गुरुवार, सितंबर 14, 2006

हिन्दी दिवस ( १४ सितंबर ): महात्मा गांधी के विचार

मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं , वे आत्महत्या ही करते हैं . यह उन्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करती है . विदेशी माध्यम से बच्चों पर अनावश्यक जोर पडता है . वह उनकी सारी मौलिकता का नाश कर देता है . विदेशी माध्यम से उनका विकास रुक जाता है और अपने घर और परिवार से अलग पड जाते हैं . इसलिए मैं इस चीज को पहले दरजे का राष्ट्रीय संकट मानता हू . ( विथ गांधीजी इन सीलोन , पृष्ट १०३ )

इस विदेशी भाषा के माध्यम ने बच्चों के दिमाग को शिथिल कर दिया है . उनके स्नायुओं पर अनावश्यक जोर डाला है , उन्हें रट्टू और नकलची बना दिया है तथा मौलिक कार्यों और विचारों के लिए सर्वथा अयोग्य बना दिया है . इसकी वजह से वे अपनी शिक्षा का सार अपने परिवार के लोगों तथा आम जनता तक पहुंचाने में असमर्थ हो गये हैं . विदेशी माध्यम ने हमारे बालकों को अपने ही घर में पूरा विदेशी बना दिया है . यह वर्तमान शिक्षा -प्रणाली का सब से करुण पहलू है . विदेशी माध्यम ने हमारी देशी भाषाओं की प्रगति और विकास को रोक दिया है . अगर मेरे हाथों में तानाशाही सत्ता हो , तो मैं आज से ही विदेशी माध्यम के जरिये हमारे लडके और लडकियों की शिक्षा बंद कर दूं और सारे शिक्षकों और प्रोफ़ेसरों से यह यह माध्यम तुरन्त बदलवा दूं या उन्हें बर्ख़ास्त करा दूं . मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इन्तजार नहीं करूंगा . वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे - पीछे चली आयेंगी . यह एक ऐसी बुराई है , जिसका तुरन्त इलाज होना चाहिये .

( हिन्दी नवजीवन , २ - ९- ‘२१ )

सोमवार, सितंबर 11, 2006

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बनारस तुझे सलाम !

मालेगांव में आतंकी घटना के बाद वहां की जनता ने आतंकियों के प्रतिक्रिया फैलाने के मक़सद को अपनी सूझ - बूझ से नाकामयाब कर दिया . उसे सलाम !इस मौके पर काशी में हुए ऐसे ही काण्ड के बाद ‘ साझा संस्कृति मंच ‘ द्वारा निकाले गये जुलूस में वितरित पर्चे को देना उचित है.काशी के बनारसीपन को झकझोरने की एक नापाक कोशिश गत मंगलवार को हुई . अपने विश्वास को संविधान , कानून , राष्ट्र और जनता से ऊपर समझने वाली घिनौनी , आतंकी कार्रवाई का मक़सद निरपराध इंसानों का कत्ल करना होता है ताकि प्रतिहिंसा , साम्प्रदायिकता और विघटन का एक और दौर शुरु हो जाए . बनारसीपन की जीत हुई . पूरा देश काशी की जनता के विवेक , मर्यादा और साहस से अभिभूत है .संकट की इस घडी में आम काशीवासियों की भूमिका पर गौर करें . गोदौलिया के पटरी व्यवसाइयों की मुस्तैदी ने एक और विस्फोट होने से पूर्व ही उसे विफल कर दिया . विस्फोटों में घायल हुए लोगों को अस्पतालों तक पहुंचाने और रक्तदान करने में स्वत:स्फूर्त ढंग से प्रकट बनारस की लोकशक्ति का दर्शन हुआ . सडक पर मौजूद एक एक ऒटोरिक्षा एम्ब्युलेंस बन गया था . बनारसियों के लिए काशी का मतलब हृदय का प्रकाश भी है . यह प्रकाश हमें दैहिक , दैविक और भौतिक सन्ताप से मुक्ति की शक्ति देता है -परहित सरिस धरम नहि भाई , पर पीडा सम नहि अधमाई .गोस्वामी तुलसीदास के इस संदेश के साथ - साथ हर बनारसी कबीर की इस चेतावनी को भी भली भांति समझता है कि -तन फाटे की औषधि , मन फाटे की नाहि .प्रतिवर्ष होली जलाते वक्त हम हिरण्यकश्यप की कुटिल चाल के नाकामयाब होने का स्मरण करते हैं . हिरण्यकश्यप चाहता था कि सब उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें . संविधान , क़ानून , राष्ट्र और जनता से ख़ुद को ऊपर समझने वाली हिरण्यकश्यप - वृत्ति आज भी देश की जनता की एकता , सद्भावना , परस्पर विश्वास और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर कुठाराघात का प्रयास कर रही हैं . साम्प्रदायिकता या आतंकवाद उसका आदेश मानने वाली बहिन होलिका की भांति हैं जिसके माध्यम से कई निर्दोष और मासूमों को अपना शिकार बनाने की कोशिशें होती हैं . काशी की जनता भक्त प्रह्लाद की भांति अग्निपरीक्षा में सफल हुई.

