , इसे काफ़ी प्राथमिकता देते हुए भारत सरकार ने रक्षा मन्त्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता मे मन्त्रियों की एक समिति बना दी है , जिसे ‘ मन्त्रियों का अधिकार प्राप्त समूह ‘ नाम दिया गया है। इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के लिए जमीन हासिल करने का काम वैसे तो इन्हें विकसित करने वाली कंपनियों को स्वयं खुले बाजार में करना चाहिए। लेकिन इन्हें सुविधा देने की होड़ में लगी राज्य सरकारें स्वयं भूमि अधिग्रहित करके सस्ती दरों पर इन्हें दे रही हैं। बाजार की प्रचलित दरों से काफी कम दरों पर जमीन मिलने से इन कंपनियों की पौ-बारह हो गयी है।
खूब कमाई , करों से मुक्ति , सस्ती जमीन आदि कारणों से ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ बनाने के लिए अचानक दौड़ व होड़ मच गयी है। विशेष आर्थिक क्षेत्र का कानून बनने से पहले भारत में पन्द्रह विशेष आर्थिक क्षेत्र काम कर रहे थे - कांडला , सूरत , मुम्बई , कोच्चि , नोएडा , विशाखापत्तनम , इन्दौर , जयपुर , फाल्स , मनिकंचन , साल्ट लेक , और चेन्नई में तीन। अब लगभग १६४ नए प्रस्ताव केन्द्र सरकार स्वीकृत कर चुकी है। इनमें ‘ तेल व प्राकृतिक गैस आयोग ‘ तथा ‘ गुजरात औद्योगिक विकास विगम ‘ के प्रस्तावों को छोड़ कर बकी सब निजी कंपनियों के प्रस्ताव हैं। देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की रिलायंस कम्पनी इनमें सबसे आगे है जिसके द्वारा नवी मुम्बई , हैदराबाद , गुड़गाँव (हरियाणा) और जामनगर (गुजरात) में विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं। कलकत्ता के पास बनाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार से भी उसकी वार्ता चल रही है। एस्सार , भारत फोर्ज , अदारी , विप्रो , सत्यम , बायोकोन , बजाज , नोकिया , केदिला , डा. रेड्डी आदि उद्योग जगत के अनेक बड़े नाम विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने में लग गए हैं। दिल्ली से नजदीकी के कारण हरियाणा व पंजाब में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लगभग ५० प्रस्ताव आ चुके हैं। मात्र गुड़गाँव के पास १२ विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के प्रस्ताव हैम , जिनमें आठ को स्वीकृति मिल चुकी है। गुजरात में १९ विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लगभग ५० प्रस्ताव विचाराधीन हैं। यह दावा किया जा रहा है कि जो १४८ प्रस्ताव पहले स्वीकृत हुए हैं , वे कुल ४०,००० हेक्टेयर (अर्थात एक लाख एकड़) क्षेत्र में फैले हुए होंगे और उनमें १,००,००० करोड़ रुपए का पूंजी निवेश होगा तथा उससे लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा।
‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ के नाम पर ये उम्मीदें , दावे और खुशफ़हमियाँ काफ़ी सन्देहास्पद हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि निर्यात - संवर्धन के नाम पर बनाए जा रहे इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किसानों और गाँवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है तथा उन्हें उजाड़ा जा रहा है। मुम्बई के पास नवी मुम्बई से लगा ३५००० एकड़ का रिलायन्स का ‘ महामुम्बई विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ तो इतना विशाल है कि यह मुम्बई महानगर के एक तिहाई क्षेत्रफल के बराबर है। इनमें ४५ गाँवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है। एक बार पहले ८० के दशक में ‘नवी मुम्बई’ बनाने के लिए वहाँ विस्थापन हो चुका है। यह दूसरा विस्थापन है। इससे अनेक किसान ,मछुआरे , नमक - मजदूर और अन्य गाँववासी बरबाद हो जाएंगे। उनकी जमीन की कीमत लगभग २० से ४० लाख रुपये प्रति एकड़ है , किन्तु महाराष्ट्र सरकार सवा लाख से लेकर १० लाख रु. एकड़ की दर से उनकी जमीन ले कर रिलायन्स को देने की कोशिश में लगी है। यह कहा जा रहा है कि यह दुनिया क सबसे बड़ा ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ होगा। किन्तु उस क्षेत्र के लोगों के लिए तो यह सबसे बड़ा संकट बन गया है। इस प्रोजेक्ट का विरोध करने के लिए उन्होंने ‘ महामुम्बई शेतकरी संघर्ष समिति ‘ का गठन कर लिया है और विरोध में आन्दोलन शुरु कर दिया है। [ जारी ]

बुधवार, दिसंबर 20, 2006

कुछ और विशेष क्षेत्र : ले. राजकिशोर ( सामयिक वार्ता में )

कुछ और विशेष क्षेत्र : ले. राजकिशोर ( सामयिक वार्ता में )
सामयिक वार्ता/नवंबर,२००६ से लिया गया .
व्यंग्य
मुझे लगता है , भारत सरकार हमेशा अधूरा काम करती है . उसने राजनीतिक आजादी दी , पर आर्थिक आजादी देना भूल गयी .दलितों और पिछड़ों को आरक्षण दिया , पर पिछड़े वर्गों को इससे वंचित रखा . हिन्दी को राजभाषा बनाया , पर अंग्रेजी को छुआ तक नहीं . विशेष आर्थिक क्षेत्र , जहाँ पूँजीपतियों के हित में सभी कानूनों को स्थगित कर दिया जाएगा , बना कर सरकार अधूरे काम करने की अपनी परंपरा को ही निभा रही है . बाद में उसे अनेक विशेष क्षेत्र बनाने होंगे , इसका उसे खयाल तक नही है . देशप्रेमी होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि मैं उन विशेष क्षेत्रों को अभी से रखांकित कर दूं , जिनका निर्माण करने की जरूरत है .
विशेष राजनीतिक क्षेत्र : राजनीतिक दलों और उनके नेताओं का आचरण देख कर लग रहा है कि देश का वातावरण उनकी भावनाऒं के अनुकूल या काफी नहीं रह गया है . कहीं पुलिस आड़े आ जाती है , कहीं सीबीआई जाँच करने लगती है . कभी लोक सभा से इस्तीफा देना पड़ जाता है , कभी विधान सभा से . ऐसे में कोई राजनीति क्या करेगा ? अत: राजनीतिग्यों के लिए जगह - जगह विशेष क्षेत्र बनाने चाहिए . इन क्षेत्रों में देश का कानून लागू नहीं होगा - आर्म्स एक्ट भी नहीं . यहाँ न थाने होंगे , न न्यायालय . वोट देने - लेने का तो सवाल ही नही उठता . जो सबसे मजबूत होगा , उसी का राज चलेगा . उसी को इस क्षेत्र का जन प्रतिनिधि माना जा सकेगा और वह जब चाहे , संसद में आ-जा सकेगा .
