सोमवार, नवंबर 27, 2006

गांधी गीता और गोलवलकर

“जहाँ एक ओर गीता अहिंसा की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ़ हिंसा को भी परिस्थिवश ज़रूरी मानती है। लेकिन गांधी जी ने गीता से केवल अहिंसा का सिद्धान्त लेकर बाक़ी सब कुछ नकारने की चेष्टा की है।” यहां
हिन्दी चिट्ठेबाजों में ऐसी समझदारी वालों की मौजूदगी के बारे में ‘एक खोजो हजार मिलेंगे,मत खोजो तो पुनीत - पंकज तो हैं ही’ वाली कानपुरिया शैली में कहा जा सकता है .कहावत में यह जोड़ा जा सकता है कि हर जमाने में ऐसे लोगों के बारे में ” … की कमी नहीं है जहां में ऐ-’ग़ालिब’ “.
गांधी की हत्या के कुछ समय पहले से देखा जाए तो ऐसे ‘अपने जी’ लोगों के ‘गुरुजी’ गोलवलकर प्रमुख थे जिनकी शताब्दी मनाई जा रही है . गांधी की गीता के बारे में समझदारी और प्रतीक - पंकज - गोलवलकर जैसों की समझदारी में जो फ़रक है वह स्पष्ट करने के लिए यहां गांधी जी के सचिव प्यारेलाल की प्रसिद्ध पुस्तक पूर्णाहुति चतुर्थ खण्ड से एक छोटा सा प्रसंग दिया जा रहा है .वैसे सितम्बर ,१९४७ में ‘संघ’ के अधिनायक गोलवलकर से गांधी जी की मुलाकात , विभाजन के बाद हुए दंगों में तथा गांधी - हत्या (संघियों के शब्दों में ‘गांधी - वध’ ) में संघ की भूमिका का विस्तार से वर्णन है .
--गोलवलकर से गांधी जी के वार्तालाप के बीच में गांधी - मंडली के एक सदस्य बोल उठे - ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है . उन्होंने अनुशासन , साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है.’ गांधी जी ने उत्तर दिया - ‘ परंतु यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फ़ासिस्टों ने भी यही किया था.’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘ तानाशाही दृष्टीकोण रखनेवाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया.(पूर्णाहुति,चतुर्थ खण्ड,पृष्ट १७)
अपने एक सम्मेलन में गांधीजी का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता ने उन्हें ‘हिन्दू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया . उत्तर में गांधीजी बोले - ‘ मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है.परंतु मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी है . हिन्दू धर्म की विशिष्टता , जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है . यदि हिन्दू यह मानते हों कि भारत में अ-हिन्दुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हे घटिया दरजे से संतोष करना होगा… तो इसका परिणाम यह होगा कि हिन्दू धर्म श्रीहीन हो जाएगा . .. मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जानेवाला यह आरोप सही हो कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा.’
इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया - ‘क्या हिन्दू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता ? यदि नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है ,उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है ?’
गांधीजी ने कहा -’पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है . मारने का प्रश्न खडा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्नय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है ? दूसरे शब्दों में , हमें ऐसा अधिकार मिल सकता जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जांए . एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने अथवा फ़ांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है ? रही बात दूसरे प्रश्न की.यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है , तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली भांति कर सकती है .अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद दोनों एक साथ बन जायें तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जांएगे.. उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए,कानून को अपने हाथों में ले कर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए .[ सम्पूर्ण गांधी वांग्मय , खण्ड : ८९]

1 टिप्पणी:

  1. अति हर चीज की बुरी होती है. अगर अति हिंसा खराब हैं तो अति अंहिसा भी खराब है. गाँधी अपने सिद्धांतो के साथ अति करते रहे, उन्हे थोपते रहे थे. दुसरे विचारों को समझने की उनकी उपयोगीता जानने की क्षमता नहीं थी, वरना सुभाषचन्द्र बोस को कॉंग्रेस से बाहर न किया जाता.
    वर्तमान में सोचे तो, तिबती प्रजा अगर हथियार उठाती तो क्या आज चीन से स्वतंत्र न होती.

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