बुधवार, सितंबर 06, 2006

रामगोपाल दीक्षित

इस क्रान्ति दिवस ( ९ अगस्त ) पर १९७४ में 'क्रान्ति का बिगुल' बजाने वाले कवि और वरिष्ट गांधीवादी रामगोपाल दीक्षित की ८९ वर्ष की अवस्था में म्रुत्यु हो गयी .सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के दौर में लाखों की जन - मेदिनी को लोकनायक जयप्रकाश सम्बोधित करते थे.इन सभाओं की शुरुआत दीक्षितजी के क्रान्ति गीत से ही हो यह उनकी फ़रमाइश होती थी . आपातकाल के 'दु:शासन पर्व ' में 'तिलक लगाने तुम्हे जवानों , क्रान्ति द्वार पर आई है ' के रचयिता दीक्षितजी की उत्तर प्रदेश पुलिस को तलाश थी.
लोक शैली में आल्हा सुनाने तथा कथा - वाचन में निपुणता के कारण दीक्षितजी तरुण शान्ति सेना के शिबिरों के लोकप्रिय प्रशिक्षक थे .सच्चे अर्थों में राष्ट्रीयता ( राष्ट्रतोडक राष्ट्रवाद नहीं ), अनुशासन और दायित्व के बोध व निर्वाह के गुणों के कारण वे शान्ति सेना के 'तत्पर शान्ति सैनिक ' थे . सर्वोदय और सम्पूर्ण क्रान्ति से प्रेरित उनके गीत आन्दोलन को शक्ति देते थे और तरुणों के चित्त में त्वरा का संचार कर देते थे . बुन्देलख्ण्ड का होने की वजह से बागियों के आत्मसमर्पण के बाद बने चम्बल शान्ति मिशन से भी वे जुडे थे . तत्काल गीत रच देने और स्वर दे देने मे उन्हें प्रवीणता हासिल थी.
तरुण शान्ति सेना के शिबिरों में दीक्षितजी की कथा और गीतों के अलावा उनके द्वारा कराये जाने वाले खेलों का ज़िक्र भी जरूरी है . यह सभी खेल बिना किसी खर्च के खेले जाते थे तथा मनोविनोद के साथ साथ शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को तराशने वाले होते थे .
क़रीब दो वर्ष पहले पांव मे लगी चोट के कारण उन्हें कानपुर में भर्ती कराया गया था . चिकित्सकों का कहना था कि कम से कम छ: महीने उन्हें आराम करना चाहिये . दीक्षितजी ने कहा के वे आश्रित हो कर रहने के आदि नही नही रहे हैं और इसलिये वे हमीरपुर जिले के अपने पैत्रूक गांव मुसकर चले आए और प्रतिदिन दो -तीन किलोमीटर तक पैदल चलना भी शुरु कर दिया.
मुलायमसिंह यादव की सरकार ने ' लोकतंत्र सेनानियों ' को सम्मानित करने का फ़ैसला लिया है . 'लोकतंत्र सेनानियों ' के सबसे बडे सेनापति लोकनायक जयप्रकाश नारायण के निकट सहयोगी और उनके विचारों को अपने गीतों द्वारा तरुणों के ह्रुदय में अंकित कर देने वाले दीक्षितजी की सुध किसी सरकार को नहीं रही और न ही वे सरकारी सुध के मुखापेक्षी थे यद्यपि अन्तिम दौर में आर्थिक कठिनाइयों का सामना उन्हे करना पडा .
अहिन्सक संघर्ष की तालीम मे रामगोपाल दीक्षितजी का योगदान स्थाई है.
(अफ़लातून )
अध्यक्ष, समाजवादी जनपरिषद (उ.प्र.)