विशेष सांस्कृतिक क्षेत्र : संस्कृति के क्षेत्र में बहुत अराजकता दिखाई दे रही है . कोई सबको गेरुए वस्त्र पहनाना चाहता है , कोई कम से कम कपड़े पहन कर भारत के वस्त्र उद्योग को नष्ट कर रहा है,तो कोई रोज कम से कम एक बलात्कार से कम पर राजी नहीं है . जाहिर है कि इन सभी को विशेष सांस्कृतिक क्षेत्रों की जरूरत है . इन क्षेत्रों में लोगों को अपनी सांस्कृतिक रुचि के अनुसार जीने की पूरी छूट होगी वे चाहें तो दिन भर सड़कों पर घूमते हुए गाएँ - बजाएँ या शराब पी कर धुत रहें . कामुक चित्रों , संगीत , साहित्य , देह प्रदर्शन - किसी भी चीज पर रोक नहीं होगी . यहाँ तक कि नग्न हो कर विचरण करने का भी बुरा नहीं माना जाएगा . लोग चाहें तो ऐसे प्रयोग भी कर सकते हैं जिनके बारे में अभी तक सोचा भी नही गया है . विदेशी पर्यटक यहाँ खूब आएँगे , क्योंकि
यहाँ उन्हें वे आजादियाँ हासिल होंगी जो उनके अपने देश में भी उपलब्ध नहीं हैं . इससे हमारा जीडीपी ०.३४ प्रतिशत बढ़ेगा .
विशेष धार्मिक क्षेत्र : विशेष धार्मिक क्षेत्र का सृजन कर हम देश की अनेक धार्मिक समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं . कुछ हिंदुओं को शिकायत है कि भारत की व्यवस्था वेद - शास्त्र के प्रावधानों के मुताबिक नहीं चल रही है . सिखों और इसाइयों की अपनी - अपनी समस्याएँ हैं.इन शिकायतों के निवारण का एक ही तरीका है - विशेष धार्मिक क्षेत्रों की स्थापना . प्रत्येक धर्म के अनुयाइयों को अपना विशेष धार्मिक क्षेत्र बनाने की आजादी होगी . यहाँ का समाज धर्माचार्यों के निर्देशों के अनुसार चलेगा . मसलन हिन्दू क्षेत्र में मनुस्मृति क्षेत्र में चोरी करनेवाले का हाथ काट लिया जाएगा . दोनों क्षेत्रों में स्त्रियों को परदे में रहना होगा . सिख चाहे जितनी नंगी तलवार ले कर चल सकते हैं . इत्यादि - इत्यादि .
विशेष लाल - क्षेत्र : आदि काल से फलते - फूलते आए यौन व्यवसाय पर जब से सरकार ने रोक लगाई है , यौनकर्मियों के साथ - साथ रसिक नागरिकों का सुखपूर्वक जीना दूभर हो गया है . उनका कहना है कि लादा हुआ संयम संयम नही है . यौनकर्मियों का कहना है कि हमारे शरीर पर हमारा ही अधिकार न हो . यह कैसा न्याय विधान है ? कानूनी रोक के कारण बिजनेस तो मंदा नहीं पड़ा है . पर पुलिस वालों और स्थानीय गुण्डों को उनका हिस्सा देना पड़ता है .देश में जगह - जगह विशेष लाल क्षेत्र बना देने से नागरिकों और नागरिकाओं , दोनों का भला होगा . इस क्षेत्र में शारीरिक क्रीड़ा की विभिन्न भंगिमाओं के लिऎ खुली छूट होगी . रात चाहे कितनी गयी हो , किसी नागरिक से यह नहीं पूछा जाएगा कि वह कहाँ से आ रहा है या कहाँ जा रहा है . नागरिकाओं को उनके कंज्यूमर - फ़्रेंडलीनेस के लिए परेशान नही किया जाएगा .

