सोमवार, नवंबर 20, 2006

स्कूलों में शीतल पेय

बच्चों के स्वास्थ्य पर शीतल पेयों के प्रभाव के सन्दर्भ में अमेरिकी बाल-रोग अकादमी का नीति वक्तव्य के प्रमुख अंश :
” अधिक मात्रा में शीतल पेय पीने से उत्पन्न स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए स्कूल बोर्डों को एहतियात के तौर पर इनकी बिक्री पर रोक लगानी चाहिए.बच्चों की रोजाना खुराक में ये पेय अतिरिक्त चीनी का मुक्य स्रोत हैं . इन पेयों के १२ आउन्स के एक टिन अथवा मशीन से परोसी गयी इतनी ही मात्रा में १० चम्मच चीनी का प्रभाव रहता है . ५६ से ८५ प्रतिशत स्कूली बच्चे हर रोज कम से कम एक बार यह पेय अवश्य पीते हैं . शीतल पेय पीने की मात्रा बढने के साथ - साथ दूध पीने की मात्रा घटती जाती है . इन चीनीयुक्त शीतल पेयों के पीने से मोटापा बढने का सीधा सम्बन्ध है.मोटापा आज-कल अमेरिकी बच्चों की प्रमुख समस्या है . अन्य बीमारियों में दांतों में गड्ढे पडना तथा दंत वल्क का क्षरण प्रमुख हैं . स्कूल स्थित दुकानों , कैन्टीनों व खेल - कूद आदि के मौकों पर यह उत्पाद सर्वव्यापी हो जाते हैं . स्कूलों की आय का पर्याप्त प्रमाण इन पेयों की बिक्री से आता है परन्तु इनके विकल्प के तौर पर पानी , फलों के रस तथा कम-वसा युक्त दूध बिक्री हेतु मुहैया कराया जा सकता है ताकि आमदनी भी होती रहे.”
इस नीति में इस बात का संकल्प भी है कि बाल-रोग चिकित्सक स्कूलों से इन मीठे शीतल पेयों के खात्मे के लिए प्रयत्न करेंगे . इसके लिए यह जरूरी होगा कि वे स्कूल के प्रशासनिक अधिकारियों , अपने मरीजों व अभिवावकों को शीतल पेय पीने के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षित करें .
इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि स्कूली-बच्चों तथा किशोरों पर शीतल पेयों के दुष्प्रभावों की बाबत अपनी बिगडी छवि में सुधार के लिए इन कम्पनियों ने ‘अमेरिकी बाल दन्त चिकित्सा अकादमी ‘ नामक संगठन को १० लाख डॊलर का अनुदान दे दिया तथा ‘राष्ट्रीय शिक्षक अभिवावक सम्घ’ की भी अनुदान दाता बन गयीं . बाल सरोकारों वाले ऐसे सम्मानित समूहों के साथ तालमेल बैठाने के बावजूद स्कूलों में शीतल पेयों के विरुद्ध अभियान जो पकड रहा है . कैलीफोर्निया राज्य ने एक कानून बना कर स्कूलों में कचरा खाद्य और शीतल पेयों पर लगा दी है . बीस अन्य राज्यों द्वारा ऐसी रोक लगाने पर विचार विमर्श शुरु हो चुका है.फिलादेल्फिया के स्कूल डिस्ट्रिक्ट के तहत २,१४,०० विध्यार्थी आते हैं.यहां की बोर्ड ने फैसला किया है कि इन स्कूलों में १ जुलाई २००४ से इन पेयों की जगह अब फलों के रस , पानी तथा दूध की बिक्री होगी .
[कोला कम्पनी द्वारा श्रमिकों की हत्या और उत्पीडन : अगली प्रविष्टि ]

1 टिप्पणी:

  1. और यह सब तो तब है, जब वहाँ शीतल पेय सभी मानकों के अनुरूप बनाए जाते हैं। भारत जैसे मुल्क में, जहाँ कोई मानक निर्धारित नहीं हैं, शीतल पेय के नाम पर साक्षात् विष बेचा जा रहा है। इस दिशा में लोगों को जागरूक करने की महती आवश्यकता है। आपका कार्य सराहनीय है।

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