क्रान्ति गीत
जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है, तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है.
आज चलेगा कौन देश से भ्रष्टाचार मिटने को , बर्बरता से लोहा लेने,सत्ता से टकराने को.
आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है. (तिलक लगाने..)
पर्वत की दीवार कभी क्या रोक सकी तूफ़ानों को,क्या बन्दूकें रोक सकेंगी बढते हुए जवानों को?
चूर - चूर हो गयी शक्ति वह , जो हमसे टकराई है .(तिलक लगाने.. )
लाख़ लाख़ झोपडियों मे तो छाई हुई उदासी है,सत्ता - सम्पत्ति के बंगलों में हंसती पूरणमासी है.
यह सब अब ना चलने देंगे,हमने कसमें खाई हैं . (तिलक लगाने..)
सावधान, पद या पैसे से होना है गुमराह नही,सीने पर गोली खा कर भी निकले मुख से आह नही.
ऐसे वीर शहीदों ने ही देश की लाज बचाई है . ( तिलक लगाने..)
आओ क्रुषक , श्रमिक , नगरिकों , इंकलाब का नारा दो-कविजन ,शिक्षक , बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो.
फ़िर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है,तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है..
- रामगोपाल दीक्षित
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सोमवार, सितंबर 04, 2006

पानी की जंग पर राष्ट्रीय सम्मेलन

साझा संस्कृति मंच तथा जनान्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय द्वारा आयोजित ' पानी की जंग ' विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में पारित लोक संकल्प दिनांक ३० जून ,२००६, स्थान - सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ,वाराणसी


हमारी अमूल्य जल - निधि को लूटने वाली ,प्रदूषणकारी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पीडित किसानों ,महिलाओं ,बुनकरों तथा सामाजिक - राजनैतिक कार्यकर्ता , समर्थक समूहों ,शैक्शिकजनों,शोधकर्ता व संस्क्रुतिकर्मियों का समावेश यह लोक संकल्प व्यक्त कर रहा है -