रविवार, नवंबर 19, 2006

पानी की जंग : गोलबन्दिय़ां

तीसरी दुनिया के देशों में पानी के निजीकरण की कोशिशों को जनता के तीव्र प्रतिरोध का सामना करना पड रहा है.इन तीन बडी कम्पनियों ने आपस में तालमेल बनाया है तथा निजीकरण की पक्षधर नीति के निर्धारण हेतु विश्व बैंक और अमीर देशों की आर्थिक मदद से इन कम्पनियों ने कई गठबंधन बना रखे हैं.हर तीन साल पर आयोजित होने वाले विश्व जल मंच (वर्ल्ड वॊटर फोरम) के आयोजन में इन संगठनों की मुख्य भूमिका होती है . व्यापार जगत और सरकारों के नीति निर्धारकों के इस जमावडे में भी आन्दोलनकारियों ने विरोध की आवाजें बुलन्द की हैं.पिछले साल मार्च महीने में जापान के क्योटो शहर में दुनिया भर के जन-आन्दोलनों के प्रतिनिधियों ने माइक कब्जे में ले कर निजीकरण के दुष्परिणामों की दास्तान सुनाई.मेक्सिको के कान्कुन शहर का एक आन्दोलनकारी अपने हाथ में काला और बदबूदार पानी से भरा गिलास ले कर मंच पर चढ गया.उसने बताया कि यह पानी वह अपने घर की टोटी से भर कर लाया है और उस नगर निगम का की जल - आपूर्ति सुवेज कम्पनी द्वारा होती है.उसने आयोजकों से निवेदन किया कि सुवेज के मुख्य कार्यपालक अधिकारी को मंच पर निमंत्रित कर वह गन्दा व बदबूदार पानी पीने को कहा जाए.
पानी व्यवसाय की यह बडी कम्पनियां अब रणनीति बदल रही हैं तथा उत्तरी अमेरिका व यूरोप के ज्यादा सुरक्षित बाजार में निवेश कर रही हैं.संयुक्त राज्य अमेरिका की जल आपूर्ति की सेवा का पचासी प्रतिशत अभी भी सार्वजनिक क्षेत्र में है. इन तीन बडी कम्पनियों ने आगामी दस सालों में अमरीका की सत्तर फ़ीसदी जल-आपूर्ति-सेवा पर कब्जा करने का लक्ष्य रखा है.अमरीका के छोटे कस्बों और समुदायों के बीच जल आपूर्ति करने वाली कई कम्पनियों को इन तीन बडी कम्पनियों ने खरीद लिया है.
छोटी-छोटी कम्पनियों के विलय से बनी विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनी जब नगर निगमों की जल -आपूर्ति अपने हाथों में लेती है तब ऐसा लगता है कि यह सिर्फ़ स्थानीय समस्या है.परन्तु इन्हीं कार्पोरेट खिलाडियों द्वारा दुनिया भर में लोगों के साथ करतूतें की जा रही है उसके मद्दे नजर जनता को भी आपस में सम्पर्क बढाना चाहिए तथा समन्वय बनाना चाहिए ताकि हम एक-दूसरे के अनुभवों से सीख ले सकें तथा सीधे हमले की शुरुआत कर सकें.
हमारी स्थानीय कार्रवाइयां तीन जागतिक उसूलों से संचालित होनी चाहिए.पहला उसूल है कि जल संरक्षण की आवश्यकता व पानी की कमी को हल्के में नहीं लिया जा सकता . पानी कहीं प्रचुर है तो कहीं इसका घोर अभाव है इसलिए जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी.पानी एक मौलिक मानवाधिकार है ,यह दूसरा उसूल है.जीने के लिए पानी जरूरी है.सभी लोगों को समानरूप से पानी मिलना चाहिए उसकी कीमत चुकाने की औकात से नहीं . तीसरा सिद्धान्त जल- लोकतंत्र का है.अपने सबसे मूल्यवान संसाधन की जिम्मेदारी हम सरकार में बैठे नौकरशाहों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कत्तई नहीं सौंप सकते हैं . इन लोगों की नीयत भले ही अच्छी हो अथवा बुरी. हमें इस बुनियादी उसूल को बचाना होगा,उसके लिए संघर्ष करना होगा तथा अपनी उचित भूमिका निभाते हुए जल-लोकतंत्र की मांग करनी होगी.

