मंगलवार, मार्च 06, 2007

उपभोक्तावादी संस्कृति (२) : सच्चिदानन्द सिन्हा






गत प्रविष्टी से आगे


उपभोक्तावादी संस्कृति


जब हम उपभोक्तावादी संस्कृति की बात करते हैं तो उपभोग तथा उपभोक्तावाद में फरक करते हैं । उपभोग जीवन की बुनियादी जरूरत है । इसके बगैर न जीवन सम्भव है और न वह सब जिससे हम जीवन में आनन्द का अनुभव करते हैं । इस तरह के उपभोग में हमारा भोजन शामिल है जिसके बिना हम जी नहीं सकते या कपड़े शामिल हैं जो शरीर ढकने के लिए और हमें गरमी , सरदी और बरसात आदि से बचाने के लिए जरूरी हैं । इस तरह जीवन की रक्षा करनेवाली या शरीर की तकलीफों को दूर करनेवाली दवाएँ , ऋतुओं के प्रकोप से बचाने के लिए घर , ये सब उपभोग की वस्तुएं हैं । औरतों और मर्दों द्वारा एक दूसरे को आकर्षित करने के श्रृंगार के कुछ साधन भी उपभोग की वस्तुओं में आते हैं ।यह बिलकुल प्राकृतिक और स्वाभाविक जरूरत है । मनुष्य में ही नहीं , पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों में भी नर और मादा के बीच आकर्षण पैदा करने के लिए सुन्दर रंगीन बाल , रोयें और पंख , भड़कीले रूप , मीठे संगीतमय स्वर तथा तरह-तरह की गंध प्रकृति की देन हैं । इन सब गुणों की उपयोगिता जीवों में विभिन्न मात्रा में रूप , रंग , गंध , स्वर आदि के प्रति स्वभाव से प्राप्त आकर्षण से आती है । यही स्वाभाविक आकर्षण एक ऊँचाई पर मनुष्यों में सौन्दर्यबोध को जन्म देता है । इसी बोध से मनुष्य विभिन्न कलाओं और विज्ञान को जन्म देता है । अपने परिवेश को नृत्य , संगीत , चित्र , मूर्त्ति आदि से सजाना या साहित्य और विज्ञान के जरिए अपने वातावरण का प्रतीकात्मक अनुभव करना , मनुष्य को सबसे ऊँचे दर्जे का आनन्द देता है । इस प्रक्रिया में निर्मित कलावस्तु , पुस्तक आदि सब मनुष्य के स्वाभाविक उपभोग के क्षेत्र में आते हैं । संक्षेप में उपभोग की वस्तुएँ वे हैं , जिसके अभाव में हम स्वाभाविक रूप से अप्रीतिकर तनाव का अनुभव करते हैं , चाहे वह भोजन के अभाव में भूख की पीड़ा से उत्पन्न हो अथवा संगीत एवं कलाओं के अभाव में नीरसता की पीड़ा से।


इसके विपरीत ऐसी वस्तुएँ , जो वास्तव में मनुष्य की किसी मूल जरूरत या कला और ज्ञान की वृत्तियों की दृष्टि से उपयोगी नहीं हैं लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से प्रचार के द्वारा उसके लिए जरूरी बना दी गयी हैं , उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं । पुराने सामंती या अंधविश्वासी समाज में भी ऐसी वस्तुओं का उपभोग होता था जो उपयोगी नहीं थीं बल्कि कष्टदायाक थीं - उदाहरण के लिए चीन में कुलीन महिलाओं के लिए बचपन से पाँव को छोटे जूते में कसकर छोटा रखने का रिवाज । लेकिन यह प्रचलन औरतों की गुलामी और मर्दों की मूर्खता का परिणाम था । अत: शोषण की समाप्ति या चेतना बढ़ने के साथ इसका अंत होना लाजमी था । लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति ऐसी वस्तुओं को शुद्ध व्यावसायिकता के कारण योजनाबद्ध रूप से लोगों पर आरोपित करती है और मनोविज्ञान की आधुनिकतम खोजों का इसके लिए प्रयोग करती है कि इन वस्तुओं की माया लोगों पर इस हद तक छा जाये कि वे इनके लिए पागल बने रहें ।