(१) हमारी स्पष्ट मान्यता है कि पानी किसी की सम्पत्ति नहीं , कुदरत की देन है और इसलिये इस पर सबका अधिकार है.हांलाकि सवर्ण जातियों द्वारा दलितों को पानी से वंचित करना इस नज़रिये का दुखद अपवाद रहा है.
(२) हमारे देश का साझा संवैधानिक द्रुष्टिकोण है कि एक कल्याणकारी राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह सभी नागरिकों के लिये जीने का अधिकार तथा पानी जैसे अनिवार्य साधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करे.
(३) भारतीय संविधान के ७४वें संशोधन समेत मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत पानी का कामकाज ग्राम पंचायतों व शहरी निकायों द्वारा संचालित होगा.
यह तीनों अवधारणांए भारत में पानी के बाजार के निर्माण तथा मुनाफ़ाखोर कंपनियों के पूर्ण नियंत्रण के आडे आते हैं.जब तक पानी के बारे में यह विचार नही बदलते,पानी का धंधा पूरी तरह से नही चल पायेगा.
पानी की बाबत इन बुनियादी उसूलों पर चोट करने और मुनाफ़ाखोर कम्पनियों की लूट के दरवाजे खोलने के लिये -
(१)विश्व बैंक का जल संसाधन रणनीति मसौदा (मार्च २००२) कहता है : "सुधरी हुई सेवाएं उन बाज़ार आधारित नियमों को आगे बढाएंगी जिनके तहत पानी का अधिकार स्वैच्छि्क रूप से अस्थाई या स्थाई तौर पर कम पैसे वाले उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे वाले उपभोक्ताओं को हस्तान्तरित करना आसान हो जायेगा."
(२)विश्व व्यापार संगठन के सेवाओं के स्वतन्त्र व्यापार हेतु बने नियमों ( गैट्स ) के तहत सदस्य देशों को पानी की आपूर्ति जैसी सार्वजनिक सेवाओं के उदारीकरण के कार्यक्रम के प्रति प्रतिबद्धता जतानी पडती है .पानी आपूर्ति का स्पष्ट उल्लेख न होने के बावजूद गैट्स के तहत ऐसे नियम बना दिये गये हैं जिनकी वजह से नियन्त्रण हटाने और निजीकरण की परिस्थिति बन जाये.मसलन एक नियम के तहत इन विदेशी कम्पनियों के मूल देश हमारे देश के ऐसे कानूनों,नीतियों और कार्यक्रमों को चुनौती दी जा सकती है जिन्हे वे सेवाओं की बिक्री मे बाधा मानते हैं. यह नियम शासन के हर स्तर - राष्ट्रीय, प्रान्तीय अथवा स्थानीय स्तर पर लागू होते है.
(३) एशियाई विकास बैंक के भारत में एक परियोजना दस्तावेज के मुताबिक यह स्पष्ट करना जरूरी है कि - " पानी अब कुदरत की देन नही बल्कि ऐसा संसाधन है जिसका ' चुस्त प्रबन्ध ' होना चाहिये." दरअसल बैंक चाहता है कि पानी का 'बेहतर प्रबन्ध' बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के मुनाफ़े के लिये हो.
(४) उत्तर प्रदेश विकास परिषद में देश के एक बडे पूंजीपति अनिल अम्बानी द्वारा प्रदेश के पांच बडे नगरों की जल आपूर्ति व निकासी की व्यवस्था निजी हाथों मे सौंपने के प्रस्ताव पर कार्रवाई शुरु हो चुकी है.
हमारे बुनियादी उसूलों पर लगातार बढ रहे इन हमलों के प्रति सचेत हो कर हम संकल्प करते हैं कि -
(१) पानी के बाजारीकरण , निजीकरण और निगमीकरण के हर आपराधिक प्रयास का कारगर प्रतिरोध किया जायेगा .
(२)जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी .संरक्षण , उपयोग और प्रबन्ध का अधिकार पूरी तरह स्थानीय समुदायों का होगा . जल स्वराज्य का यह बुनियादी आधार है तथा इससे छेड-छाड के सभी प्रयास आपराधिक क्रुत्य होंगे. अपने सबसे मूल्यवान संसाधन की जिम्मेदारी हम सरकार में बैठे नौकरशाहों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कत्तई नही छोड सकते .
(३)कोका कोला और पेप्सी कोला कम्पनियों द्वारा जहरीले उत्पादन और विपणन से पर्यावरण नष्ट हो रहा है तथा स्थानीय समुदायों के जीवन पर खतरा बन गया है . इन्हें रोकने के लिए संघर्ष को व्यापक और धारदार बनाया जाएगा .
(४)मेंहदीगंज , प्लाचीमाडा और कालाडेरा जैसे साहसिक प्रतिरोध बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा हमारे संसाधनों की लूट के विरुद्ध संघर्षों का प्रतीक बन चुके हैं . इन भयानक व्यावसायिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्षरत किसानों , महिलाओं , आदिवासियों व कारीगरों के आंदोलनों का हम पूर्ण समर्थन करते हैं तथा पूरी दुनिया से इनके उत्पादों का बहिष्कार करने का आह्वान करते हैं .
(५) शासन की जिम्मेदारी है कि सभी लोगों को पानी मुहैया कराए . पानी उसकी कीमत चुकाने की औकात के आधार पर नही मिलना चाहिये . घरों , बस्तियों के अलावा रेलवे स्टेशनों पर साफ़ , मुफ़्त पेय जल की व्यवस्था हो ताकि लोग पानी खरीदने के लिये मजबूर न हों .
(६) कम्पनियों द्वारा खेती में निरन्तर अधिकाधिक पानी की खपत के तौर तरीके अपनायें जा रहे हैं . नए बीजों के साथ - साथ नए कीटनाशक , नए उर्वरक और भारी सिंचाई के पैकेज बहुराष्ट्रीय कम्पनियां सरकारों की मदद से थोपतीं हैं जिसके प्रति सचेत हो कर वैकल्पिक कॄषि के रचनात्मक प्रयासों को आन्दोलनों का स्वरूप दिया जाएगा .
(७) इस सम्मेलन की स्पष्ट राय है कि नदी जोड परियोजना अवैग्यानिक और अलोकतान्त्रिक है . इसके कारण देश के लोगों का बडा नुकसान होगा और नदियां धीरे धीरे मर जाएंगी . इस परियोजना के जो फ़ाएदे गिनाए जा रहे हैं उन्हें साबित करने के लिये सरकार के पास पर्याप्त प्रमाण नही हैं .इस परियोजना के कारण नदियों पर आधारित आबादी के आवास व रोजगार मे भारी कमी होगी .इससे बाढ , जलजमाव , पनी के खारे होने जैसी समस्याएं और ज्यादा होंगी. इस पर बहुत ज्यादा खर्च होगा . इतना खर्च करने के लिये सरकार को अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों तथा निजी क्षेत्र से धन जुटाना होगा . इसका नतीजा होगा जल का निजीकरण और इसकी कीमतों मे भारी व्रुद्धि . जल के निजीकरण का सीधा नतीजा होगा जल और खाद्य सुरक्षा का खातमा . भारी खर्च के लिये भारी विदेशी कर्ज के कारण देश को आर्थिक व राजनैतिक आज़ादी खोनी भी पडेगी .
प्रस्तावक , अफ़लातून (अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद,(उ.प्र.))