शुक्रवार, नवंबर 17, 2006

पानी की जंग ( गतांक से आगे )

विश्वव्यापार संगठन के सेवाओं के व्यापार से सम्बन्धित नियम भी जल आपूर्ति के निजीकरण को बढावा देंगे.इन नियमों के तहत सभी देशों पर न सिर्फ़ सार्वजनिक जल-प्रणालियों से सरकारी नियंत्रण हटाने और निजीकरण करने का दबाव होगा अपितु किसी शहर की जल वितरण प्रणाली यदि किसी विदेशी कम्पनी के हाथों चली जाती है तो उसे वापस जनता के नियंत्रण में लेना विश्वव्यापार संगठन द्वारा भारी जुर्माना न्योतना होगा.
पानी के निजीकरण की मुहिम की रहनुमाई यूरोप शित तीन विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कर रही हैं - विवेन्डी (फ़्रान्स ) , सुवेज (फ़्रान्स) , आर.डब्ल्यू.ई (जर्मनी).वर्ष २००१ में पानी से प्राप्त इनकी आमदनी क्रमश: ११.९० अरब , ८.८४ अरब तथा २.८ अरब डॊलर थी.इन तीनों कम्पनियों ने दुनिया भर के पानी व्यापार पर हावी होने के लिए छोटी - छोटी प्रतिद्वन्द्वी कम्पनियों को खरीद लिया है.शुरु में तीसरी दुनिया के पानी के संकट का तारनहार बनने की आस में तथा प्रयास में इन कम्पनियोंने सार्वजनिक जल वितरण व्यवस्था पर कब्जा जमाने की दूरगामी रणनीति बनाई.परन्तु तीसरी दुनिया के देशों में इनकी कोशिशों को मुंह के बल गिरना पडा और उनके इस अभियान की गाडी पटरी से उतर गयी.
ब्वेनॊस एरिस (अर्जेन्टीना की राजधानी) का प्रकरण विशेष रूप से सबक देने वाला था.तीसरी दुनिया में पानी के निजीकरण की यह महत्वपूर्ण योजना थी.सुवेज ने अपनी आनुषंगिक कम्पनी अगुआस अर्जेन्टीनास के द्वारा इस शहर की जल-आपूर्ति तथा सीवर व्यवस्था को अधिगृहीत किया.पुरानी पड चुकी वितरण व्यवस्था के नवीनीकरण हेतु सार्वजनिक क्षेत्र में धन का अभाव रहता है तथा निजी कम्पनियांकमी को पूरा कर सकती हैं-निजीकरण के पक्ष में यह तर्क आम तौर पर दिया जाता है.इस मामले में सुवेज कम्पनी के निजीकरण के प्रयोग हेतु आवश्यक एक अरब डोलर की ९७ फ़ीसदी पूंजी के हिस्से की पूर्ति विश्व बैक,अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष व अन्य छोटे बैंकों ने की.जल-आपूर्ति व सीवर व्यवस्था में मामूली बढोतरी के बावजूद सुवेज कम्पनी दोनों कार्यों में निर्धारित लक्ष्य प्राप्त नही कर सकी.यह गौरतलब है कि ९० के दशक के बीच के वर्षों में कम्पनी ने सालाना २५ फ़ीसदी मुनाफ़ा भी कमा लिया.हाल ही में सुवेज ने अर्जेन्टीना छोडने की घोषणा कर दी है.कम्पनी ने कहा है कि उस देश के मुद्रा संकट के कारण उसे कम मुनाफ़ा मिल रहा है.निजीकरण की योजनाएं जोहानस्बर्ग और मनीला में भी लडखडाई हैं.गंगा नदी से निकली गंग नहर से नई दिल्ली के सोनिया विहार में जल-आपूर्ति की योजना भी इसी सुवेज के हवाले है.सर्वाधिक प्रसिद्ध मामला दक्षिण अमेरिकी देश बोलिविया के एक बडे शहर कोचाबाम्बा का है.१९९९ में बेकटेल कम्पनी द्वारा इस शहर की जल -आपूर्ति की बागडोर संभालने के बाद पानी का रेट इतना बढ गया कि कई लोगों को अपनी आमदनी का बीस फ़ीसदी पानी के लिए खर्च करना पडा.नागरिकोख द्वारा इस फ़ैसले का तीव्र प्रतिकार हुआ.पुलिस दमन में छ; लोगों की मृत्यु हुई.अन्तत: सरकार ने बेकटेल कम्पनी से हुए करार को खारिज कर दिया और कहा कि यदि वह उस देश में टिकी रही तो उसकी सुरक्षा की गारण्टी लेने में सरकार असमर्थ होगी.