विज्ञापन का जादू


एक उदाहरण बालों को सघन और काला रखने की दवाओं तथा तेलों का है । सर्वविदित है कि अभी तक बालों को गिरने या सफेद होने से रोकने का कोई उपचार नहीं निकला है । लेकिन हर रोज ऐसे विज्ञापन निकलते रहते हैं जो लोगों में यह भ्रम पैदा करते हैं कि किसी खास दवा या तेल से उनके बालों की रक्षा हो सकती है और इनसे प्रभावित हो कर लोग इन उपचारों पर अंधाधुंध खरच करते हैं । यही हाल दाँत के सभी मंजनों का है । अभी तक कोई ऐसा मंजन नहीं निकला है जो दाँतों की बीमारियों को दूर करे या उन्हें रोग लगने से बचाये। फिर भी पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठ चमकीले दाँतों वाली महिलाओं की तस्वीरों से भरे रहते हैं जो किसी न किसी कम्पनी के मंजन के चमत्कार के रूप में अपने दाँतों का प्रदर्शन करती होती है । एक के बाद एक सभी दाँतों के खराब हो जाने के बाद भी लोग उपचार कि दृष्टि से मंजनों की निरर्थकता नहीं देख पाते । ऐसा गहरा असर इस प्रचार के जादू का होता है । यह स्थिति बिलकुल अशिक्षित समाज में जादू-टोने के प्रति फैले अन्धविश्वास से भिन्न नहीं है । लेकिन इस अन्धविश्वास के शिकार मूल रूप से शिक्षित कहे जाने वाले लोग ही हैं ।


किसी विशेष कम्पनी की साड़ी में सजी सुन्दर औरत , सूट में सजा सुन्दर नौजवान , कोका-कोला की बोतलें लिए समुद्र तट के रमणीक महौल में खड़े सुन्दर स्त्री-पुरुष , विशेष कम्पनी के बेदिंग सूट में समुद्र तट पर क्रीड़ा करती बालाएँ । इन सब के भड़कीले इश्तहार एक ऐसा मानसिक महौल तैयार करते हैं कि लोग मॉडलों ( इश्तहार के सुन्दर स्त्री-पुरुष ) की सुन्दरता का राज विभिन्न तरह के परिधानों और कोका-कोला में देखने लगते हैं । बड़ी तोंदवाले लालाजी और दो क्विंटल वजनवाली सेठानी भी इन कम्पनियों का सूट या बेदिंग सूट पहने विज्ञापन के मॉडलों जैसे अपने रूप की कल्पना करने लगती हैं । फिर दुकान में इन कम्पनियों के परिधानों और कोका-कोला की तलाश शुरु हो जाती है । इस तरह धीरे-धीरे सुन्दरता का अर्थ मनुष्य की स्वाभाविक सुन्दरता , जो उसके स्वास्थ्य और स्वभाव से आती है , नहीं रहकर खास-खास कम्पनियों के बने मोजे से ले कर टोपी तक में सजावट बन जाता है । सुन्दरता का मतलब खास तरह के परिधानों में सजना या खास तरह के क्रीम पाउडर से पुता होना बन जाता है । सुन्दर शब्द भी अब फैशन से बाहर होता जा रहा है , उसका स्थान 'स्मार्ट' ने ले लिया है जिसका सीधा सम्बन्ध , लिबास सजधज और अप-टू-डेट आदि से है । प्रचलित फैशन से सुन्दरता की परिभाषा कैसे बदल सकती है उसका एक उदाहरण हम रंग की मैचिंग में देख सकते हैं । सौन्दर्य की दृष्टि से एक ही रंग की मैचिंग यानी एक ही रंग का सारा लिबास रखना , भोंडी चीज है । सौन्दर्य रंगों की विविधता और उनके उपयुक्त संयोजन से आता है । इसी कारण राजस्थान की सरल ग्रामीण महिलाएँ अपने सस्ते लिबास में भी रंगों के उचित संयोजन से जहाँ इकट्ठी होती हैं फूलों की क्यारियों सी सज जाती हैं । लेकिन मैचिंग का पागलपन सवार हो जाने से जहाँ एक हैण्डबैग , एक जोड़ा जूता या चप्पल तथा एक रंग की लिपिस्टिक से काम चल सकता था वहाँ अब हर कपड़े के रंग के साथ सब कुछ उसी रंग का होना चाहिए ।इस तरह अब एक की जगह आधे दर्जन सामान खरीदने की जरूरत हो जाती है । पर सबसे हास्यास्पद तो यह होता है कि काले या नीले कपड़ों से मैच करने के लिए लाल होंठोंवाली सुन्दरियाँ होंठ काले या नीले रंग में रंगने लगती हैं । इस तरह की मूर्खतापूर्ण सजावट का फैशन फैलाने से लिपिस्टिक बनाने वाली कम्पनियों को अपना व्यापार बढ़ाने का सीमाहीन सुयोग प्राप्त हो जाता है ।