गुरुवार, अगस्त 17, 2006

'उपेक्षित ऊर्वशी अंचल'

हिन्दू जागरण नामक चिट्ठा में पूर्वोत्तर भारत पर लिखी प्रविष्टी पर टिप्पणी
पूर्वोत्तर भारत या 'उपेक्षित ऊर्वशी अंचल' के बारे में कितनी कम जानकारी होती है हम सब के पास.माईती (मीती नहीं)समुदाय वैश्नव है और बांग्ला लिपि से अलग,थाई लिपि के ज्यादा निकट,अपनी लिपि की तलाश में है.भारतीय सैन्य व अर्ध सैन्य बलों के अत्याचारों के प्रतिकार में शुरु हुए व्यापक जनान्दोलन को शेष भारत के कितने 'हिन्दुओं' का समर्थन मिला था ?उल्फ़ा और आई.एस. आई. के तालुकातों के बारे में जानते हुए भी उसका उल्लेख क्यों नहीं है आपकी टिप्पणी में?उल्फा में अधिसंख्य हिन्दू हैं,क्या इसीलिये?हर प्रकार की आतंकी घटना का विरोध होना चहिये लेकिन उन उपेक्षापूर्ण नीतियों को नज़र -अन्दाज भी न करें जब चीनी हमले के वक़्त जवाहरलालजी ने पूर्वोत्तर भारत को रेडियो से बिदाई संदेश- सा दे दिया था.अरुणाचल (तब का नेफ़ा ) के जिन गांवों में कभी आईना नही देखा था, उन्हें आईना और माओ तथा नेहरू की तसवीर दिखा कर वे पूछते थे,'तुम्हारा चेहरा किससे मिलता है ?'आदिदेव विश्वनाथ के कैलाश-मानसरोवर की मुक्ति की कल्पना भी एक 'छद्म धर्म निर्पेक्ष'और नस्तिक लोहिया ने ही की जो 'हिन्दू बनाम हिन्दू' के संघर्ष से वाकिफ़ थे.