पानी की जंग , ले.- मॊड बार्लो , टोनी क्लार्क

[लेखक परिचय :
मॊड बार्लो - कैनेडा के सबसे बडे जनसंगठन ‘काउन्सिल ओफ़ कैनेडियन्स’ की अध्यक्षा.वैनकूवर ,टोरेन्टो तथा हेलिफैक्स शहरों में पानी के निजीकरण के विरुद्ध यह संगठन सक्रिय है.पानी के निगमीकरण पर टोनी क्लार्क के साथ लिखी गयी चर्चित पुस्तक ‘ब्लू गोल्ड’ की लेखिका.
टोनी क्लार्क - लोकतांत्रिक समाज परिवर्तन के संघर्ष्हेतु जन आन्दोलनों प्रशिक्षित करने वाली संस्था पोलारिस इन्स्टीट्यूट के निदेशक.वैश्वीकरण विरोधी आन्दोलन के नेता. ]
स्कूल में हमें पढाया जाता है कि पृथ्वी का जल-चक्र एक बन्द प्रणाली है . अर्थात वर्षा और वाष्पीकरण द्वारा सतत रूप बदलता पानी पृथ्वी के वातावरण में जस का तस बना हुआ है. न सिर्फ़ पृथ्वी के निर्माण के समय हमारे ग्रह पर जितना पानी था वह बरकरार है अपितु यह यह पानी वह ही है. जब कभी आप बरसात में टहल रहे हों तब कुछ रुककर कल्पना कीजिए - बूंदें जो आप पर गिर रही हैं कभी डिनासार के खून के साथ बहती होंगी अथवा हजारों बरस पहले के बच्चों के आंसुओं में शामिल रही होंगी.
पानी की कुल मात्रा बरकरार रहेगी फिर भी यह मुमकिन है कि इन्सान उसे भविष्य में अपने और पृथ्वी के उपयोग के लायक न छोडे.पीने के पानी के संकट की कई वजह हैं.पानी की खपत हर बीसवें साल में प्रति व्यक्ति दुगुनी हो जा रही है तथा आबादी बढने की तेज रफ़्तार से यह दुगुनी है. अमीर औद्योगिक देशों की तकनीकी तथा आधुनिक स्वच्छता प्रणाली ने जरूरत से कहीं ज्यादा पानी के उपयोग को बढावा दिया है.व्यक्तिगत स्तर पर पानी के उपयोग की इस बढोतरी के बावजूद घर - गृहस्थी तथा नगरपालिकाओं में मात्र दस फ़ीसदी पानी की खपत होती है.
दुनिया के कुल ताजे पानी की आपूर्ति का २० से २५ प्रतिशत उद्योगों द्वारा इस्तेमाल होता है.उद्योगों की मांग भी लगातार बढ रही है.सर्वाधिक तेजी से बढ रहे कई उद्योग पानी की सघन खपत करते हैं.मसलन सिर्फ़ अमरीकी कम्प्यूटर उद्योग द्वारा सालाना ३९६ अरब लीटर पानी का उपयोग किया जाएगा.