यह सोचा जा सकता है कि अगर भिन्न रंग के कपड़े इकट्ठे हो गये तो वे हि कपड़े अदल-बदल कर ज्यादा दिन पहने जा सकते हैं । लेकिन ऐसा भी नहीं हो पाता , क्योंकि एक सुनियोजित ढंग से फैशन-प्रदर्शनों और प्रचार के द्वारा ऐसा मानसिक वातावरण तैयार कर दिया जाता है कि फैशन जल्दी-जल्दी बदल जायें । इस साल का बनाया कपड़ा अगले साल तक फैशन के बाहर हो जाता है और लोग इसका साहस नहीं जुटा पाते कि 'संभ्रान्त' लोगों की मंडली या दफ्तर आदि में ऐसे 'आउट ऑफ डेट' लिबास में पहुँचें ।इस तरह धड़ल्ले से कपड़े , जूते , टोपी आदि का बदलाव होता रहता है । लोग मजबूरी में ही एक दो साल पहले का बनाया हुआ कोई कपड़ा पहनते हैं । पश्चिमी देशों में तो एक तरह की 'थ्रो अवे' संस्कृति , (जिसकी छाया हमारे यहाँ भी पड़ रही है) फैल रही है , यानी ऐसी चीजों का उत्पादन और प्रयोग बढ़ रहा है जिन्हें कुछ समय या एक ही बार उपयोग में लाकर फेंक दिया जाय ।


लेकिन इस संस्कृति को फैलाने के लिए की जाने वाली विज्ञापनबाजी का बोझ भी वे ही लोग ढोते हैं जिनके सिर पर यह संस्कृति लादी जाती है । सबसे पहले तो कम्पनियों द्वारा प्रचारित वस्तुओं की कीमत का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापन पर खरच होता है । कभी-कभी तो कम्पनियाँ उत्पादन से अधिक खरच अपनी वस्तुओं को प्रचारित करने में करती हैं । इस विज्ञापनबाजी के लिए काफी खरचीले शोध होते रहते हैं । पर परोक्ष रूप से विज्ञापन का बोझ फिर दुबारा उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है । विज्ञापन पर किए गए खरच को अपनी लागत में दिखलाकर कम्पनियाँ आयकर में काफी कटौती करा लेती हैं । कम्पनियों पर की कटौती से आम लोगों पर वित्तीय बोझ बढ़ता है । इस तरह विज्ञापनबाजी से लोगों पर दुहरी आर्थिक मार पड़ती है ।


( आगे : कृत्रिमता ही जीवन )



1 टिप्पणी:

  1. उपभोक्ता आंदोलन कर्मियो के लिए चुनोती है।फैशन विज्ञापन से लड़ना।मै 1980 से उपभोक्ता समस्या समाधान पर कार्यरत हूँ।आवश्यकता सुविधा व् विलासिता के अंतर को समझाना व् समझना कठिन है

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