दूसरा

होशंगाबाद के आदिवासी तवा बांध, आयुध कारखाना तथा इस कारखाने में बने गोलों की जांच-परीक्षण के लिये बने 'प्रूफ रेन्ज ' द्वारा गत ३० वर्षों में कई बार उजाडे गए.बांध के पानी में डूबे अपने ग़ांव,खेत और जंगल के ऊपर जब वे मछली पकडते तब उन्हें चोर कहा जाता.लम्बे संघर्ष के बाद उनकी सहकारी समितियों को मछली मारने का हक़ मिला.इससे सरकार को मिलने वाले मछली पर राजस्व की भी भारी बढोतरी हुई.हाल में घोषित अभयारण्यों और उसके लिये बने कानून के डंन्डे के बल पर फिर उनकी आजीविका छीनने की साजिश चल रही है.म.प्र. के मुख्यमंत्री और वन मन्त्री को संबोधित ज्ञापन पर आपके नैतिक समर्थन की मुहर लग सकती है,यहां --

http://www.PetitionOnline.com/tms2006/
हिन्दी में प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर अभियान चलाने के लिये ऐसी कोई जगह बनी है ? लोकतंत्र में बहुत जरूरी है ऐसी 'जगह ' का होना.अंग्रेजी वालों ने अब तक ७९ दस्तखत किये हैं.अब देखा जाए.

दो प्रतिवेदन

बोलिविया की जनता द्वारा पानी का व्यवसाय करने वाली सबसे बडी फ्रान्सीसी कम्पनी सुएज को देश के बाहर करने की लडाई दुनिया भर के वैश्वीकरण विरोधियों के लिये मिसाल है.ऑस्कर ऑलिवेरा,जो एक जूता बनाने के कारखाने मशीनिस्ट हैं इस सन्घर्ष के नेता हैं.देश छोडने के लिये मजबूर होने के बाद सुएज़ ने हर्जाने का दावा किया.इस दावे के प्रति अपना विरोध आप भी दर्ज करा सकते हैं - थोडा-सा समय निकाल कर नीचे अन्कित स्थल पर :
http://www.democracyinaction.org/dia/organizationsORG/fwwatch/campaign.jsp?campaign_KEY=4677

बुधवार, अगस्त 16, 2006

वाल मार्ट

सरकारी नीतियो के कारण बेरोजगारी है और ऐसे में माता पिता सोचते हैं कि थोडी सी पूंजी लगा कर दुकान खोल दी जाए .वाल मार्ट जैसे मगरमच्छ क्या करेंगे आपने बताया है.मुकेश अंबानी का दावा है कि वे भारतीय वाल मार्ट बनना चाहते हैं.सब्जी तक अम्बानी घर तक पहुंचाएंगे.वाम फ्रन्ट सरकार ने अम्बानी को न्योता दिया है. दुनिया के १० सबसे बडे पैसे वालों में ५ 'वॉल्टन' हैं.वॉल्टन वाल मार्ट का मालिक खानदान है.इनकी कुल दौलत ९० बीलियन डौलर है यानि बिल गेट्स और वॉरन बफेट की सम्मिलित दौलत से ज्यादा तथा सिंगापुर की राष्ट्रीय आय से ज्यादा.किसी आपूर्तिकर्ता का यदि ज्यादातर माल यदि आप ही खरीदते हैं तो सौदेबाजी से आपको माल सस्ता मिलेगा.वाल मार्ट यह ही करता है.साथ साथ मजदूरों को भी चूस कर रखता है.उन्हें स्वास्थ्य आदि कि सुविधा से मरहूम रख कर दाम सस्ता रख्ता है.सस्ता होगा यह भी भ्रम है-अरकन्सास के एक दैनिक ने ६ वाल मार्ट दुकानों की तुलना अन्य दुकानों से की तो पत चला कि १९ घरेलू सामानों में वाल मार्ट मे केवल दो सामान सबसे सस्ते थे.सभी सामानों का न्यूनतम $१२.९१ था तथा अधिकतम वाल मार्ट में $ १५.८६ था.वाल मार्ट में भेद भाव के भी अध्ययन हुए हैं.

मंगलवार, अगस्त 15, 2006

आगाज.

साधारणतया मौन अच्‍छा है,
किन्‍तु मनन के लिए .
जब शोर हो,
चारो ओर सत्‍य के हनन के लिए,
तब तुम्‍हे अपनी बात ज्‍वलन्‍त शब्‍दों में कहनी चाहिए.
सिर कटाना पडे या न पडे,
तैय्‍यारी तो उसकी रहनी चाहिए .
--भवानी प्रसाद मिश्र