सर्वाधिक पानी की खपत सिंचाई में होती है.मानव द्वारा प्रयुक्त कुल पानी का ६५ से ७० फ़ीसदी हिस्सा सिंचाई का है.औद्योगिक खेती (कम्पनियों द्वारा खेती) में निरन्तर अधिकाधिक पानी की खपत के तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं.कम्पनियों द्वारा सघन सिंचाई वाली खेती के लिए सरकारों तथा करदाताओं द्वारा भारी अनुदान भी दिया जाता है . अनुदान आदि मिलने के कारण ही कम सिंचाई के तौर-तरीके के प्रति इन कम्पनियों को कोई आकर्षण नही नही होता.
जनसंख्या वृद्धि तथा पानी की प्रति व्यक्ति खपत में वृद्धि के साथ - साथ भूतल जल-प्रणालियों के भीषण प्रदूषण के कारण शेष बचे स्वच्छ और ताजे पानी की आपूर्ति पर भारी दबाव बढ जाता है.दुनिया भर में जंगलोंका विनाश , कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों से प्रदूषण तथा ग्लोबल वार्मिंग के सम्मिलित प्रभाव से पृथ्वी की नाजुक जल प्रणाली पर हमला हो रहा है.
दुनिया में ताजे पानी की कमी हो गयी है.वर्ष २०२५ में विश्व की आबादी आज से से २.६ अरब अधिक हो जाएगी.इस आबादी के दो-तिहाई लोगों के समक्ष पानी का गंभीर संकट होगा तथा एक तिहाई के समक्ष पूर्ण अभाव की स्थिति होगी.तब पानी की उपलब्धता से ५६ फ़ीसदी ज्यादा की मांग होगी.
दिनोंदिन बढती मांग और संकुचित हो रही आपूर्ति के कारण बडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की रुचि इस क्षेत्र में जागृत हुई है जो पानी से मुनाफ़ा कमाना चाहती हैं.विश्व-बैंक द्वारा पानी-उद्योग को एक खरब डॊलर के उद्योग के रूप में माना जा रहा है तथा बढावा दिया जा रहा है.विश्व बैंक द्वारा सरकारों पर दबाव है कि वे जल-आपूर्ति की सार्वजनिक व्यवस्था निजी हाथों में सौंप दें.पानी इक्कीसवीं सदी का ‘नीला सोना’ बन गया है.
उदारीकरण ,निजीकरण,विनिवेश आदि दुनिया के आर्थिक दर्शन पर हावी हैं.यह नीतियां ‘वाशिंगटन सहमति’ के नाम से जानी जाती हैं. पानी का निजीकरण इन नीतियों से मेल खाता है.यह दर्शन सरकारों को सामाजिक कार्यक्रमों की जिम्मेदारी तथा संसाधनों के प्रबन्धन से मुंह मोड लेने की सलाह देता है ताकि निजी क्षेत्र उनका स्थान ले लें.इस मामले में यह ‘सबके लिए पानी’ की प्राचीन सोच पर सीधा हमला है.
पानी के व्यवसाय से जुडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथ में सबसे जरूरी औजार विश्व व्यापार समझौते मुहैय्या कराते हैं.विश्व व्यापार संगठन और नाफ्टा (उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार सन्धि) जैसे बहुराष्ट्रीय प्रबन्ध निकाय पानी को व्यापार की वस्तु के रूप में परिभाषित करते हैं.नतीजन जो नियम पेट्रोल और प्राकृतिक गैस के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को संचालित करते हैं वे पानी पर भी लागू हो गये हैं.इन अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के तहत कोई भी देश पानी के निर्यात पर यदि प्रतिबन्ध लगाता है अथवा उसे सीमित करता है तो वह देश विश्वव्यापार संगठन की नाराजगी और निन्दा का भागी होगा . पानी के आयात से इन्कार किया जाना भी प्रतिबन्धित होगा.नाफ्टा सन्धि की एक धारा के तहत यदि कोई देश अपने प्राकृतिक संसाधनों का निर्यात शुरु करता है तो वह उस पर तब तक रोक नहीं लगा सकता जब तक वह संसाधन समाप्त न हो जाए.[ जारी ]